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आप ही बताएं- नेशनल न्यूज़ चैनल्स इन्हें क्यों कहा जाए?

 

हिन्दुस्तान की जनसंख्या १२० करोड़ के करीब. कुल राज्य ३५ (७ केंद्र-शाषित सहित). पर तवज्जो सिर्फ दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों को. जी हाँ- ये हाल है भारत के न्यूज़ चैनल्स का जो अपने साथ "नेशनल न्यूज़ चैनल" का टैग लगाते हैं. न्यूज़ का सामान्य अर्थ इस तरह से लिया जा सकता है – नॉर्थ+ईस्ट+वेस्ट+साउथ की खबरों का प्रसारण. पर कौन सा ऐसा चैनल है जो इस परिभाषा के करीब भी है? कभी-कभी अंग्रेजी चैनल्स, एन.डी.टी.वी. इंडिया और ज़ी न्यूज़ जैसे चैनल इस और कदम बढ़ाते दिखते हैं. पर "कभी-कभी" एक औपचारिकता का नाम होता है. ज़्यादातर चैनल्स तो इस "कभी-कभी" से भी कभी इत्तेफाक नहीं रखते. क्यों? 

 

हिन्दुस्तान की जनसंख्या १२० करोड़ के करीब. कुल राज्य ३५ (७ केंद्र-शाषित सहित). पर तवज्जो सिर्फ दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों को. जी हाँ- ये हाल है भारत के न्यूज़ चैनल्स का जो अपने साथ "नेशनल न्यूज़ चैनल" का टैग लगाते हैं. न्यूज़ का सामान्य अर्थ इस तरह से लिया जा सकता है – नॉर्थ+ईस्ट+वेस्ट+साउथ की खबरों का प्रसारण. पर कौन सा ऐसा चैनल है जो इस परिभाषा के करीब भी है? कभी-कभी अंग्रेजी चैनल्स, एन.डी.टी.वी. इंडिया और ज़ी न्यूज़ जैसे चैनल इस और कदम बढ़ाते दिखते हैं. पर "कभी-कभी" एक औपचारिकता का नाम होता है. ज़्यादातर चैनल्स तो इस "कभी-कभी" से भी कभी इत्तेफाक नहीं रखते. क्यों? 
 
क्या कारण है कि राष्ट्रीय समाचार चैनल्स के लिए इस तरह की बाध्यता नहीं रखी गयी और उन्हें राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल का लाइसेंस दे दिया गया? क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस पर ध्यान नहीं देता या फिर इस तरह का कोई प्रावधान (लाइसेंस बाँटते वक़्त) तय नहीं किया जाता. क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चैनल्स में क्या अंतर है? दिल्ली के आस-पास अपना ऑफ़िस या प्रसारण-केंद्र खोल कर यहीं आस-पास की ख़बरों को ज़्यादा तवज्जो देना ही "नेशनल" शब्द की भरपाई है? दर्शक अगर १५ दिन लगातार नेशनल न्यूज़ चैनल्स का अध्ययन करें, तो पायेंगे कि दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों का प्रसारण ८०% टाइम खा जाता है, २०% प्रतिशत में कॉमेडी शो, स्पोर्ट्स, मनोरंजन, धर्म-कर्म, ज्योतिष, यू-ट्यूब और थोड़ा बाहर की स्पेशल रिपोर्ट्स रहती हैं. 
 
भारत के चार महानगरों (दिल्ली-मुंबई-कोलकाता-चेन्नई) में से कोलकाता-चेन्नई तो कभी-कभार ही जगह पाते हैं. सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल-प्रदेश, त्रिपुरा, मिज़ोरम, मणिपुर, आसाम, नागालैंड तो चमत्कार की तरह ही सामने आते हैं (मानों ये भारत के हिस्से ही ना हों).  दक्षिण व अन्य भारत के अधिकाँश हिस्से भी कुछ इसी तरह के भेद-भाव का शिकार हैं. ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गोवा, गुजरात, आँध्र-प्रदेश, केरला, कर्नाटक का नाम तभी सामने आता है जब कोई बहुत बड़ी घटना हो या फिर बड़ी राजनीतिक हलचल. दमन दिव, पुद्दुचेरी, लक्षदीप, दादरा नगर, अंडमान-निकोबार भी ज़बरदस्त उपेक्षा के शिकार हैं. तकरीबन 22-23 राज्य ऐसे हैं, जो खबर के नाम पर इन "तथा-कथित नेशनल न्यूज़ चैनल्स" में कभी-कभार ही जगह पा पाते हैं. दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर ही इन न्यूज़ चैनल्स की पहचान हैं. पर बावजूद इसके इन्हें नेशनल न्यूज़ चैनल्स क्यों कहा जाता है, ये समझ से परे है! 
 
ये बात बेहद "समझदार" संपादकों को स्पष्ट करनी चाहिए और साथ में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी. क्या दिल्ली, एन.सी.आर. और मुंबई में ही घटनाएँ घटती हैं? या हिंदुस्तान में और जगहों पर रहने वालों की कोई कीमत नहीं है? चैनल चलाने में बड़ा ख़र्चा आता है, ख़ास-तौर पर डिस्ट्रीब्युशन में. ये सच है. पर ये बात भी तो सच है कि – "नेशनल न्यूज़" का लाइसेंस लेते समय ये बात मालूम रहती है. फिर नेशनल न्यूज़ का लाइसेंस क्यों लिया जाता है? क्या अंतर होना चाहिए एक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचार चैनल में? क्या पैमाने तय किये जाने चाहिए थे, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचार चैनल का लाइसेंस देते वक़्त? ये बात अब तक साफ़ नहीं हो पायी. 
 
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस बात को साफ़ करना चाहिए, पर वो कन्नी काटता है. क्यों? पता नहीं. क्या लखनऊ, बनारस, पटना, पुद्दुचेरी, कोट्टयम, नागालैंड, सूरत से स्थानीय खबरों (जैसे दिल्ली में स्थापित चैनल, ज़्यादातर दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर. तक ही सिमटे रहते हैं) का प्रसारण करने वाले वालों को भी नेशनल न्यूज़ चैनल माना जाना चाहिए? न्यूज़ चैनल्स का टैग लगाने वालों ने "सेल्फ-रेगुलेशन" के तहत कोई मापदंड तैयार किया है या फिर ज़बरदस्ती इस टैग को चिपका लिए हैं? गौर से देखा जाए तो, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति इनकम, जागरूकता, रोज़गार, क़ानून व्यवस्था, सरकारी योजनाओं के क्रियान्यवन के लिहाज़ से, दिल्ली-मुंबई और एन.सी.आर. और कुछ अन्य महानगरों में व्यवस्थाएं काफी हद तक संतोष जनक हैं. 
 
भारत के दूसरे हिस्से काफी पिछड़े हैं और कई आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं (न यक़ीन हो तो इन हिस्सों के सरकारी स्कूल, ऑफ़िस और अस्पतालों का मुआयना कर आइये). पर "नेशनल न्यूज़" का टैग लगाया मीडिया वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा. माली या टाली हालत के चलते. कहा जाता है कि लोकतंत्र का चौथा खम्बा मीडिया है. मीडिया, गर इस पर इतराता है तो इतरा ने की कोई वज़ह तो होती होगी! ऊपर दिए गए विश्लेषण से आप को भी अंदाज़ हो चला होगा कि "नेशनल न्यूज़" का टैग लगाया मीडिया कितना जिम्मेदार है और किसकी कितनी खबर रखता है? 
 
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पावरफुल है, इसमें कोई दो-राय नहीं. इसमें भी कोई दो-राय नहीं कि मीडिया खबर दिखाता भी है. सवाल यहाँ सिर्फ यही है कि नेशनल मीडिया किसको कहा जाना चाहिए? क्षेत्रीय और नेशनल मीडिया में बड़ा फर्क (खबरों के लिहाज़ से) क्या होना चाहिए? अब आप ही बताएं- कि जो दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर. पर ही ज़्यादा वक़्त जाया करते हैं उन्हें नेशनल न्यूज़ चैनल्स क्यों कहा जाए? मैं अपना ओपोनियन आप सबके सामने रखा, अगर कोई गलती है तो माफ़ करें. 
 
राजेंद्र कुमार 
 
भुबनेश्वर 
 
0.9439872925 9776785555 
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