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कौन सुनेगा महुआ के स्ट्रिंगरों का दर्द?

यह पढ़ कर अच्छा लगा कि महुआ प्रबंधन ने नॉएडा में आंदोलनरत कर्मचारियों की मांगें मान ली है और वे उन्हें लंबित भुगतान करने को तैयार है. लेकिन इस खबर ने एक दर्द को भी महसूस कराया. हम सब स्ट्रिंगर्स का दर्द. वही स्ट्रिंगर्स जिनके दम पर महुआ न्यूज़ लाइन ने अपनी पहचान बनाई, लेकिन जब बारी आई इनसे सम्बंधित दिक्कतों की तो पहले तो किसी ने न सुनी, दबाव ज्यादा बढ़ा तो किसी को एक चेक दो हजार, किसी को चार हज़ार का थमा आगे जल्द ही पेमेंट मिलने की बात कही गई. 

यह पढ़ कर अच्छा लगा कि महुआ प्रबंधन ने नॉएडा में आंदोलनरत कर्मचारियों की मांगें मान ली है और वे उन्हें लंबित भुगतान करने को तैयार है. लेकिन इस खबर ने एक दर्द को भी महसूस कराया. हम सब स्ट्रिंगर्स का दर्द. वही स्ट्रिंगर्स जिनके दम पर महुआ न्यूज़ लाइन ने अपनी पहचान बनाई, लेकिन जब बारी आई इनसे सम्बंधित दिक्कतों की तो पहले तो किसी ने न सुनी, दबाव ज्यादा बढ़ा तो किसी को एक चेक दो हजार, किसी को चार हज़ार का थमा आगे जल्द ही पेमेंट मिलने की बात कही गई. 

 
अपने काम के प्रति ईमानदार स्ट्रिंगर्स झांसे में आकर फिर से उसी शिद्दत के साथ स्टोरी करने में जुट गए. धीरे-धीरे छह महीने का वक़्त बीत गया और जुलाई के आखिरी दिनों में बुरी खबर आने लगी कि महुआ खात्‍में की तरफ है, जिसकी वजह बेहतर प्रबंधन का न हो पाना और मालिक का जेल में होना है. स्ट्रिंगर्स का पेमेंट पिछले साल जुलाई से नहीं हुआ था, जब यह महुआ न्यूज़ में काम कर रहे थे. इसके बाद एक पेमेंट जनवरी का बताकर महज कुछ रूपए दिए गए. 
 
खबरों को लेकर दबाव बनाया जाता था, तो वहीं डे प्लान के लिए बाकायदा मेल भेजे जाते थे. अब स्ट्रिंगर्स की सुनने वाला कोई नहीं है. भले ही आंदोलनरत कर्मचारियों को न्याय मिल चूका हो लेकिन इन स्ट्रिंगर्स को कौन न्याय दिलवाएगा. इन स्ट्रिंगर्स के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे नॉएडा जाकर अपनी बात रख सकें. कल राखी है लेकिन इनके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं हैं. कुछ दिन बाद ईद है लेकिन यह भी इस बार स्ट्रिंगरों को पुराने कपड़ो में ही बितानी पड़ेगी, अगर प्रबंधन ने पेमेंट को लेकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया तब. अगर पेमेंट हुआ तो यकीनन इन संवादाताओ के परिवार वालो के लिए भी यह किसी बड़े त्योहार से कम न होगा.
 
आज पैसा न हो पाने के कारण स्ट्रिंगर्स की ज़िन्दगी दयनीय है. हर कोई यही सोचने को मजबूर है कि उनसे क्या खता हुई कि समाज को आईना दिखने वाले खुद ही परेशान हैं. वो कौन सा दिन था जब उन्होंने बेहद शुभ पत्रकारिता के पेशे को अपनाया. आज इनकी ज़िन्दगी दिहाड़ी मजदूर से भी बदतर है. प्रबंधन से इस पत्र के ज़रिये यही मांग है कि स्ट्रिंगर्स के कुछ पैसों का भुगतान किया जाये वरना इनके और परिवार की दयनीय स्थिति की ज़िम्मेदारी महुआ न्यूज़ लाइन प्रबंधन की होगी. वैसे सुना यही गया है कि मीना तिवारी जी अत्यन्‍त नरम स्वभाव की है और सात्विक भी हैं. उम्मीद है कि वे इस पत्र और स्ट्रिंगर्स पर दया ज़रूर करेगी.  
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
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