Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

महुआ : ये जीत के जश्न का नहीं…सोचने का वक़्त है

गरदन इज़्ज़त पर दिए फिरो..तब मज़ा यहां जीने का है/ तनकर बिजली का वार सहे..यह गर्व नए सीने का है। अगर…महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों की टीम की सोच इन पंक्तियों जैसी नहीं होती… तो फिर जो नतीजे सामने आए वो कभी नहीं आते। अगर ये टीम कलम की धार से जनता के हक की आवाज बुलंद करने वाले तेवर की नहीं होती…स्वाभिमान से लबरेज न होती…हर जिम्मेदारी को प्राण-प्रण से पूरी करने वाली नहीं होती तो वो अपने अधिकारों की आवाज़ कभी नहीं उठा पाती। इस आंदोलन में किसकी जीत हुई किसकी हार..अब ये तय करना बड़ा मसला नहीं। मसला ये है कि क्या वाकई अब कोई मीडिया घराना ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा? जवाब निराशाजनक ही मिलेगा…ऐसे में मुद्दा ये है कि क्या आगे भी पत्रकार अपने हक की आवाज को अपने दम पर उठाएंगे? इस बात की परवाह किए बिना क्या वे मिलकर लड़ेंगे ..कि कोई साथ आए न आए हम जीतकर रहेंगे। वो भी अपने दम पर?

गरदन इज़्ज़त पर दिए फिरो..तब मज़ा यहां जीने का है/ तनकर बिजली का वार सहे..यह गर्व नए सीने का है। अगर…महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों की टीम की सोच इन पंक्तियों जैसी नहीं होती… तो फिर जो नतीजे सामने आए वो कभी नहीं आते। अगर ये टीम कलम की धार से जनता के हक की आवाज बुलंद करने वाले तेवर की नहीं होती…स्वाभिमान से लबरेज न होती…हर जिम्मेदारी को प्राण-प्रण से पूरी करने वाली नहीं होती तो वो अपने अधिकारों की आवाज़ कभी नहीं उठा पाती। इस आंदोलन में किसकी जीत हुई किसकी हार..अब ये तय करना बड़ा मसला नहीं। मसला ये है कि क्या वाकई अब कोई मीडिया घराना ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा? जवाब निराशाजनक ही मिलेगा…ऐसे में मुद्दा ये है कि क्या आगे भी पत्रकार अपने हक की आवाज को अपने दम पर उठाएंगे? इस बात की परवाह किए बिना क्या वे मिलकर लड़ेंगे ..कि कोई साथ आए न आए हम जीतकर रहेंगे। वो भी अपने दम पर?

 
न्यूज़लाइन के कर्मचारियों की जीत यूं ही नहीं हो गई। प्रबंधन अगर झुका तो संगठित विरोध की वजह से। कोई और रास्ता नहीं होने की वजह से। जबर्दस्त दबाव की वजह से। नहीं तो 29 तारीख की शाम 5 बजे का फरमान तो ये था कि हम आपको अब पैसे नहीं दे सकते। ऑफिस खाली करिए और महीने भर बाद आइएगा पैसे की पहली किस्त लेने। बकाए वेतन की अगली किस्त उसके अगले महीने लेने आइएगा। कोई क्षतिपूर्ति नहीं। कोई सुनवाई नहीं। अगर सामूहिक प्रतिरोध का बवंडर नहीं उठा होता और हर स्तर पर यहां के पत्रकारों ने चट्टानी एकता नहीं दिखाई होती तो फिर तो हो गया था। पूरी तरह से पैदल थे सभी 120 लोग।  
 
 
न्यूज़लाइन के पत्रकार तब तक चैन से बैठने को तैयार नहीं जब तक 15 सितंबर 2012 की तारीख का क्षतिपूर्ति का एक अहम चेक भुन न जाए। क्योंकि इसमें एक बड़ा ‘झोल’है। संस्थान के वायदे पर एक हद तक भरोसा करना परिस्थिति की मांग थी इसलिए तमाम रणनीति तैयार होने के बावजूद सभी पत्रकार इस पर आंशिक तौर पर सहमत हुए..और मसला तात्कालिक तौर पर सुलझ गया। लेकिन इस ‘झोल‘की प्राथमिक रिपोर्ट के तथ्य चौंकानेवाले हैं। अभी अंतिम रिपोर्ट के लिए थोड़ा इंतज़ार किया जा रहा है। अगर इस चेक को 16 सितंबर या फिर उसके बाद की तारीख में बैंक की तरफ से भुनाए जाने से इनकार किया गया। तो अगली रणनीति तैयार है। पहले ही कहा जा चुका है कि ये आर-पार की लड़ाई थी और ये संघर्ष शर्तों के पूरा होने तक जारी रहेगी।
 
महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों का आंदोलन एक नई लकीर इसलिए खींच पाया क्योंकि ये कामयाब रहा। और कामयाबी की वजहों पर गौर करना जरूरी है। न्यूज़रूम में तीन दिनों तक चौबीसों घंटे लगातार धरने और आक्रामक लेकिन मर्यादित और संयमित विरोध ने महुआ प्रबंधन के सामने कोई विकल्प बाकी नहीं छोड़ा। उसके सामने सिवाय मांग पूरी करने के कोई रास्ता ही नहीं बचा था। रविवार को आंदोलन शुरू हुआ…और मंगलवार को डेढ़ बजे दिन में प्रबंधन ने हर मांग कबूल करने का ऐलान किया। साथ ही प्रबंधन को अपनी गलती के लिए माफी भी मांगनी पड़ी। एचआर की प्रमुख सन्निहिता ने कहा –‘जो भी हुआ..दुखद हुआ हमें इसका बहुत खेद है, हमने आपकी सभी मांगों को जायज़ समझा है। और इसे पूरी तरह मानने का फैसला किया है‘। इस ऐलान के बाद 120 के करीब कर्मचारियों के कागजात और चेक तैयार करने में करीब 6 घंटे का वक्त लगा। तकरीबन 8 बजे इस बात का ऐलान किया गया कि आप अपना चेक और बाकी औपचारिक दस्तावेज कलेक्ट कर सकते हैं।
 
 
इसके तुरंत बाद अंग्रेजी के प्रख्यात पत्रकार  प्रॉंजय गुहा ठकुराता यहां महुआ न्यूजलाइन के कर्मचारियों को बधाई देने पहुंचे, उन्होंने कहा कि ऐसी जीत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शायद ही कभी हुई हो। प्रॉंजय ने कहा कि भारत का मीडिया जगत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और पत्रकारों की हालत मीडिया घरानों ने बद से बदतर कर दी है। प्रॉंजय ने कहा कि पिछले दिनों सीएनईबी और अब महुआ न्यूज़लाइन में जो कुछ हुआ है उसके बाद तो तमाम पत्रकार संगठनों को सड़कों पर उतरना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एनबीए और बीईए का नाम लिए बगैर प्रॉंजय ने कहा कि ऐसे मुद्दे पर सबको एकजुट होना चाहिए क्योंकि सवाल लोकतंत्र के चौथे खंभे की गरिमा और पत्रकारों के आत्मसम्मान का है। उन्होंने कहा कि आप सबकी जीत से सभी पत्रकारों को एक नया हौसला मिलेगा। और शांतिपूर्ण ढंग से वो अपने हक के लिए हर जगह आवाज़ उठाना सीखेंगे।
 
प्रॉंजय ने महुआ न्यूज़रूम में संगठित विरोध के अगुआ रहे वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी को बधाई दी और कहा कि हमें आप पर गर्व है। इस मौके पर महुआ न्यूज के समूह संपादक राणा यशवंत ने कहा कि हमारी टीम हर मापदंड पर कामयाब साबित हुई है, उन्होंने कहा कि हमारे सपने अधूरे रहे हैं लेकिन टूटे नहीं हैं।
 
महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...