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राणा-सांगा जैसे सियारों की घेराबंदी शुरू

 एक फिल्मि थी- अतिथि तुम कब जाओगे। अजय देवगन की इस फिल्मा में परेश रावल प्रमुख भूमिका में हैं। फिल्म‍ में पूर्वांचल से आये परेश रावल का पादना खासा चर्चित रहा, जब टांगें खोलकर भड़ाम की आवाज से पादते हैं। सारे पात्र हक्का-बक्का रह जाते हैं, लेकिन जल्दीर ही माहौल सामान्या हो जाता है, जब केवल आवाज ही होती है, बदबू हर्गिज नहीं। जबकि आमिर खान वाली थ्री-इडियट्स में रामालिंगम नामक पात्र की पदाई प्राण-घातकम होती है। सतह पर बेहद शांत, मगर देखन में छोटन लगै, घाव करै गंभीर। इतनी गंभीर, कि उसके साथ कमरे में कोई रह ही नहीं सकता।

 एक फिल्मि थी- अतिथि तुम कब जाओगे। अजय देवगन की इस फिल्मा में परेश रावल प्रमुख भूमिका में हैं। फिल्म‍ में पूर्वांचल से आये परेश रावल का पादना खासा चर्चित रहा, जब टांगें खोलकर भड़ाम की आवाज से पादते हैं। सारे पात्र हक्का-बक्का रह जाते हैं, लेकिन जल्दीर ही माहौल सामान्या हो जाता है, जब केवल आवाज ही होती है, बदबू हर्गिज नहीं। जबकि आमिर खान वाली थ्री-इडियट्स में रामालिंगम नामक पात्र की पदाई प्राण-घातकम होती है। सतह पर बेहद शांत, मगर देखन में छोटन लगै, घाव करै गंभीर। इतनी गंभीर, कि उसके साथ कमरे में कोई रह ही नहीं सकता।

तो अब एक तीसरी पाद पर भी चर्चा हो जाए। यह पाद वाकई विनाशकारी होती है। वाकया है वाराणसी के हिन्दुदस्ता न अखबार का। शेखर त्रिपाठी के बाद यहां प्रमुख बने थे विश्वेकश्वरर कुमार। दिनभर चूतियापंथी करते थे विश्वेखर कुमार। नमूना देखिये कि लोकसभा चुनाव की गतिविधियों पर लिख मारा इस संपादक ने कि राजा बनारस को अपने खाते में जोड़कर क्षत्रियों में राजनीतिक सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। लोगों ने इस चूतियापंथी का खुलासा कर दिया कि बनारस का राजा, ठाकुर नहीं भूमिहार है। ऐसी ही मूर्खतापूर्ण अग्रलेखों की धज्जियां उड़ते देख विश्वेकश्व कुमार के हाथों से तोते उड़ गये, तो अपने सहयोगियों को अर्दब लेने के लिए विश्वेकश्व कुमार ने दफ्तर का पूरा माहौल ही बिगाड़ दिया।

खैर, अब बात इससे भी ज्या दा खतरनाक पाद पर। वाराणसी में अपने अखबार के दौरान हम लोगों ने यहां के कुछ लोगों की बेहाल करती सड़ांध पाद पर कई बार चर्चा की थी। इनका तो नाम ही पद्दन पड़ गया था। जब बात प्राणों पर हो, तो पूरे दफ्तर में कोहराम तो मचता ही था। आजकल दिल्लीन में बहुत बड़े दो पत्रकार तो उस सीट के आसपास फटकते भी नहीं थे, जहां पद्दन होते थे। हालांकि पद्दन-नाम वाले ने एक बार बताया कि उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया था।

वाराणसी में मेरे सहयोगी थे विजय नारायण सिंह, आजकल विजय भोपाल या कानी का रायपुर के एक अखबार में बड़े ओहदे पर हैं। खैर, रोजमर्रा की ही तरह एक दिन विजय नारायण सिंह ने पाद-पुराण और उसका महत्वा हम सभी लोगों के सामने खुलासा किया। विजय नारायण ने इन्हीं लोगों की इस हरकत पर एक अन्य महत्वपूर्ण सूचना दी, जो प्राण-घातक ही नहीं, विनाशकारी थी। विजय के बाबा ने बताया कि उन्हें  यह खास सूचना बातचीत में उनके बाबा ने बताया था, जब वे बहुत छोटे थे। बकौल विजय नारायण सिंह, जाड़े के दिनों में कौरा-कौड़ा या अलाव तापते समय सियार को भगाते-दौड़ाते कुत्तों का आर्तनाद अचानक सुना था। बाल-सुलभ जिज्ञासा में विजय ने बाबा से कुत्तों के इस आर्त-निनाद का कारण पूछ ही लिया।

बकौल बाबा, रात को सियार अपनी चोर-प्रवृत्ति के चलते गांव के करीब तक पहुंच जाते हैं। उनकी नजर गांववालों की बकरी-मेमने या नवजात बछड़ों पर होती है। लेकिन चूंकि कुत्तेज गांववालों के सुरक्षाकर्मी होते हैं, इसलिए सियारों की भनक मिलते ही वे सियारों पर हमला करने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ते हैं। सौ-दो सौ मीटर दूर जैसे ही यह कुत्ते के पास जब दबोचने की कोशिश करते हैं, अचानक ही यह कुत्ते कुंकुंआते हुए और अपनी पूंछ अपने पेट में घुसेड़कर लौट आते हैं और इस पीड़ा के बीच जमीन पर बेतरह लोटते भी हैं। विजय ने बताया कि उनके बाबा के अनुसार अपनी प्राण-रक्षा के लिए दरअसल सियार उस समय पाद करता है जब उसका पीछे करते कुत्तेप उनकी जद में पहुंच जाते हैं। बाबा के अनुसार सियार की पाद की बू इतनी बदबूदार होती है कि कुत्ते तक से उससे बिलबिला उठते हैं और हारकर वापस लौट आते हैं।

ऐसे देशज किस्म के मुद्दे पर बातचीत में विजय नारायण सिंह को महारत है। मैंने इस घटना को इलेक्ट्रानिक चैनल के सियारों की करतूतों को मौजूदा प्रवृत्ति में तौला तो सन्न रह गया। पता चला कि न्यूज-मैननुमा बैड-मैन की हालत भी पदने-सियार जैसी ही होती है। पहले तो यह सियार जैसे लोग दूसरे के हिस्से को हड़पने या चोरी करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसे ही बाकी लोग उसका विरोध करते हैं तो ऐसे सियार इतनी गंध छोड़ देते हैं कि विनाशकारी माहौल हो जाता है।

दिल्ली- एनसीआर में ऐसे ही एक राणा-सांगा जैसे सियार महाशय हैं, जिन्होंने पहले तो समाचारकर्मियों के हितों के खिलाफ चोरी-डाका डाला, खबरों की जमकर दलाली की और दूसरों की नैतिकता को सरेआम नीलाम कर दिया। लेकिन अपनी छवि न्यूज-मैन की पेश करने के लिए अपने चेला-चपाटियों के साथ पूरे चैनल प्रबंधन को बेच डाला। किसी महान योद्धा राणा-सांगा की तरह बड़ी-बड़ी डींगें हांकी। प्रबंधन के सामने हालात ऐसे प्रस्तुसत किये कि उन्हें बचाने की हरचंद कोशिशें कर रहे हैं। इसके लिए प्रबंधन से भारी रकम वसूली। लुब्बो-लुआब यह कि अपने चैनल में अपना भविष्य खोजने के बजाय इस सियार ने अपने नये-नये निजी ठीहे खोजे-बनाये और उसे समृ‍द्ध किया। कुल मिलाकर प्रबंधन-मेमने का शिकार कर ही लिया गया।

लेकिन इसी बीच प्रबंधन को भनक मिल गयी। लेकिन इसके पहले कि इस सियार को इस चैनल में निकाल बाहर किया जाता, इस राणा-सांगानुमा सियार ने अपने साथियों-चेलों के साथ ऐसी हालात पैदा कर दीं कि पूरा चैनल ही बंद हो जाए। नतीजा इस खबरी चैनल की तबाही आपके सामने है। हालत इतने बिगड़ गये हैं कि करीब डेढ़ सौ कर्मचारी बेरोजगार हैं, उनके घरों में दो जून की रोटी तक मयस्सगर नहीं है। बिलबिलाते बच्चेज दूध के लिए तरस रहे हैं। बताते हैं कि इस सियार ने चैनल बंदी के आदेश के दिन नोएडा अपार्टमेंट में अपने करीबी लोगों के साथ आलीशान मुर्गा-दारू की पार्टी दी थी। बहरहाल, यह सियार अब पहचाना जा चुका है। लोग-बाग लगे-जुटे हैं, जैसा ही मौका मिलेगा, इस रंगे सियार को दबोच लिया जाएगा। उम्मीद है कि अब इसकी पदाई पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।
 

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