रावडी राठोर पिक्चर जो कुछ दिनों पहले रिलीज हुई, शायद हम सभी ने देखी होगी. एक पुलिस वाला अपनी पत्नी को बापजी के डर से बापजी के बेटे के बिस्तर से वापस नहीं ला सका. उसे अपनी नौकरी और जान दोनों का डर था. नौकरी के चलते उसकी ये हालत थी की वो नाम का मर्द था, परन्तु था वास्तव में ना-मर्द. आज भड़ास पर ''माफ़ करना यशवंत, हम…लोग हैं'' पढ़ा….पता है, एक दम वही सीन आँखों के सामने से गुजर गया.
नौकरी के लिए हम इतना गिर सकते है की जिस माँ-बाप ने पैदा किया और नाम दिया., हम अपना नाम तक नहीं लिख सकते है. ये थोथा तर्क की हम नौकरी करते है, नहीं चलेगा. देश-दुनिया बदल रही है, हम मीडिया के उस बापजी से नहीं डरना होगा. इन्स्पेक्टर राठोड ना सही, पर रावडी राठोर तो बन ही सकते है. मैं बधाई देना चाहता हूँ प्रभात खबर के एचआर वालों का जिन्होंने मुकदमा करने की तैयारी की है. मैं बधाई देना चाहता हूँ जागरण कर्मचारियों का, जिन्होंने खुद को निकले जाने के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा किया. यह बात सभी पत्रकारों को ध्यान में रखना चाहिए कि कोई भी प्रबंधन ख़राब नहीं होता है, ख़राब करते हैं उसे खुद बड़े पत्रकार या मैनेजर बनने की चाह वाले.
यशवंत जी क़ानून के पचड़े में पड़े है तो ये कोई नई बात नहीं है…हर आदमी इसमें फंस सकता है, अपना क़ानून ही इतना लचीला है की गरीब लोग इसमें मर रहे है और आमिर इसका दुरूपयोग कर रहें है. पोलिस तो जिसकी सत्ता रहती है उसका ही आदेश मानता है, इसलिए उसपर कोई दोष नहीं है..हममें बस मीडिया के उस बाप जी को खोजकर निकलना है और उसमे या तो कोर्ट में या फिर सरेआम उसे लटकाना है ताकि देश में पत्रकारों में डर का माहोल जो पैदा हुआ है वो ख़त्म हो सके और यशवंत सिंह के रिहाई में जागरण, अमर उजाला, भास्कर, हिन्दुस्तान, इंडिया टुडे सहित सभी नामी गिरामी अख़बारों के संपादक और पत्रकार अपना नाम लेकर बधाई सन्देश दे सके.
उदय खवाड़े
इनपुट हेड, ऍनसीआर लुक
हरियाणा
09215000333
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