Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

मैं असीम त्रिवेदी का प्रशंसक हूं लेकिन…

: क्या "नेशनल टायलेट" है संसद? : अभिव्यक्ति की आजा़दी का मतलब क्या है ? आजा़दी का मतलब क्या ये होना चाहिए कि आप कुछ भी बोलें और लिखें, कोई रोकने वाला नहीं होगा। या फिर अभिव्यक्ति की आजादी की कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए ? मीडिया से जुडे़ होने के कारण आप समझ सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी का मैं तो कभी विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि मेरा मानना है कि अगर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश हुई तो सबसे ज्यादा मुश्किल मीडिया को ही होगी। इसके बाद भी मैं अब इस मत का हूं कि इस आजादी की एक बार समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा ही नहीं बल्कि लक्ष्मण रेखा भी तय की जानी चाहिए, जिससे इस आजादी की आड़ में गंदा खेल ना खेला जा सके।

: क्या "नेशनल टायलेट" है संसद? : अभिव्यक्ति की आजा़दी का मतलब क्या है ? आजा़दी का मतलब क्या ये होना चाहिए कि आप कुछ भी बोलें और लिखें, कोई रोकने वाला नहीं होगा। या फिर अभिव्यक्ति की आजादी की कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए ? मीडिया से जुडे़ होने के कारण आप समझ सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी का मैं तो कभी विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि मेरा मानना है कि अगर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश हुई तो सबसे ज्यादा मुश्किल मीडिया को ही होगी। इसके बाद भी मैं अब इस मत का हूं कि इस आजादी की एक बार समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा ही नहीं बल्कि लक्ष्मण रेखा भी तय की जानी चाहिए, जिससे इस आजादी की आड़ में गंदा खेल ना खेला जा सके।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि "इंडिया अगेंस्ट करप्सन"  से जुड़े तमाम लोग ऐसी भाषा  इस्तेमाल करते हैं जिसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। संसद की गरिमा के साथ जिस तरह इस टीम ने नंगा नाच किया है, मेरी नजर में ये अक्षम्य अपराध है। हां ये बात सही है कि संसद में दागी सांसद हैं, कई लोगों पर गंभीर अपराध हैं। लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि जब चुनाव लड़ने वालें उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल करने के दौरान हलफनामें में घोषित कर दिया कि उनके खिलाफ ये ये मामले लंबित हैं और न्यायालयों में विचाराधीन हैं। इसके बाद भी जब वो हमारे आपके वोट से चुनाव जीत कर संसद पहुंच गए  तो उन्हें गाली देने के बजाए एक बार खुद का भी मूल्यांकन करना चाहिए। सच तो ये है कि जो लोग दागी और भ्रष्टाचार का रोना रो रहे हैं, वो खुद इतने खुदगर्ज हैं कि वोट की कीमत नहीं जानते। वरना केजरीवाल जैसे लोग चुनाव के वक्त मतदान छोड़ कर गोवा जाने के लिए तैयार ना होते।

आइये मुद्दे की बात करें। ताजा मामला कानपुर निवासी कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का है। असीम भी इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जुड़े हैं और व्यवस्था पर चोट करने वाले उनके कार्टून का मैं भी प्रशंसक हूं और मेरी तरह तमाम और लोग भी उन्हें पसंद करते हैं। लेकिन फिर बात आती है आजादी की मर्यादा की। क्या हमें असीम को ये छूट दे देनी चाहिए कि वो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी कार्टून बनाने को स्वतंत्र हैं। इस कार्टून पर एक नजर डालिए, क्या आपको इस कार्टून में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता है। मेरी तो घोर आपत्ति है। पहले तो महिला को तिरंगे में लपेटा गया है, ये असीम की दूषित मानसिकता को बताने के लिए काफी है। मुझे याद है कि कुछ साल पहले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां ने भारत माता को "डायन" कहा था, उसके बाद तो पूरे देश में हाय तौबा मच गई थी। मैं भी आजम खां के इस वक्तव्य को सही नहीं मानता हूं। मुझे लगता है कि आजम खां से कहीं ज्यादा घिनौना कृत्य असीम का है। इस कार्टून के जरिए भारत माता को नीचा दिखाने के साथ ही तिरेंगे का भी अपमान किया गया है।  लेकिन यहां लोग असीम का समर्थन कर रहे हैं, क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूं? मीडिया में ये दोहरा मानदंड क्यों है।

अब असीम के इस दूसरे कार्टून को ले लें। मैं कहीं से नेताओं का पक्ष नहीं ले रहा हूं, लेकिन हम ये क्यों भूल जाते हैं कि हम आज भी एक सभ्य समाज में रहते हैं और सभ्य समाज की एक अपनी मर्यादा है, यहां कोई लिखा पढ़ी में कानून तो नहीं है, कि हमें कैसे रहना है, क्या करना है क्या नहीं करना है, लेकिन इतना तो हम सब जानते ही हैं कि सभ्य समाज की क्या परिभाषा है और उसका दायरा क्या है। पता नहीं मैं सही कह रहा हूं या नहीं,  पर जितना मैं जानता हूं कार्टून का मकसद यही है कि वहां कुछ लिखने की जरूरत ना पड़े, ऐसा कार्टून बनाया जाए, जिसमें सब कुछ साफ हो जाए। लेकिन अब कार्टूनिस्ट अपनी लक्ष्मण रेखा पार करने लगे हैं और कार्टून के जरिए व्यक्तिगत खुंदस निकालने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि कार्टून बनाने के बाद उसमें कुछ आपत्तिजनक शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। गैंग रेप आफ मदर इंडिया, नेशनल एनीमल ये सब उनकी घटिया सोच को दिखाती है।

असीम का एक ये भी कार्टून है। क्या इसे आप सही मानते हैं। हम संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं। हर पांच साल में जब चुनाव होता है तो देश की 121 करोड़ की आबादी सदस्यों को चुनने लिए मतदान करती है। कड़ी धूम, बारिश और ठंड की परवाह किए बगैर हम वोट डालकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार को लोकतंत्र के इसी मंदिर में भेजते हैं। लेकिन यहां संसद की तरह तो पहले असीम ने टायलेट को डिजाइन किया, इसके बाद भी उनसे नहीं रहा गया तो अपनी घिनौने विचार को व्यक्त करने के लिए यहां इसे "नेशनल टायलेट" लिखा। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि इसके लिए सिर्फ राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज करने से कुछ नहीं होने वाला है। लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाने वाले दोषी को फांसी पर भी लटका दिया जाए तो ये सजा कम होगी। आइये एक और कार्टून पर नजर डालते हैं, उसके बाद आप देखें कि असीम की मानसिकता क्या है।

अब इस कार्टून के जरिए आप क्या साबित करना चाहते हैं। आपको नहीं लगता कि यहां जो भी कार्टून हैं वो देश की गरिमा के खिलाफ हैं। अगर कार्टून भ्रष्ट नेता के खिलाफ होता तो मुझे लगता है कि इससे किसी को इतनी तकलीफ नहीं होती। लेकिन यहां तो राष्ट्रीय गौरव यानि  तिरंगे का मजाक बनाया गया, फिर संसद कि गरिमा को तार तार करने वाला कार्टून और  राष्ट्रीय चिन्ह अशोक की लाट में तीन शेरों की जगह तीन भेड़िए बनाकर सत्यमेव जयते के स्थान पर भ्रष्टमेव जयते लिखा गया है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस कार्टून के पक्ष में भी नहीं हूं और ना ही मैं समझता हूं कि इसके जरिए कोई सकारात्मक संदेश ही जनता के बीच पहुंच रहा है। सिर्फ यही नहीं असीम का अगला कार्टून तो देखकर ही उसके प्रति मन में घृणा पैदा करती है। मैं वाकई ये सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूं कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यही हैं। पहले इस कार्टून पर नजर

डालिए। अब मैं देश के उन विद्वानों से इस कार्टून के बारे में जानना चाहता हूं, जो उसकी गिरफ्तारी पर हाय तौबा मचा रहे हैं।  इसके जरिए देश की जनता को क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही है। इस कार्टून के जरिए क्या कसाब को महिमा मंडित करने की कोशिश की जा रही है या फिर ये बताया जा रहा है कि हमारा भारतीय संविधान अब इसी के लायक है कि आतंकवादी इस पर पेशाब करें। कार्टून बनाने की बात तो दूर मैं तो समझता हूं कि किसी भी भारतीय के मन में भारतीय संविधान के प्रति ऐसी दुर्भवना कैसे आ सकती है। अगर आती है तो क्या वो सजा का हकदार नहीं है ? उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए ? अगर देश संविधान की इज्जत करता है, तो हमें उन लोगों की पहचान करनी होगी, जो ऐसे आदमी की गिरफ्तारी के विरोध में सड़क पर निकले हुए हैं। मन में एक सवाल है कि क्या देश की प्रतिष्ठा के खिलाफ इस तरह जहर उगलने वाले के खिलाफ दुनिया के दूसरे देश भी यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, या फिर ऐसी सख्त कार्रवाई करते हैं, जिससे कोई दूसरा आदमी ऐसी हिमाकत न कर सके।  
   
सच कहूं तो मुझे असीम के खिलाफ दर्ज राष्टद्रोह के मामले को लेकर कोई आपत्ति नहीं है, मुझे आपत्ति इस बात पर है कि जो कार्रवाई बहुत पहले  करनी चाहिए थी, उसे अंजाम देने में इतना वक्त क्यों लगाया गया, इसके लिए जरूर पुलिस के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। मुझे पता है कि देश और प्रदेश में कमजोर सरकार है,  इसलिए मामला भले दर्ज कर लिया गया हो, लेकिन वो देश में कुछ लोगों के विरोध को झेल नहीं पाएगी। आज नहीं कल असीम को छोड़ दिया जाएगा। मैं अभी देख रहा हूं कि महाराष्ट्र सरकार फिलहाल घुटने पर आ गई है और वो पूरे मामले से सम्मान जनक तरीके से कैसे बाहर निकले, इस पर विचार कर रही है। पुलिस पर दबाव बना दिया गया है कि वो 16 सितंबर के पहले ही असीम को कोर्ट में पेश कर कह दे कि अब जांच पूरी हो गई है।  जिससे असीम की रिहाई का रास्ता साफ हो सके।

बहरहाल पुलिस तो अब असीम को छोड़ना चाहती है, लेकिन उसके खिलाफ मामला दर्ज हो गया है और उसे कोर्ट ही छोड़ सकती है। लिहाजा पुलिस के हाथ में अब कुछ नहीं रह गया है। दवाब में पुलिस भले आ गई हो, लेकिन कोर्ट ने आज उसे 24 सितंबर तक जेल भेज दिया है। जेल भेजना कोर्ट की भी मजबूरी थी, क्योंकि हीरो असीम ने जमानत की अर्जी ही नहीं दी।  अब देशवासियों की समझ में नहीं आ रहा है कि देशद्रोह जैसा मामला दर्ज करने के बाद पुलिस अब घुटने पर क्यों आ गई? खैर जल्दी ही असीम को विदेशों में तमाम पुरस्कार और सम्मान मिलने का क्रम शुरू हो जाएगा। नेताओं को नेशनल एनीमल और संसद को नेशनल टायलेट बताने वाला अब देश का राष्ट्रीय हीरो होगा, जिससे हर जगह सम्मान मिलेगा। शर्म की बात है..।

लेखक महेन्द्र श्रीवास्तव आईबीएन7 न्यूज चैनल में प्रोग्रामिंग डाइरेक्टर हैं. वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े-लिखे हैं. पिछले काफी समय से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...