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सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए झटके से उबर पाएगा सहारा समूह?

: सहारा ग्रुप को हजारों करोड़ लौटाने का आदेश, जाँच भी होगी : सहारा के सैकड़ों जमाकर्ता रकम वापसी के लिए सेबी को रोजाना फोन कर रहे : सहारा ने तीन ट्रक दस्तावेज भेजा : दिलचस्प हुई सेबी-सहारा की लड़ाई : भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा ग्रुप को आदेश दिया है कि वो निवेशकों का 17,400 करोड़ रुपए वापस लौटा दे. उच्चतम न्यायालय का फैसला सहारा के लिए बड़ा झटका है. इसके लिए न्यायालय ने सहारा इंडिया रिएल इस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन को तीन महीने का समय दिया है. अदालत ने शेयर बाज़ार पर नज़र रखनेवाली संस्था भारतीय प्रतिभूति और विनमय बोर्ड (सेबी) से भी कहा है कि वो दोनों कंपनियों की जाँच करे और निवेशकों के बारे में पता करे.

: सहारा ग्रुप को हजारों करोड़ लौटाने का आदेश, जाँच भी होगी : सहारा के सैकड़ों जमाकर्ता रकम वापसी के लिए सेबी को रोजाना फोन कर रहे : सहारा ने तीन ट्रक दस्तावेज भेजा : दिलचस्प हुई सेबी-सहारा की लड़ाई : भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा ग्रुप को आदेश दिया है कि वो निवेशकों का 17,400 करोड़ रुपए वापस लौटा दे. उच्चतम न्यायालय का फैसला सहारा के लिए बड़ा झटका है. इसके लिए न्यायालय ने सहारा इंडिया रिएल इस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन को तीन महीने का समय दिया है. अदालत ने शेयर बाज़ार पर नज़र रखनेवाली संस्था भारतीय प्रतिभूति और विनमय बोर्ड (सेबी) से भी कहा है कि वो दोनों कंपनियों की जाँच करे और निवेशकों के बारे में पता करे.

अदालत ने ये भी कहा कि सेबी की जाँच सेवानिवृत्त हो चुके न्यायाधीश बीएन अग्रवाल की देखरेख में होगी. अदालत ने सहारा को निवेशकों को 15 प्रतिशत ब्याज भी देने को कहा है. ये दोनो कंपनियाँ शेयर बाजार का हिस्सा नहीं है. रिपोर्टों के मुताबिक 2008 और 2011 के बीच सहारा ने करीब दो करोड़ निवेशकों से अरबों रुपए जमा किए थे.

उधर सेबी ने कहा है कि वो निवेशकों की वास्तविकता की जाँच करेगी. इस फैसले को सहारा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. ये मामला जून 2011 का है जब सेबी ने सहारा से कहा था कि वो निवेशकों से निवेश लेना बंद करे क्योंकि इस पूरी व्यवस्था में नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है.

सहारा ने फिर सिक्योरिटी एपलेट ट्राइब्यूनल का रुख किया था जिसने सेबी के आदेश को बरकरार रखा. ट्राइब्यूनल ने कहा था कि वो निवेशकों का धन छह हफ्तों में वापस करे. सहारा ने फिर उच्चतम न्यायालय का रुख किया था.

उल्लेखनीय है कि करीब 4 साल पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने सहारा समूह की कंपनी को जमा लेने से मना कर दिया था और निवेशकों को तत्काल भुगतान करने को कहा था। हालांकि बाद में उच्चतम न्यायालय ने रिजर्व बैंक को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा था और सहारा को चरणबद्ध तरीके से भुगतान करने के लिए 7 साल का समय दिया गया। लेकिन इस बार सहारा को कोई राहत नहीं दी गई।

उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों को प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) के आदेश को बरकरार रखते हुए समूह की दो कंपनियों को निवेशकों से जुटाई गई 24,029 करोड़ रुपये की राशि 3 माह के अंदर ब्याज समेत लौटाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही समूह की दो कंपनियों- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन के भुगतान प्रक्रिया की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त किया है।

सहारा समूह ने पिछले साल सैट के समक्ष दाखिल हफलनामे में कहा था कि 31 अगस्त 2011 तक सहारा इंडिया रियल एस्टेट के पास 2.21 करोड़ निवेश्कों के 17,656 करोड़ रुपये जमा है वहीं सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट के पास 75 लाख निवेशकों के 6,373 करोड़ रुपये जमा हैं। आदेश के तहत सहारा को अब पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर के जरिये जुटाई गई रकम पर सालाना 15 फीसदी की ब्याज दर से रकम का भुगतान करना होगा। न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहर के पीठ ने सेबी को इन कंपनियों के वास्तविक ग्राहक आधार का पता लगाने का भी निर्देश दिया है।

इस बीच, सेबी ने साफ कर दिया है कि वो सहारा रिफंड मामले को तय समय में पूरा कर लेगी। सहारा ने मंगलवार को एक ट्रक दस्तावेज सेबी के मुंबई दफ्तर में भेजकर सबको चौंका दिया था, कहा जाने लगा था कि इतने दस्तावेजों को जांचने के लिए सेबी को बहुत वक्त लगेगा।

हालांकि सेबी प्रमुख ने कहा कि तय समय यानी 3 महीने में रिफंड का काम पूरा होगा। रिफंड की प्रक्रिया में अब तेजी आने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश बी एन अग्रवाल इसकी निगरानी कर रहे हैं। सेबी ने मेंबर प्रशांत शरण की देखरेख में स्पेशल सेल बनाया है। सहारा की दो कंपनियों ने निवेशकों से 17,400 करोड़ रुपये जुटाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने में निवेशकों को पैसे लौटाने का आदेश दिया है।

सहारा और सेबी की लड़ाई किस कदर दिलचस्प होती जा रही है, इसका नजारा मार्केट रेग्युलेटर के हेड ऑफिस में दिखा। गेट पर सहारा की तरफ से भेजे दस्तावेजों से लदा एक ट्रक खड़ा था, जिसे सिक्योरिटी गार्ड्स ने कंपनी के अफसरों को अनलोड करने से रोक दिया। मंगलवार की सुबह दस्तावेजों से भरा एक और ट्रक वहां आया, जिसे फिर लौटा दिया गया।

रेग्युलेटर का कहना है कि सहारा तकनीकी तौर पर सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के हिसाब से अपनी दो अनलिस्टेड कंपनियों के 3 करोड़ डिबेंचरहोल्डर्स के डॉक्युमेंट्स और डिटेल जमा करने की डेडलाइन मिस कर गई है। सेबी के पास उसे सोमवार तक डॉक्युमेंट जमा कराना था। करोड़ों पन्नों के डॉक्युमेंट को ऑफिस ऑवर के बाद नहीं लेने का सेबी का फैसला स्वाभाविक था।

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की दोनों कंपनियों को डिबेंचर या बॉन्ड के प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए हजारों इनवेस्टर्स से जुटाई गई 17,400 करोड़ रुपए की रकम ब्याज सहित लौटाने का ऑर्डर दिया है। सेबी ने यह कहते हुए मामले में दखल दिया था कि कंपनियों की फंड जुटाने की कवायद नियमों के खिलाफ है, क्योंकि 50 या ज्यादा इनवेस्टर्स को सिक्योरिटीज की बिक्री पब्लिक ऑफर मानी जाती है। पिछले साल नवंबर में सेबी के फुलटाइम मेंबर के. एम. अब्राहम ने अपने ऑर्डर में दोनों कंपनियों को इनवेस्टर्स का पैसा 15% ब्याज सहित लौटाने के लिए कहा था। सहारा ने इस आदेश को पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले के जानकार सूत्रों के मुताबिक, ग्रुप ने कोर्ट की ओर से तय समय के भीतर डॉक्युमेंट और डिटेल जमा नहीं किए थे। रिफंड के लिए दोनों कंपनियों को तीन महीने का वक्त दिया गया है। अगर निवेशकों को इतने समय में पैसा नहीं लौटाया जाता है, तो सेबी दोनों कंपनियों की संपत्ति को जब्त करके उसे बेचने और उनके बैंक खाते सील करने के कानून का सहारा ले सकता है। कोर्ट ने अपने ऑर्डर में रेग्युलेटर को स्टेटस रिपोर्ट देने और जरूरत पड़ने पर उससे निर्देश लेने के लिए कहा था।

दो सीनियर वकीलों के मुताबिक, रेग्युलेटर अब दिशा-निर्देश के लिए कोर्ट जा सकता है। सेबी के सीनियर अफसरों ने मामले में बात करने से मना किया है, जबकि सहारा के प्रवक्ता को भेजी गई ईमेल का जवाब नहीं मिल पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जस्टिस डी. एन. अग्रवाल को इस पर नजर रखने के लिए नियुक्त किया है कि क्या उसके निर्देशों का पालन हो रहा है। दोनों कंपनियों के इनवेस्टर्स बेस पर कोर्ट के चिंता जताने से मामला दिलचस्प हो गया है।

कोर्ट ने कहा था कि उसने उनके डिबेंचर सब्सक्राइबर्स की लिस्ट की हार्ड कॉपी की जांच में पाया कि उसे पहले पन्ने से आगे देखना मुमकिन नहीं क्योंकि कलावती की सिंगल एंट्री के एनालिसिस से उसके अविश्वसनीय और फर्जी होने का अंदेशा होता है।

सहारा के जमाकर्ता रकम वापसी (रिफंड) प्रक्रिया की पूछताछ के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की टोल-फ्री हेल्पलाइन पर लगातार फोन कर रहे हैं। सेबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सहारा मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद हेल्पलाइन नंबर पर रोजाना तकरीबन 500 निवेशकों के फोन आ रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 31 अगस्त को सहारा समूह की दो कंपनियों-सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को 2.96 करोड़ निवेशकों को करीब 24,000 करोड़ रुपये ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया था। सहारा ने यह रकम वैकल्पिक पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर के तहत जमा कराई थी। ब्याज सहित यह रकम करीब 27,000 करोड़ रुपये बैठती है।

सेबी अधिकारी ने कहा, 'बहुत से लोग हेल्पलाइन पर फोन कर रिफंड प्रक्रिया शुरू होने और जरूरी कागजात के बारे में जानकारी मांग रहे हैं।' शीर्ष अदालत ने सेबी को वास्तविक निवेशकों को भुगतान कराने की व्यवस्था करने का अधिकार दिया है। सूत्रों के अनुसार सेबी ने करीब 3 करोड़ निवेशकों को रकम लौटाने के लिए विशेष सेल का गठन किया है। इस सेल का जिम्मा सेबी के पूर्णकालिक सदस्य प्रशांत सरन को दिया गया है। उनकी सहायता के लिए सेबी के दो वरिष्ठ अधिकारी भी होंगे। शीर्ष अदालत ने रिफंड प्रक्रिया की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल को भी नियुक्त किया है। सहारा समूह की दोनों कंपनियों को 90 दिनों के अंदर सेबी के पास रकम जमा कराने को कहा गया है। हालांकि रिफंड प्रक्रिया पूरी करने के वास्ते सेबी के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।

रिफंड प्रक्रिया पूरी करना सेबी के लिए मुश्किल होगा। देश में  जमाकर्ताओं की संख्या इक्विटी निवेशकों की कुल संख्या से काफी ज्यादा है। देश में फिलहाल 2 करोड़ से कुछ ज्यादा डीमैट खाते हैं। सेबी की हेल्पलाइन 14 भाषाओं में है।

(उपरोक्त खबर कई अखबारों, पोर्टलों पर प्रकाशित खबरों का कंपाइल रूप है)

sebi sahara

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