लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले छवि सुधारने में जुटी मुख्यमंत्री मायावती मुश्किल में पड़ गई हैं। दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या के बाद संकट में रही सरकार पर अब नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (एनआरएचएम) में हुए करोड़ों के घोटाले ने संकट खड़ा कर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अब पूरे प्रदेश में हुए घोटाले की जांच के आदेश सीबीआई को दिए हैं। यह जांच 2005 से लेकर 15 नवंबर 2011 तक की जाएगी। इन आदेशों ने अब तय कर दिया है कि इस घेरे में सिर्फ तीन मंत्री ही नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी होगा। इसके साथ ही जांच के घेरे में मुलायम सरकार का एक मंत्री भी होगा।
ये जांच राज्य के सभी जिलों में की जाएगी। जिस पर जहां जरूरत होगी मुकदमा दर्ज होगा और वो इस जांच का हिस्सा बन जाएगा। कोर्ट ने 2005 से अब तक जांच के आदेश दिए हैं। जिनके पास भी इस अवधि में यह मंत्रालय रहा है सभी को इस जांच गुजरना होगा। 13 मई 2007 को राज्य की सत्ता पर काबिज होने के बाद एनआरएचएम का कामकाज खुद मुख्यमंत्री के पोर्टफोलियो का हिस्सा था। इसके बाद परिवार कल्याण विभाग अलग हुआ तो 2008 में ये काम अनंत मिश्र अंटू को सौंपा गया। जून 2009 में मंत्रालय में आए मायावती के बेहद करीबी बाबू सिंह कुशवाहा। इस बीच इसी विभाग के दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्याएं हुईं और आखिर 7 अप्रैल को मिश्रा और कुशवाहा से इस्तीफे ले लिए गए।
इसके बाद मंत्रालय का कामकाज मिला सूबे के सबसे कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को, जो अभी तक एनआरएचएम का कामकाज देख रहे हैं। इस जांच से न सिर्फ मायावती बल्कि उनके करीबियों पर भी तलवार लटक गई है। बाबू सिंह कुशवाहा, अंटू मिश्रा के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही नहीं बल्कि प्रमुख सचिव रहे और टेलीकॉम घोटाले में फंसे आईएएस अफसर सिद्धार्थ बेहुरा, नीता चौधरी, प्रदीप शुक्ला और संजय अग्रवाल भी सीबीआई जांच के घेरे में हैं। ऐसा नहीं कि सीबीआई जांच की आंच सिर्फ मायावती के कार्यकाल तक ही सीमित है। परेशानी मुलायम सिंह के लिए भी उतनी ही बड़ी है क्योंकि 2005 में वो यूपी के मुख्यमंत्री थे और उनके बेहद करीबी अहमद हसन के पास था परिवार कल्याण विभाग। साभार – आईबीएन7





