पत्रकारिता और पत्रकारों को लेकर लगभग आम लोगों में उसी तरह की धारणा विकसित हो रही है जिस तरह से नेताओं के बारे में। हाल ही में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने कहा कि पत्रकारिता में पढ़े लिखे लोग नहीं हैं। इधर उत्तराखंड में एक पत्रिका के हवाले से बताया गया कि मुख्यमंत्री के ओएसडी जेपी ममगांई ने उस पत्रिका के पत्रकार को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकार तो कुत्ते होते हैं।
मुझे नहीं पता कि ममगाई ने यह टिप्पणी की भी या नहीं। मैं यह भी जानता कि उन्होने यह किस संदर्भ में कहा। आम तौर पर जब आप सत्ता में होते हैं तो आपके इर्दगिर्द स्वाभिमानी बुद्धिजीवी तो आता नहीं। जो आते हैं वे टुक्कड़जीवी होते हैं। इसलिए जैसे लोगों से मिलेंगे वैसी ही राय बनेगी। सत्ता में होने पर वाणी का संयम और सामान्य शिष्टाचार भी अकुलीन लोग भूलते रहते हैं। इसलिए हम उन्हे माफ भी करते हैं कि वे नहीं जानते कि वे क्या बोल रहे हैं, क्या कर रहे हैं।
उनकी इस कुत्ते वाली टिप्पणी पर अपने एक मित्र का कहना था कि इस टिप्पणी पर पत्रकारों को नहीं कुत्तों को खफा होना चाहिए। उन्होने बताया कि यह टिप्पणी बुनियादी रुप से कुत्तों की मानहानि करती है। लिहाजा ममगांई को कुत्तों से माफी मांगनी चाहिए। मैने नहीं जानता कि यह टिप्पणी मेरे लिए थी या उन पत्रकारों के लिए जिन्होने मेरे मित्र को इस निष्कर्ष तक पहुंचाया। लेकिन मैं मानता हूं कि इस टिप्पणी से कुत्तो को नाराज होना चाहिए। क्योंकि वफादारी कुत्तों का मूल स्वभाव है। पत्रकारिता का पेशा हमें वफादार नहीं होने देता। क्योंकि पता नहीं कब और कैसे आपको अपने ही मित्र के खिलाफ खबर करने की पीड़ा से गुजरना पड़े।
मुझे नहीं लगता कि पत्रकारों को कुत्ता कहना उनका अपमान है। वे तो घोषित रुप से लोकतंत्र का वॉचडॉग हैं। वॉचडॉग यानी चौकीदार या रखवाला कुत्ता। पत्रकार लोकतंत्र का चौकीदार कुत्ता है। भौंकना उसका काम है। उसका कर्तव्य है कि वह चोरों पर भौंके। यदि वह नहीं माने तो उसे काट दे। पत्रकार का मालिक जनता होती है। उसी के लिए वे लोकतंत्र की रखवाली करते हैं। लेकिन उत्तराखंड में हाल के सालों में यह हुआ है कि मुख्यमंत्रियों ने कुछ चैनलों,अखबारों और पत्रिकाओं के मालिकों और उनके कारिंदे पत्रकारों को अपने गेट पर बांध दिया।
इधर राज्य में डकैती पड़ती रही और पत्रकारिता के रखवाले कुत्ते हड्डी चबाने में व्यस्त रहे। उल्टे उन पर भौंकते रहे जो डकैती का विरोध कर रहे थे। देश में भी यही हाल है। अखबारों और चैनलों के मालिकों ने या तो सत्ता, दलों के गेट पर बंधे कुत्ते की नियति स्वीकार कर ली है या फिर वे कारपोरेट घरानों के गेट पर बंधे कुत्ते बनने की भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता और पत्रकारों के बारे में होने वाली टिप्पणियां यदि ज्यादा कर्कश और अमर्यादित होती जा रही हैं तो उससे हमें खुद को भी टटोलना होगा।
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और जनपक्ष टुडे के एडिटर राजन टोडरिया के फेसबुक वाल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया.





