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प्रसिद्ध समाजवादी गांधीवादी नेता बनवारी लाल शर्मा का निधन

प्रसिद्ध समाजवादी गांधीवादी नेता बनवारी लाल शर्मा जी का चंडीगढ़ में देहान्त हो गया। वे इस परंपरा के उन आखिरी स्तम्भों में थे, जिन्होंने देश को साम्राज्यवाद और भूमंडलीकरण के चंगुल से बचाने में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। इलाहाबाद में तो वे एक व्यक्ति से ज्यादा संस्थान के रूप में उपस्थित थे, जिनके होने का मतलब भूमण्डलीकरण विरोधी गोष्ठियों, शिविरों, फिल्म समारोहों और मीडिया वर्कशाप का लगातार होते रहना तो था ही, उनके होने का पर्याय यह भी था कि आप बिना रासायनिक खादों से उपजे अनाज और तेल भी उनके आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यालय से प्राप्त कर सकते थे।

प्रसिद्ध समाजवादी गांधीवादी नेता बनवारी लाल शर्मा जी का चंडीगढ़ में देहान्त हो गया। वे इस परंपरा के उन आखिरी स्तम्भों में थे, जिन्होंने देश को साम्राज्यवाद और भूमंडलीकरण के चंगुल से बचाने में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। इलाहाबाद में तो वे एक व्यक्ति से ज्यादा संस्थान के रूप में उपस्थित थे, जिनके होने का मतलब भूमण्डलीकरण विरोधी गोष्ठियों, शिविरों, फिल्म समारोहों और मीडिया वर्कशाप का लगातार होते रहना तो था ही, उनके होने का पर्याय यह भी था कि आप बिना रासायनिक खादों से उपजे अनाज और तेल भी उनके आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यालय से प्राप्त कर सकते थे।

आज़ादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता डॉ बनवारी लाल शर्मा जी का ह्रदय गति रुकने से चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में निधन हुआ। चंडीगढ़ में एक सभा को संबोधित करते हुए कल उन्हें कुछ तकलीफ के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले कुछ महीनों से उनके स्वास्थ्य को लेकर परेशानी बढ़ गयी थी फिर भी वे निरंतर जन आंदोलनों की मदद और साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ने की रणनीति पूरे देश भर घूमकर बनाते रहे। इंदौर में आगामी नवंबर महीने में आज़ादी बचाओ आन्दोलन के वार्षिक अधिवेशन की तैयारी को लेकर वे इन दिनों काफी व्यस्त चल रहे थे।

अपना पूरा जीवन उन्होंने विदेशी कंपनियों के विरोध में और स्वदेशी विचार के प्रचार में लगाया। ५ जून १९८९ को प्रो. रघुनाथ जी, राम धीरज और अन्य साथियों के साथ मिलकर आज़ादी बचाओ आन्दोलन की स्थापना इलाहाबाद में की जिसको एक विधिवत ढांचा सेवाग्राम के अधिवेशन में दिया गया। बनवारी लाल जी ७० के दशक में जे पी आन्दोलन में बहुत ही करीब से जुड़े रहे और लाखों लोगों के साथ जेल भी गए। गांधीवादी विचारों के साधक – असहयोग और सीधी कार्यवाई में विश्वास रखने वाले बनवारीलाल जी ने स्वार्थ रहित और सादगी भरा जीवन व्यतीत किया। अपनी धुन के पक्के नब्बे के शुरूआती दशक में जब आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हो रहा था तब अन्य जन आंदोलनों – सर्व सेवा संघ, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM), छोटे उद्योगों के संगठन आदि के साथ मिलकर GATT, WTO, विश्व बैंक आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और प्रक्रियाओं का पुरजोर विरोध किया। कोका कोला, मोंसंतो, कारगिल और अन्य विदेशी कंपनियों के सामने उन्होंने जबरदस्त मोर्चा पूरे देश में खोला।

इसी सिलसिले में एक फरवरी २००१ को ३०० किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला इलाहाबाद से वाराणसी, वाराणसी से जौनपुर और जौनपुर से इलाहाबाद का आयोजन किया, जिसमे स्कूल के बच्चों, शिक्षकों के अलावा अन्य कार्यकर्ता और आम जन शामिल हुए। मानव श्रृंखला ने सथारिया के पेप्सी प्लांट और रजातालाब में कोका कोला के प्लांट को घेरा जो कि बढ़ते वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के प्रतीक थे।

भारत के परमाणु हथयार के कार्यक्रम और परमाणु उर्जा के संयत्र का उन्होंने हमेशा विरोध किया और परस्पर लोगों को लामबंद करने और साथ लाने की कोशिश की। पिछले कुछ सालों में उन्होंने विभिन्न यात्राओं के द्वारा जैतापुर, कूदंकुलम, फतेहाबाद, चुट्खा परमाणु परियोजनों के खिलाफ वहाँ चल रहे संघर्षों को समर्थन ही नहीं दिया बल्कि सरकार के ऊपर एक दवाब भी बनाया। अन्याय के प्रति लड़ने को हमेश तत्पर बनवारी लाल जी ने शांति और न्याय यात्रा के जरिये छत्तीसगढ़ में हो रही हिंसा के विरोध में भी आवाज़ उठाई और शांति की पहल की।

NAPM के साथ बनवारी लाल जी का शुरूआती दौर से ही साथ रहा। शुरुआत के दिनों में वे राष्ट्रीय समनव्यक भी रहे और एनरोन विरुद्ध संघर्ष, पलाचिमादा कोका कोला संघर्ष, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि कई संघर्षों में साथ रहे और हाल में जन संसद की प्रक्रिया में साथ साथ रहे।

बनवारी लाल जी एक समाजसेवी के साथ साथ गणित के माने हुए विद्वान भी थे। यही कारण भी है कि अपने पीछे वे एक तैयार की हुई कार्यकर्ताओं की पूरी टोली छोड़े जा रहे हैं। बलाश नाम से वे 'नई आज़ादी' मुखपत्र में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में लिखते और जन संसाधनों के सुरक्षा और समुदायों के हक़ के लिए लड़ते। साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर उन्होंने अपनी भूमिका निभाई।

 

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