850 स्क्वायर फुट की ज़मीन की भला गांव में क्या कीमत है? इतनी ज़मीन तो गांव में किसी मजदूर को झोपड़ी डालने के लिए कोई यूं ही दे देता है. लेकिन 850 स्क्वायर फुट के कारपेट एरिया पर नोएडा के एक्सप्रेस वे पर बना एक फ्लैट आज 65 लाख रुपये से ज्यादा का है. 450 स्क्वायर फुट का एक कमरे वाला फ्लैट तो एक्सप्रेस वे पर 35 से 45 लाख रुपये में बिक रहा है. एक्सप्रेस वे अभी बसा नहीं है लेकिन यह सड़क क्योंकि ग्रेटर नोएडा जा रही है इस लिए दो गज ज़मीं भी यहां गजराज के दाम बिक रही है.
दिलचस्प बात ये है कि यह 850 या 450 स्क्वायर फुट के फ्लैट 20 से 40 मंजिल की इमारतों पर धरे गए हैं. यानी भूकंप में धराशायी हुए तो फ्लैट के मालिक ये भी न बता पाएंगे कि उनका उजड़ा आशिआना कहां टंगा था. ख़ैर मेरा इरादा किसी बिल्डर की टांग खींचने का नहीं है. मेरा इरादा यह भी साबित करना नहीं है कि आप और हम अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से आज एक्सप्रेस वे पर एक छोटा सा फ्लैट भी नहीं खरीद सकते. दरअसल मेरा इरादा तो आज यह बताने का है कि 1976 में जब यूपी सरकार ने नोएडा को जन्म दिया था तो जनता से ये वायदा किया था कि यहां रोजगार और रिहाइश का मौका हर तबके को दिया जायेगा. इसलिए नोएडा अथॉरिटी को तेज़ी से फैसले लेने के खास अधिकार नोएडा एक्ट के तहत दिए गए.
20-25 साल तो सब कुछ ठीक चला. अथॉरिटी ने सस्ती दरों पर हर किसी को रहने के लिए छत मुहैया कराई. लेकिन फिर सरकार उन वायदों को भूलने लगी जहां नोएडा एक्ट 1976 के तहत फैसले जनहित में लेने का वचन दिया गया था. अगर सरकार की नीयत ही बिगड़ने लगे तो नियम तोड़ने या मरोड़ने में वक्त कितना लगता है. और बदनीयती के इस खेल में नेता और नौकरशाह दोनों निर्लज्ज हो जाएं तो क्या कहने. लिहाजा एक 'महा सड़क' बनाने के नाम पर हज़ारों-लाखों एकड़ ज़मीन कौडि़यों के भाव नीलाम की गयी. दरअसल इस सड़क की आड़ में ही सरकार ने नियमों की बलि चढ़ा दी. यूपी सरकार की दलील थी की सड़क बनाने के पैसे राजकोष में नहीं हैं और न ही इस प्रोजेक्ट को फाइनेंस करवाने का क्रेडिट है. लिहाजा सड़क के बदले ठेकेदार/बिल्डर को सरकार उतने मोल की ज़मीन दे सकती है. नीयत सड़क बनाना नहीं बल्कि सड़क के बदले ज्यादा से ज्यादा ज़मीन लुटाने की थी.
शायद इसलिए जनहित को ताक पर रख, सरकार ने मोल भाव किया ही नहीं. नियमत: सरकार के पास अगर सड़क बनाने का पैसा नहीं था तो कायदे से उतनी ही ज़मीन देनी चाहिए थी जितनी की सड़क बनाने की कीमत हो. लेकिन यहां तो हिस्सा बांट हो रही थी. लिहाजा सड़क के नाम पर नोएडा ही नीलाम कर दिया गया.
लूट का एक दरवाज़ा खुला तो फिर दूसरा दरवाज़ा खुलने में देर कहां थी. मास्टरप्लान में बदलाव हुए और अब बारी नॉएडा एक्सटेंशन की थी. शहर का एक और बड़ा हिस्सा लुटाया गया. इस लूट का आलम यह था की 30 साल से आम लोगों के लिए रियाअती मकान बना रही नोएडा अथॉरिटी मकान बनाना ही भूल गयी. उधर सरकार ने नोएडा के दो और बेशकीमती सेक्टर अपने मनपसंद शराब माफिया को बेच दिए. जिस इलाके में ज़मीन दो लाख रुपये गज हो वहां 10 परसेंट पर 80 हज़ार रुपये गज पर सौदा हुआ. ज़मीन लूटने की यूपी में यह मिसाल आपको डाकू प्रभावित एटा और मैनपुरी जिलों में भी नहीं मिलेगी.
मुझे इससे ज्यादा घबराहट और बेचैनी यह सोच कर हो रही है कि तत्कालीन सरकार के इन लूट भरे फैसलों पर जिन नेताओं ने सदन चलने नहीं दिया और सीबीआई जांच की मांग की, जब उन नेताओं की सरकार बनी तो उन्होंने जांच कराने की जगह लुटेरे बिल्डरों से ही हाथ मिला लिए. बहरहाल आपके अरमानों की इस लूट पर फिर तफसील से लिखेंगे लेकिन एक शेर भोले भाले बहुजन समाज के लिए….
मेरा मुंसिफ ही मेरा कातिल है
मेरे हक में फैसला क्या देगा.

लेखक दीपक शर्मा जानेमाने खोजी पत्रकार हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में आतंकी नेटवर्क और माफिया गिरोहों के विषय में वो गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं. दीपक ने वर्ष 2002 में विशेष संवाददाता के रूप में आज तक ज्वाइन किया और वर्तमान में वो एडीटर के रूप में आज तक में विशेष खोजी टीम का नेतृत्व करते हैं.





