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सुख-दुख...

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी की जयंती के बहाने : दामाद की तरह बुलाए जाने की प्रतीक्षा में मीडिया वाले

एक हिंदी सेवी की याद में कल की मेरी शाम जैसी बीती, वैसी कभी नहीं बीती। लखनऊ के खुर्शेदबाग में कल भैय्या जी यानी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी को उन्हीं के नाम से बने प्रेक्षागृह में याद किया गया। हिंदी की अस्मिता का जो गान उन्होंने गाया है, उस को याद किया गया। उनकी ११९वीं जयंती पर। हिंदी वांग्मय निधि द्वारा आयोजित भक्ति संगीत से। कोई दिखावा नहीं, कोई औपचारिकता भी नहीं। मतलब प्रचार आदि के टोटकों से कोसों दूर। पर हाल और बाहर लान भी खचाखच भरा था। पर कोई एक प्रेस फ़ोटोग्राफ़र या संवाददाता भी नहीं। किसी अखबार में कोई खबर भी नहीं थी। न कल, न आज। किसी चैनल की तो खैर बात ही क्या। ज़्यादातर लखनऊ के लेखकों में भी लोग लापता थे। पंडित श्रीनारयण चतुर्वेदी खुद भी तमाशा अदि से हमेशा दूर रहने वालों में थे। शायद उन्हीं की इच्छा का मन रखने के लिए उनके परिवारीजन प्रेस आदि के तमाशे आदि से इस कार्यक्रम को दूर रखते हैं।

एक हिंदी सेवी की याद में कल की मेरी शाम जैसी बीती, वैसी कभी नहीं बीती। लखनऊ के खुर्शेदबाग में कल भैय्या जी यानी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी को उन्हीं के नाम से बने प्रेक्षागृह में याद किया गया। हिंदी की अस्मिता का जो गान उन्होंने गाया है, उस को याद किया गया। उनकी ११९वीं जयंती पर। हिंदी वांग्मय निधि द्वारा आयोजित भक्ति संगीत से। कोई दिखावा नहीं, कोई औपचारिकता भी नहीं। मतलब प्रचार आदि के टोटकों से कोसों दूर। पर हाल और बाहर लान भी खचाखच भरा था। पर कोई एक प्रेस फ़ोटोग्राफ़र या संवाददाता भी नहीं। किसी अखबार में कोई खबर भी नहीं थी। न कल, न आज। किसी चैनल की तो खैर बात ही क्या। ज़्यादातर लखनऊ के लेखकों में भी लोग लापता थे। पंडित श्रीनारयण चतुर्वेदी खुद भी तमाशा अदि से हमेशा दूर रहने वालों में थे। शायद उन्हीं की इच्छा का मन रखने के लिए उनके परिवारीजन प्रेस आदि के तमाशे आदि से इस कार्यक्रम को दूर रखते हैं।

शैल चतुर्वेदी जी से बात चली तो वह कहने लगे कि हमने तो प्रेस विज्ञप्ति भी कहीं नहीं भेजी। तो भी जिस हिंदी के लिए भैय्या जी ने क्या-क्या नहीं किया उनकी याद में कम से कम हिंदी के अखबार वाले अपने मन ही से सही एक छोटी सी खबर भी नहीं चिपका सकते थे? वैसे भी आज-कल मीडिया जिस तरह साहित्यिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों की कवरेज करती है, भगवान बचाए। पता चला कि विमोचन या कुछ और ऐसा ही बहुत पहले हो गया था पर कुछ फ़ोटोग्राफ़र तब नहीं आ पाए थे, अब आए हैं तो एक शाट फिर से हो जाए! और हद्द यह कि लोग दे भी देते हैं। गोया कार्यक्रम न हो नौटंकी हो। किसी फ़िल्म की शूटिंग हो। कि एक रिटेक फिर से हो जाए।

इतना ही नहीं आयोजक और वक्ता भी अपने संबोधन में मीडिया के लोगों को संबोधित करना नहीं भूलते। और मीडिया के लोग? एक विज्ञप्ति भर की बाट जोहते रहते हैं कुत्ते की मानिंद। कि मिले तो भाग लें। या फिर आयोजक लोग ब्रीफ़ कर दें तो नोट कर लें। और दूसरे दिन अखबार में कहां और कैसे यह सब छपेगा और यह छपना भी कार्यक्रम को कितना सम्मानित करेगा, कितना अपमानित, यह भी कोई नहीं जनता। अजब घालमेल है। मेरा तो मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया और राजनीति के लोगों से अब दूर ही रहना चाहिए। एक बात और। कहा जा सकता है कि जब किसी मीडियाजन को बुलाया ही नहीं गया तो कोई कैसे आता भला? क्या यह कोई सरकारी कार्यक्रम था की किसी का शादी विवाह? मैंने देखा है कि कई ऐसी शादियों तक में या तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों या फ़िल्मी कार्यक्रमों में, और भी कई ऐरे-गैरे कार्यक्रम में भी जाने के लिए पत्रकार कैसे तो नाक रगड़ते हैं। बिना बुलाए पहुंचते भी है, दांत चियारते हुए। लेकिन लेखकों आदि के कार्यक्रमों में वह दामाद की तरह बुलाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

लखनऊ में तो हालत यह है कि भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर के भी परिवारीजन अगर आयोजन न करें और अखबारों में उसे छपवाने का यत्न न करें तो लोग भूल जाएं। यशपाल को लोग भूल ही जाते हैं। इस लिए कि उन के बेटे और बेटी में आपस में पटती नहीं है। और कि शायद अब लोग लखनऊ में रहते भी नहीं नियमित। तो यशपाल पर आयोजन नहीं होते लखनऊ में। यशपाल की जन्म-शती चुप-चाप निकल गई। इसी तरह मजाज लखनऊ की जन्म-शती भी अहिस्ता से गुज़र गई। पर किसी को पता नहीं चला। इसी तरह श्रीनारायण चतुर्वेदी की भी जन्म-शती चुपके से गुज़र गई। पर अखबार वालों और लेखकों की इन की सुधि कभी नहीं आई।

बहरहाल चतुर्वेदी जी की जयंती तो २८ सितंबर को थी पर उन की याद में आयोजन २९ सितंबर को किया गया। अब आज लोग भले भूल गए हों श्रीनारायण चतुर्वेदी और उन की हिंदी की जय को। पर हिंदी के लिए वह बार-बार जूझते रहे। अंगरेजों से भी। पंडित मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन और श्रीनारायण चतुर्वेदी का हिंदी का लिए योगदान अविस्मरणीय है। बहुत कम लोग अब जानते हैं कि अदालतों मे पहले हिंदी नहीं थी। इस के लिए मदन मोहन मालवीय ने लंबी अदालती लडा़ई लडी़ फिर कहीं जा कर अदालतों में ब्रिटिश पीरियड में ही हिंदी लागू हुई थी। और काम-काज हिंदी में होने लगा। मदन मोहन मालवीय के पौत्र तो बाद में उच्च न्यायल में न्यायमूर्ति बने। उन्हों ने हमेशा हिंदी में ही आदेश लिखवाए। वैसे ही पहले पाठ्यक्रमों में पहले हिंदी अनिवार्य विषय नहीं थी। कक्षा ३ पढाई अंगरेजी माध्यम से होती थी। मैट्रिक में हिंदी एक वैकल्पिक विषय थी। इस के आगे फिर हिंदी पढा़ई भी नहीं जाती थी। तो शिक्षा विभाग में आने पर उन्हों ने पाठ्यक्रम तैयार करवाया और पाठ्यक्रमों में हिंदी को अनिवार्य विषय करवाया। स्कूलों में हिंदी में अंत्याक्षरी और स्कूलों में कवि सम्मेलन भी श्रीनारायण चतुर्वेदी की देन हैं।

यह सब उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के निमित्त किया। कहते हैं कि १९३५-३६ में गोरखपुर में उन के द्वारा आयोजित एक कवि सम्मेलन तो ३ दिन तक चला। जिस के हर सत्र में एक रस की ही कविताएं पढी़ गईं। चतुर्वेदी जी इंगलैंड से पढ़ कर आए ज़रुर थे पर भारतेंदु जी के लिखे- ;निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिया को शूल।' का मर्म भी जानते थे। माध्यमिक परीक्षाओं में देवनागरी के अंकों का प्रयोग भी शुरु करवाया। एक समय गवर्नर हैलट के सलाहकार रहे शेरिफ़ ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए रोमन लिपि अपनाने का आदेश दिया जिसे चतुर्वेदी जी ने मानने से इंकार कर दिया। ऐसे ही जब-जब हिंदी पर कोई आंच आई उन्हों ने बढ़ कर उसे रोक लिया। चाहे वह ब्रिटिश राज रहा हो या, आज का राज। राजनीतिक कारणों से जब उर्दू को हिंदी पर थोपने का काम हुआ तो वह खुल कर पूरी ताकत से खड़े हो गए। विरोध में हिंदी संस्थान का भारत-भारती पुरस्कार तक ठुकरा दिया। वह दूरदर्शन में भी उप-महानिदेशक रहे और वहां भी हिंदी की सेवा में लगे रहे। बरसों-बरस सरस्वती जैसी पत्रिका के संपादक रहे। दरअसल वह कृतित्व के लिए कम और व्यक्तित्व के लिए ज़्यादा जाने गए। उन की छिटपुट रचनाओं खास-कर हिंदी प्रसंग की कुछ कविताओं और लेखों को छोड़ दें तो उन का व्यक्तित्व उन के कृतित्व पर हमेशा भारी रहा है। वह हमेशा हिंदी के प्रचारक ही बने रहे। साहित्य सेवा से ज़्यादा उन्हों ने हिंदी सेवा की और कई बार हदें लांघ कर, हदें तोड़ कर वह जय हिंदी करते रहे। पंडित विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि ‘हम उन के हैं’ यह भाव हमें हिंदी के भाव से भरता है। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी खुद भी कहते थे ‘हम पल्लव हैं। किंतु न हम हीन हैं, न दीन और दयनीय। बिना हमारे वंदनवार असंभव है…।’ तो यह सिर्फ़ वह अपने लिए ही नहीं, हिंदी की अस्मिता के लिए भी कहते थे। पुरुषोत्तम दास टंडन के वह इलाहाबाद में सिर्फ़ पड़ोसी ही नहीं थे। उन के सहयात्री भी थे। जीवन भर वह हिंदी का परचम ही फहराते रहे।

लेकिन भैय्या जी को इतने साल बाद भी खूब मन से याद करने के लिए सो काल्ड मीडिया और तमाम लेखक लोग भले न रहे हों उस शाम पर उन के परिवारीजन और उन के इष्ट-मित्र बहुत थे। लेखकों में प्रसिद्ध इतिहासकार योगेश प्रवीन न सिर्फ़ उपस्थित थे बल्कि दो उम्दा भजन भी उन्हों ने बाकायदा हारमोनियम बजा कर गाईं। एक मीरा की लिखी भजन, ' जागो वंशी वारे ललना, जागो मेरे प्यारे !' और दूसरी अपनी लिखी हुई भजन, 'सागर के मेघों से नीला अंबर भींग रहा है/ मेरे दृग-जल से प्रभु का पीतांबर भींग रहा है/ अश्रुधार से कोई तेरे चरण पखार रहा है/ गोवर्धन छाया है फिर भी गिरिधर भींग रहा है।' योगेश प्रवीन की लिखी और गाई यह भजन है तो श्रीकृष्ण को संबोधित पर यहां यह भजन मानो पंडित श्रीनारायन चतुर्वेदी पर ही साकार हो गई थी। क्यों कि सभी के सभी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी की ही याद में भींग रहे थे। सब के दृग-जल से पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का पीतांबर भींग रहा था। अदभुत था यह।

योगेश प्रवीन कोई पेशेवर गायक नहीं हैं पर वह खूब झूम कर गा रहे थे। उनके इस रूप से मैं पहली बार परिचित हो रहा था। यहां जितने भी लोगों ने भजन गाई कोई पेशेवर गायक नहीं था। प्रारंभ अदित्य नाथ चतुर्वेदी ने सरस्वती वंदना से किया संस्कृत में सस्वर। फिर इस का हिंदी रुपांतरण भी प्रस्तुत किया सस्वर। चतुर्वेदी जी के बेटे अशोक चतुर्वेदी जो पूर्व एयर मार्शल हैं। और रिटायर होने के बाद भातखंडे से बाकायदा गायन सीखा है, ने दो भजन सुनाई। उन के दूसरे बेटे डाक्टर आशुतो्ष चतुर्वेदी जो सर्जन हैं, ने समापन भजन गाई। पर प्रशासनिक अधिकारी अनीता श्रीवास्तव और आकाशवाणी की पैक्स रश्मि चौधरी ने भी बहुत सुंदर भजन प्रस्तुत किए। विजय अग्निहोत्री ने पारंपरिक भजन गाए। तो इलियास ने सूर और तुलसी के पद सुनाए।

चतुर्वेदी जी के पोते अरविंद चतुर्वेदी एसटीएफ़ में डिप्टी एस पी हैं। उन्होंने भी अपने बेटे हेमंग चतुर्वेदी के साथ चतुर्वेदी जी की एक कविता का सस्वर पाठ किया। भाषा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी भी उपस्थित थे। उन्होंने चतुर्वेदी जी के चित्र पर माल्यार्पण किया, बजरंशरण तिवारी को उत्तरीय ओढा़ कर सम्मानित किया। और साहित्य संगम पत्रिका का विमोचन किया। चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व पर शैलेंद्र कपूर ने वक्तव्य पढ़ा। और कहा कि चतुर्वेदी जी द्वारा लिखे गए संपादकीय पर भी एक किताब होनी चाहिए। उन के और काम पर भी बाकायदा शोध होना चाहिए। सब कुछ इतना सरस और इतना अपनत्व भरा था कि मन निहाल हो गया। वैसे तो पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी हिंदी की सांस-सांस में बसे हैं पर कल की शाम ने उस सांस में सुबास भर दिया। एक टटकापन टांक दिया मन पर। यह टटकापन मन में हमेशा बसा रहे और हिंदी की जय होती रहे, हर समय, हर बरस ऐसे ही सब के दृग-जल से पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का पीतांबर भींगता रहे। बस और क्या चाहिए भला?

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

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