: यशवंत अपने को अकेला न समझें : भड़ास4मीडिया से मेरा परिचय लगभग दो साल पहले हुआ था मैं कभी यशवंत से नही मिला हूं मगर आज ऐसा लग रहा है कि यश वंत से काफी पुरानी मुलाकात है क्यांकि भड़ास के माध्यम से उन से रोजाना मुलाकात जो होती रही है। भड़ास से पहली मुलाकात के बाद से ही यह आदत बन गई है कि भले ही एक बार अखबार न देख पाउं मगर भड़ास रोजाना देखने की आदत बन गई है। केवल देखना ही नही बल्कि कुछ खबरों का पढना भी जरूरी हो गया है। कभी मन में आता है तो कमेंट भी लिख देता हूं। आज यशवंत जेल में हैं मैं उन के इस संकट में बराबर का साझीदार हूं। उनकी तथा उनके परिवार और चाहने वालों की पीड़ा को मैं भली भांति समझ सकता हूं क्योंकि 2008 में मैं भी पुलिस और कुछ नेताओं के षडयंत्र और मनमानी का शिकार होकर एक महीना जेल में बिता चुका हूं जबकि मेरे खिलाफ कोई एफ. आई. आर. भी नहीं थी। इसलिए मैं भली भांति जानता हूं कि जेल का जीवन कितना कष्टदायी होता है। आज यशवंत पर जो बीत रही है, उसे मैं अच्छी तरह से महसूस कर रहा हूं।
पहली बार भड़ास देख कर यह लगा था कि मीडिया में खबरों की एक नई शुरुआत हो गई है। पत्रकार दूसरों के शोषण एवं उत्पीड़न के मामले जोरशोर से उठाते रहते हैं मगर अपने शोषण एवं उत्पीड़न के बारे में एक शब्द नहीं लिख पाते। मामला अखबारों में बंपर छंटनी का हो, वेज बोर्ड लागू न होने का हो या पत्रकारों के अन्य किसी प्रकार के उत्पीड़न का, इस बारे में मीडिया प्रिंट हो या इलेक्टानिक, मौन ही रहता है। भड़ास से पहले ऐसा कोई मंच ही नहीं था जो पत्रकारों की आवाज उठा सके। भड़ास ने पत्रकारों को वह मंच दिया और जहां भी उनके साथ अन्याय होता दिखा यशवंत वहां पत्रकारों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े दिखे। बड़े अखबारी संस्थानों से पंगा लेना बडे़ दिल गुर्दे का काम है जिसे यशवंत ने बखूबी अंजाम दिया।
यही नहीं, यशवंत ने कई उन कथित सेलीब्रिटी पत्रकारों का भी असली चेहरा सब को दिखाया जिन के काले कारनामों के बारे में जानते तो सब थे मगर कहने का साहस कोई नही जुटा पाता था। इस प्रकार यशवंत ने वह किया जो अब तक नही हो पाया था। यही कारण रहा कि भड़ास से न केवल पत्रकार जुड़े बल्कि अन्य पाठक भी निरंतर जुड़ते गए और यह सिलसिला जारी है। पचास साल से अधिक के पत्रकारीय जीवन में मेरे पास भी ऐसी काफी सामग्री थी जिसे अखबार नहीं छाप सकते थे। डरते डरते पत्रकारों, अखबारों और सम्पादकों के बारे में वह सामग्री भड़ास को भेजी और यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि भड़ास ने वह सब अविलंब प्रकाशित कर दिया।
भड़ास ने न केवल अखबारों और पत्रकारों के मामले बल्कि पत्रकारिता से गायब हो रहे सामाजिक सरोकारों को भी अपना विषय बनाया। निर्मल बाबा के फ्राड का पर्दाफाश जिस प्रकार भड़ास ने किया उतना साहस अन्य नहीं जुटा सके। सच तो यह है कि भड़ास पर निर्मल बाबा का फ्राड उजागर होने के बाद ही अन्य अखबारों एवं चैनल्स का ध्यान इधर गया और निर्मल बाबा का किला ध्वस्त होने लगा। नीरा राडिया मामला हो या अमर सिंह के टेप का मामला, बाजी भड़ास के हाथ ही रही ।
अब जिस प्रकार यशवंत को गिरफ्तार किया गया है उसमें भी यह साफ नजर आ रहा है कि यह सारी साजिश उच्च स्तर पर रची गई है तभी तो पुलिस ने पूरे लाव लश्कर के साथ यशवंत को ऐसे गिरफ्तार किया मानो वह कोई बड़ा अपराधी हो। यही नहीं एक ही दम्पति द्वारा दो अलग अलग थानों में मुकदमे दर्ज कराने का मकसद यही लगता है कि यशवंत को लम्बे समय तक जेल में रखा जाए। एक थाने के केस में जमानत मिलते ही दूसरे थाने की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंच जाएगी और फिर जमानत के लिए वही प्रक्रिया दोहराई जाएगी। शातिर लोग अपने विरोधियों से निपटने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाया करते हैं। स्थानीय पुलिस पर दबाव के चलते ही उन पर संगीन धाराएं लगाई गई हैं ताकि जमानत आसानी से न मिल सके मगर अदालतें पुलिस की इस मंशा को भांप ही लेती हैं। जहां तक रंगदारी मांगने का मामला है तो यह मामला रंगदारी का न हो कर उधार मांगने का है इस आशय की एक पोस्ट मीडिया खबर पर मौजूद थी मगर जब देखा कि यह खबर तो सारे प्रकरण को मटियामेट कर देगी तो एक सोची समझी योजना के चलते यह पोस्ट ही डिलीट कर दी गई।
आज यशवंत नामक शेर को पिंजड़े में बंद कर रखा है और मानवाधिकारों के झंडाबरदार अखबार और खबरिया चैनल मौन हैं। यही नहीं, एकाध अखबार तो अपनी पुरानी खुन्नस निकालने के लिए यशवंत की गिरफ्तारी का औचित्य भी सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं, लानत है इन पर। जहां तक अखबारों में काम करने वाले उन पत्रकारों की बात है जिनकी आवाज यशवंत उठाते रहे हैं, उनकी मजबूरी यह है कि अपने संस्थान की नीतियों के चलते वह इस बारे में कुछ नहीं लिख पा रहे हैं मगर कई पत्रकारों से बात करने पर पता चला कि यशवंत की गिरफ्तारी को लेकर वह अंदर ही अंदर कसमसा रहे हैं। फेसबुक पर अनेक लोग इस गिरफ्तारी का जम कर विरोध कर रहे हैं। पत्रकार संगठन तो इस बारे में प्रायः मौन हैं मगर स्थानीय स्तर पर पत्रकार और अन्य प्रबुद्ध जन इस बारे में सामने आने लगे हैं। अब यह लड़ाई धीरे धीरे सड़कों पर आ रही है इसलिए यशवंत भाई अपने को अकेला न समझें।
डा. महर उद्दीन खां
वरिष्ठ पत्रकार
गौमतबुद्ध नगर
(वरिष्ठ पत्रकार डा. महर उद्दीन खां ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास सात जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास [email protected] के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)
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