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झारखंड सूचना जन संपर्क विभाग में लूट का नया खेल : उर्दू अखबार के पहले अंक में दिया फुल पेज रंगीन विज्ञापन

इन दिनों झारखंड सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग में लूट का आलम है। एक लंबे समय तक पद खाली रहने के बाद जब एक सीसीएलकर्मी को निदेशक बनाया गया तो उम्मीद बनी थी कि इस विभाग के दिन बहुरेंगे और सरकारी विज्ञापनादि में जो गोरखधंधा चल रहे हैं, वे बंद भले न हों, उसमें कमी जरूर आयेगी। दुर्भाग्य कि फिलहाल यहां ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है और भ्रष्टाचार का पानी सिर से उपर बहने लगा है।

इन दिनों झारखंड सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग में लूट का आलम है। एक लंबे समय तक पद खाली रहने के बाद जब एक सीसीएलकर्मी को निदेशक बनाया गया तो उम्मीद बनी थी कि इस विभाग के दिन बहुरेंगे और सरकारी विज्ञापनादि में जो गोरखधंधा चल रहे हैं, वे बंद भले न हों, उसमें कमी जरूर आयेगी। दुर्भाग्य कि फिलहाल यहां ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है और भ्रष्टाचार का पानी सिर से उपर बहने लगा है।

कहने को तो इस विभाग में अभी तक बिहार विज्ञापन नियमावली ही लागू है लेकिन, यहां कोई कायदा कानून नजर नहीं आता। यहां सब अधिकारियों के ठेंगे पर चलता है। कुछ दिन पहले एक ऐसा उर्दू साप्ताहिक समाचार पत्र हाथ लगा, जिसके राज काफी चौंकाने वाले हैं। रांची से प्रकाशित ''मुल्क की आंखें'' नामक इस उर्दू अखबार के प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त) में ही 15 अगस्त के शुभ अवसर पर एक रंगीन फुल पेज का सरकारी विज्ञापन दे दिया गया है। इस अखबार की एक-दो प्रतियां सूचना एवं जन संपर्क विभाग के अधिकारियों की टेबल के अलावे कहीं भी नजर नहीं आती है।

आखिर इस उर्दू अखबार को एक फुल पेज रंगीन पेज का विज्ञापन कैसे दे दिया गया? इसकी पड़ताल करने के संदर्भ में जब झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग के कार्यालय में निदेशक से संपर्क साधा तो उनका जबाब चौंकाने वाला था कि यहां ऐसा हो ही नहीं सकता। जब उन्हें अखबार की प्रतियां दिखाई गई तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुये विभाग के एक अधिकारी के सामने दूसरे अधिकारी को बुलवाया और मामले की जानकारी ली। पहले तो उस अधिकारी ने पिछले साल का विज्ञापन होगा-कहकर पीछा छुड़ाने की कोशिश की, और जब उनका ध्यान प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त)  की ओर दिलाया गया तो बोल उठे कि मौखिक आदेश दिया गया होगा।

इस दौरान मैंने बातचीत के चित्र लिये, लेकिन एक कनीय अधिकारी के एकांत में ले जाकर कहने पर निदेशक ने मेरे कैमरे से वे सारे चित्र जबरन डिलीट कर दिये ताकि इस राज का पर्दाफाश होने से रोका जाये। दरअसल कथित उर्दू अखबार को विज्ञापन जारी करना एक लूट का हिस्सा है, जिसका खेल बेरोक-टोक जारी ही नहीं है बल्कि उसका दायरा दिन व दिन बढ़ता जा रहा है।

सवाल है कि प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त) में सारे कायदे-कानून को ताक पर रख कर प्रांत के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष के फोटो समेत फुल पेज का रंगीन विज्ञापन कैसे छप गये। किस अधिकारी ने आम जनता की गाढ़ी कमाई के इस खुली लूट में हिस्सेदारी बंटाई। हालांकि झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा बंदरबांट का यह कोई अकेला मामला नहीं है। इस तरह के अनगिनत मामले हैं। यह एक जांच का विषय है कि फर्जी आकड़ों व कायदे-कानून को ताक पर रख कर इस विभाग में कैसे-कैसे महालूट मची है।

रांची से मुकेश भारतीय की रिपोर्ट.

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