राज्यसभा टीवी को चले साल भर से ज्यादा हो गया है लेकिन कर्मचारियों को सुविधा देने की जगह उनका उत्पीड़न बढ़ता ही जा रहा है. सरकारी कामनवेल्थ खेलों का पर्याय बने इस सफ़ेद हाथी में सारे खर्चों के लिए पैसे हैं. अधिकारियों के फर्जी टूर कराये जाते हैं. मगर कर्मचारियों का हाल बड़ा बुरा है. न बोनस न इन्क्रीमेंट, ऊपर से 12-12 घंटे काम. कानून बनाने वालों को नहीं है कानून का ज्ञान. राज्यसभा टीवी में कार्यरत कर्मियों के लिए नया फरमान जारी हुआ है कि कोई भी कर्मी किसी भी हाल में रोजाना 9 घंटे से कम की शिफ्ट नहीं करेगा. इसके लिए पंचिंग मशीन की व्यवस्था की गयी है.
मज़े की बात ये है कि सभी कर्मियों से किये गए कांट्रैक्ट में साफ़ लिखा है कि उन्हें आठ घंटे काम करना है. अब अगर नौ घंटे से ज्यादा प्रतिदिन काम करना होगा तो क्या राज्यसभा टीवी इसके लिए भुगतान करेगा? इस मुद्दे पर सभी अधिकारी चुप हैं. ज़ाहिर है नौ घंटे प्रतिदिन काम का फरमान लेबर एक्ट और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का खुला उल्लंघन है. इसके अलावा राज्यसभा टीवी प्रबंधन कर्मियों के इन्क्रीमेंट से लेकर सर्विस रुल और सुविधाओं के नाम पर मौन है. कानून बनाने वाली संसद के चैनल में जिस तरह कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं उससे साफ़ है कि मीडियाकर्मियों का उत्पीडन करने में कोई पीछे नहीं है.
राज्यसभा टीवी के एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





