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राज्यसभा टीवी में अप्लाई कर रहे हैं तो इसे जरूर पढ़ें…

: चैनल में हिंदी वालों के लिए कुछ खास नहीं  : नियुक्तियां ठेके पर होंगी जिन्हें तीन साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है : दिहाड़ी मजदूरों से कुछ बेहतर स्थिति वाली इन अस्थायी नौकरियों के लिए फीस तो ठीक है पर हिन्दी में काम ही कम हैं : राज्यसभा टेलीविजन में 20 पदों पर करीब 60 रिक्तियों के लिए आवेदन आंमंत्रित किए गए हैं। लेकिन हिन्दी में सहायक संपादक की जरूरत राज्य सभा टीवी को नहीं है। 90 हजार रुपए प्रतिमाह की फीस वाली यह नौकरी जाहिर है, संपादकीय गुणवत्ता के लिए है। पर हिन्दी में गुणवत्ता की चिन्ता कौन करता है? तो राज्यसभा टीवी को भी इसकी परवाह नहीं है।

: चैनल में हिंदी वालों के लिए कुछ खास नहीं  : नियुक्तियां ठेके पर होंगी जिन्हें तीन साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है : दिहाड़ी मजदूरों से कुछ बेहतर स्थिति वाली इन अस्थायी नौकरियों के लिए फीस तो ठीक है पर हिन्दी में काम ही कम हैं : राज्यसभा टेलीविजन में 20 पदों पर करीब 60 रिक्तियों के लिए आवेदन आंमंत्रित किए गए हैं। लेकिन हिन्दी में सहायक संपादक की जरूरत राज्य सभा टीवी को नहीं है। 90 हजार रुपए प्रतिमाह की फीस वाली यह नौकरी जाहिर है, संपादकीय गुणवत्ता के लिए है। पर हिन्दी में गुणवत्ता की चिन्ता कौन करता है? तो राज्यसभा टीवी को भी इसकी परवाह नहीं है।

मातृभाषा से अलग कोई भी भाषा, खासकर अंग्रेजी अगर कोई सीखता है तो वह किसी पेशेवर से व्यावसायिक शैली में सीखेगा और उसमें एकरूपता रहेगी। पर हिन्दी जैसी राष्ट्रीय और मातृभाषा अपने देश में लोग ऐसे ही सीख जाते हैं और बोलना शुरू करने के साथ ही हिन्दी बोलने लगते हैं। यह अलग बात है कि जो जैसे माहौल में रहते हैं वैसी ही हिन्दी बोलते हैं। इसलिए हिन्दी पर भोजपुरी, मगही, पंजाबी, बांग्ला, मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं का प्रभाव साफ दिखता है और इन भाषाओं के प्रभाव में रहने वालों की हिन्दी वैसी ही होती है।

इसलिए हिन्दी में एकरूपता के लिए संपादन बहुत जरूरी है पर हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं  से लेकर चैनलों में भी इस पर खर्च करने के बारे में  नहीं सोचा जाता है। राज्य  सभा टीवी अपवाद नहीं है।  इसलिए यहां भी हिन्दी कॉपी के लिए वरिष्ठ सहायक संपादक की आवश्यकता नहीं है।

इसी तरह 50,000 रुपए प्रति माह की फीस  वाली प्रोड्यूसर / कॉरसपोन्डेंट की नौकरी के लिए राज्य सभा टीवी में अंग्रेजी में एक प्रोड्यूसर की तो जरूरत है तो हिन्दी के प्रोड्यूसर की जरूरत ही नहीं है। कॉरसपोन्डेंट, हिन्दी अंग्रेजी दोनों में बराबर – दो चाहिए। एक लाख रुपए प्रति माह की फीस पर सीनियर ऐंकर हिन्दी और अंग्रेजी – दोनों में एक-एक चाहिए पर 80 हजार रुपए प्रति माह की फीस वाले कंसलटैंट ऐंकर की आवश्यकता हिन्दी में नहीं है। जबकि अंग्रेजी में इस पद पर तीन रिक्तियां हैं। इसी तरह, 40 हजार रुपए प्रति माह की फीस वाले अंग्रेजी के चार जूनियर ऐंकर की आवश्यकता है। पर हिन्दी में एक भी जूनियर ऐंकर की आवश्यकता राज्यसभा टीवी को नहीं है।

राज्य सभा  टीवी को प्रोड्यूसर तो अंग्रेजी और हिन्दी में अलग-अलग चाहिए  पर सीनियर प्रोड्यूसर में  ऐसा कुछ नहीं है। कुल तीन सीनियर प्रोड्यूसर चाहिए पर अंग्रेजी से या हिन्दी से यह नहीं लिखा है। 75 हजार रुपए की फीस वाली इस नौकरी के लिए हो सकता है जान-बूझकर हिन्दी अंग्रेजी का भेद नहीं किया गया हो ताकि नियुक्ति करने वालों के पास लचीलापन रहे और हेराफेरी की जरूरत हो तो की जा सके।

एक लाख रुपए प्रति माह की फीस पर एक कंसलटैंट की आवश्यकता राज्य सभा टीवी को है पर वह अंग्रेजी की पृष्ठभूमि का होना चाहिए या हिन्दी की पृष्ठभूमि से, यह विज्ञापन में नहीं लिखा है। योग्यता शर्तें मोटा-मोटी ऐसी हैं कि हिन्दी पृष्ठभूमि वाला कोई उम्मीदवार इस पद के लिए आवेदन कर ही नहीं सकता है। वैसे भी, चर्चा है कि इन नियुक्तियों के लिए उम्मीदवार पहले से तय हैं और रिक्तियां उसी हिसाब से निकाली गई हैं। अगर ऐसा है तो भी हिन्दी वालों के लिए संभावनाएं अच्छी नहीं हैं।   

कुल मिलाकार, अंग्रेजी वालों के लिए संभावनाएं अच्छी हैं और हिन्दी वालों के लिए राज्य सभा टीवी में भी कुछ खास नहीं है। कहा जा सकता है कि जिन पदों पर रिक्तियां नहीं बताई गई हैं वो खाली नहीं हैं और इनके लिए राज्य सभा टीवी के पास उम्मीदवार पहले से हैं। पर सवाल उठता है कि अंग्रेजी में कोई ऐसा पद क्यों नहीं है। अगर स्थिति यह है कि अंग्रेजी में वरिष्ठ पदों के लिए लोग मिल नहीं रहे हैं और हिन्दी में वरिष्ठ पदों पर लोगों की जरूरत ही नहीं है तो देश में अंग्रेजी-हिन्दी की भिन्न स्थिति का पता चल जाता है। हिन्दी-हिन्दी करने वालों की आंखें इससे खुल जानी चाहिए। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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