: वेब मीडिया पर मंडराता खतरा : अभी हाल ही में झारखंड के पत्रकार मुकेश भारतीय जो राजनामा डाट काम के संचालक व संपादक हैं, उनकी गिरफ्तारी हुई थी। कारण था पायनियर अखबार के पवन बजाज द्वारा थाने में रंगदारी वसूलने की लिखित शिकायत। इस घटना में सबसे अजीब बात यह रही कि जिस खुलासे के लिए खबर लिखी गई वह खबर पहले ही छप चुकी था, और जब खबर छप चुकी है तो किस बात के लिए रंगदारी मांगने गए थे, क्या खबर नहीं छापने की? पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी रात में की जिससे कई सवाल जन्म लेते है क्या मुकेश भारतीय पत्रकार न होकर कोई बड़ा अपराधी था जो भाग सकता था, इसलिए आनन फानन में उनकी गिरफ्तारी की गई? या कोई ऐसा दबाव प्रशासन के ऊपर बना जिससे उन्हें ऐसा करने के लिए विवश होना पड़ा।
गिरफ्तारी के बाद अखबारों में जो खबर छपी उसे पढकर ऐसा लगता है जैसे वाकई पुलिस को कोई बड़ी सफलता मिली हो एक कुख्यात अपराधी को पकड़ कर। खैर अब वह रिहा हो गए हैं। सच्चाई सबके सामने है। ठीक उसी तरह भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की गिरफ्तारी हुई। उन पर भी रंगदारी वसूलने का आरोप है। उनकी गिरफ्तारी भी बड़े मीडिया के नामचीन संपादक विनोद कपाड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी की शिकायत पर उत्तर प्रदेश की पुलिस नें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस तरह कि गिरफ्तारियों के पीछे क्या राज है इस बात का खुलासा अगर नहीं होता है तो वेब मीडिया से जुड़े लोगों को भी आम जनता सम्मान की नजर से नहीं देखेगी।
इस घटना के बाद सबसे दुखःद बात यह है कि वेब मीडिया ही आपस में एकजुट नहीं दिख रही जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम साथ न दें तो खिलाफत भी न करें। क्या यशवंत के इस काम को कोई इनकार कर सकता है कि उन्होनें चमक दमक की पत्रकारिता से कहीं ज्यादा उस पत्रकार की आवाज़ बनने की कोशिश की जिन्हें तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया केवल विज्ञापन एजेंट के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। आम गरीब जनता के लिए लिखने वाले कलम की योग्यता का आधार जब विज्ञापन बन जाता था और सच का गला घोंट कर पत्रकारिता करने पर मजबूर होते रहे हैं, ऐसे में वेब पत्रकारिता को नए आयाम तक पहुंचा कर दम तोड़ती कलम को आवाज़ देने का काम क्या सराहनीय नहीं है? हां आज यह वेब मीडिया कुछ लोगों के आंख की किरकिरी बना हुआ है। ऐसे में आपसी बिखराव वेब मीडिया के लिए घातक ही होगा। क्योंकि बचपन में मेरे ख्याल से सबने लकड़हारे कि कहानी पढी होगी जिसमें एकता में बल होता है, का संदेश दिया गया था।
अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि क्या वेब पत्रकार, पत्रकारिता को छोड़कर इतने बड़े रंगदार बन गए हैं कि कारपोरेट जगत के मीडिया से जुड़े लोगों से रंगदारी वसूलने का काम करने लगे हैं या यह सब वेब पत्रकारिता के खिलाफ एक सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है ताकि जो खुलासे वेब पर हो रहे हैं उस पर अंकुश लगे और वेब पत्रकारिता को बदनाम कर उसके अस्तित्व को अस्तित्वहीन कर दिया जाए। क्योंकि आज वेब मीडिया का मुकाम वहां तक पहुंच चुका है जहां वेब पर छपी खबरों को नकारा नहीं जा सकता है। सच क्या है, सामने आना बेहद जरूरी है, नहीं तो एक के बाद एक वेब पत्रकार शिकार बनेंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। और जिस कारपोरेट मीडिया के साथ सत्ता का सहयोग है उनके लिए यह काम नामुमकिन सा भी नहीं दिखाई पड़ता।
अब्दुल रशीद
पत्रकार
सिंगरौली
मध्य प्रदेश
(पत्रकार अब्दुल रशीद ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 3 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास [email protected] के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)
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