याद होगा आपको वो किस्सा जिसमें दैनिक जागरण, नोएडा में मायावती को गाली छप गई थी और फिर मायावती ने जागरण वालों का बैंड बजा दिया था. इसी तरह एक बार राष्ट्रीय सहारा, कानपुर में गाली प्रकाशित हो गई थी. अखबारों में गालियों का छपना बताता है कि कम पैसे में काम कराने के आदी हो चुका अखबार मालिकों के खिलाफ किस कदर आम मीडियाकर्मियों में गुस्सा है, जिसके कारण वे अपनी भड़ास इस तरीके से निकालने पर मजबूर हो जाते हैं. एक मामला नई दुनिया, रायपुर का सामने आया है. है तो मामला जुलाई महीने का लेकिन इसका प्रकाशन भड़ास पर नहीं हुआ था, सो आज प्रकाशित कर रहे हैं.
नईदुनिया के रायपुर संस्करण मे १६ जुलाई के अंक मे पेज ५ पर प्रकाशित लोक निर्माण विभाग के अंबिकापुर संभाग के एक विज्ञापन में गाली छप गई है. विज्ञापन के आखिर में शर्तें और जानकारियों के बाद साफ़-साफ़ गाली लिख दी गई है. इस कारण इस विज्ञापन को १७ जुलाई को फिर से उसी जगह पर प्रकाशित किया गया है. जिस तरह से लिखा गया है, उससे लगता है कि ये एक सोची समझी चाल है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नईदुनिया के हालात काफी खराब है. लोगो में जबरदस्त रोष है पर वो इसे व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं. यही कारण है कि काम करने वाले अपना रोष इस तरह निकाल रहे हैं. विज्ञापन ये रहा… लास्ट में १९ तक तो नियम-शर्तें आदि है. लेकिन २० वें नियम-शर्त में गाली है…. ध्यान से पढ़ें….






