Mayank Saxena : कई न्यूज़ चैनलों में कर्मचारियों की हालत बेहद खराब है…सैलरी बेहद कम है और कई सालों से बढ़ी नहीं है…ऊपर से जानवरों की तरह एक आदमी से कई लोगों का काम कराया जाता है…यही नहीं…सीनियर्स और सम्पादक इनसे बेहद बुरा बर्ताव करते हैं…अपमानित करते हैं…निकाल बाहर करने की धमकी देते हैं… ये पत्रकार साथी बेहद कम आमदनी में मुश्किल से घर चला रहे हैं…माली हालत खराब है तो कर्ज़ भी बढ़ता जाता है…नई नौकरी मिलनी मुश्किल होती है…और सैलरी बढ़ाने की बात पर "तुम्हारी सैलरी में 3 आदमी ले आऊंगा…" जैसे संवाद सुनने को मिलते हैं…कई साथी पत्रकारिता छोड़ना चाह रहे हैं…कई छोड़ गए…
हां, इस बीच सम्पादकों की सैलरी लगातार बढ़ती रही है…लेकिन सम्पादक महोदय जनवादी बनने का कोई मौका नहीं चूकते हैं…ज़्यादातर साथी परिवार वाले हैं….कुछ स्वभावतः कायर है…कुछ आदतन चापलूस…हां सब चाहते हैं कि ये सामने आए…पर कोई साफ लिखता नहीं… "ऐसे में क्यों न अमीर होते जा रहे सम्पादकों और शोषक मालिकों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर के…उसे बेच कर…इन बेचारे पत्रकार साथियों में बांट दी जाए…." (ये स्टेटस किसी की प्रेरणा से है सो साभार….)
Shamim Uddin Ansari आमतौर पर कर्मचारियों और संपादकों की तंख्वाह कितनी होती है?
Mayank Saxena शमीम भाई इश सवाल को सम्पादकों…सीईओस…और मालिकों के लिए छोड़ देते हैं…
Deependra Raja Pandey तनख्वाह का अन्तर इससे पता चल जाता है कि ये संपादक लोग किसी होटल के PDR की शोभा बढ़ाते हैं और कर्मचारीगण किसी शोभनीय ढाबे की तरह दिखने वाले रेस्टोरेन्ट मात्र की।
Amit Sen मयंक सर, आखिर एक पत्रकार का दर्द पत्रकार ही समझ सकता है….
Mohammad Anas dost tum aa jao,ek kaam shuru karne wala hun,thodi punji lagao,jyada munafa kamao,jab paisa rahega to sara anand rahega
Syed Mohammad Altamash Jalal नव भारत मैं तोह मुफ्त मैं ही काम करवाया जा रहा है हालत इतनी नाज़ुक है
Yashwant Singh खूब गदर काटै हो भइये… जब्त करने वाली टीम में हमको जरूर रखिहो… रंगदारी वंगदारी का पुराना अनुभव है..
Shilpa Gupta सर, आपके विचार बिल्कुल सही है लेकिन "ऐसे में क्यों न अमीर होते जा रहे सम्पादकों और शोषक मालिकों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर के…उसे बेच कर…इन बेचारे पत्रकार साथियों में बांट दी जाए…." यह बस एक डिस्कशन का एक टॉपिक रह गया है…. क्यूकि आज तरीबन सारे मीडिया हाउस एक ऐसी बीमारी से ग्रषित हो चुकें है, जो है "परिवारवाद और पहचानवाद" और इस बीमारी ने एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार कर रखा है जिसे तोड़ने के लिये हम सब को अभिमन्यु का इंतजार करना होगा….जो कम से कम इसे भेद तो सके….
Pankaj Narayan मेरे मन में तत्काल कोई अहिंसक सुझाव आ नहीं रहा…
युवा व प्रखर पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.





