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बिहार में ‘दुलारु’ पत्र का दर्ज पा चुके हिंदुस्तान का विज्ञापन जुटाने का ‘मस्त’ अभियान

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की राज्य सरकार की केंद्र से मांग और उससे जुड़ा अभियान- इनका राजनीतिक तौर पर क्या औचित्य है, यह सही है या गलत- यह एक अलग मुद्दा है। इससे कोई सहमत या असहमत हो सकता है। लेकिन इस अभियान से जुड़कर राज्य के एक प्रमुख दैनिक हिन्दी पत्र हिंदुस्तान ने अपने लिए राज्य सरकार से विशेष ‘दुलारु’ पत्र का दर्जा अवश्य पा लिया है। और इससे शायद ही कोई असहमत हो। न सिर्फ यह बल्कि अभियान से जुड़ने की आड़ में सरकार से करोड़ों के विज्ञापन भी लगातार बटोर रहा है। और यही अभियान से जुड़ने की पत्र की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की राज्य सरकार की केंद्र से मांग और उससे जुड़ा अभियान- इनका राजनीतिक तौर पर क्या औचित्य है, यह सही है या गलत- यह एक अलग मुद्दा है। इससे कोई सहमत या असहमत हो सकता है। लेकिन इस अभियान से जुड़कर राज्य के एक प्रमुख दैनिक हिन्दी पत्र हिंदुस्तान ने अपने लिए राज्य सरकार से विशेष ‘दुलारु’ पत्र का दर्जा अवश्य पा लिया है। और इससे शायद ही कोई असहमत हो। न सिर्फ यह बल्कि अभियान से जुड़ने की आड़ में सरकार से करोड़ों के विज्ञापन भी लगातार बटोर रहा है। और यही अभियान से जुड़ने की पत्र की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

हिंदुस्तान अखबार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग के अभियान के समर्थन में दो टूक लिखता है, संपादकीय छापता है, स्वयं कार्यक्रमों का आयोजन करता है और इससे जुड़ी खबरों को रोजाना प्रमुखता से कई पेजों पर छापता है। अखबार अभियान के प्रचार प्रसार के लिए कई कार्यक्रम, संवाद, सम्मेलन आदि का भी लगातार आयोजन कर रहा है। इन आयोजनों के लिए भी कई प्रयोजकों को सहयोगी के तौर पर शामिल करता है। फिर इन कार्यक्रमों की खबर देते समय अन्य प्रायोजकों की चर्चा और उससे जुड़े अधिकारियों के नाम प्रमुखता से चित्र सहित छापा जाता है।

इन कंपनियों, संगठनों के लिए भले ही यह जनसंपर्क का मामला हो लेकिन ऐसे जनसंपर्क पत्रकारिता के एवज में इन्हीं प्रायोजक कंपनियों, संगठनों की तरफ से भी, अलग से और विज्ञापन पाता है। रोजाना इन प्रायोजक कंपनियों, संगठनों के बड़े बड़े विज्ञापन पत्र में देखे जा सकते हैं। यहां भी गौर करने वाली बात है कि इनमें से कई वही कंपनियां, संगठन हैं जो अभियान समर्थक सरकारी दौड़ में भी प्रयोजक थे।

तो क्या यह पेड न्यूज का मामला नहीं बनता, जब कोई पत्र सरकार या उसके राजनीतिक अभियान में समर्थक सहयोगी बनता है और अघोषित तौर पर उसकी एवज में विज्ञापन पाता है? यहां सब कुछ सीधे सीधे पेड न्यूज का मामला शायद न बनता हो। क्योंकि एक खबर को छापने के लिए कोई धनराशि लेने का आरोप न लगाया जा सकता है न साबित किया जा सकता है। लेकिन सरकार समर्थित किसी अभियान को सतत् छापने के एवज में सरकारी-गैर सरकारी विज्ञापन तो खुलेआम जुटाया ही जा रहा है।

यहां कानूनी तौर पर आरोप लगाने में कई झोल-झाल अवश्य निकल जाएंगे, लेकिन पत्र के पाठक रोजाना इस खेल को देख रहे हैं। यहां खबरों की चाहत रखने वाले आम पाठकों के हिस्से में भी सेंधमारी खूब हो रही है। पत्र लगभग रोजाना एक से दो पेज और जब वह स्वयं कोई संवाद या कार्यक्रम आयोजित करता है (जो एकाध दिन छोड़ कर होता ही रहता है) तो तीन से चार पेज अपने प्रायोजित कार्यक्रम की खबर से ही भर देता है। बड़ी बड़ी तस्वीरें छापी जाती हैं। जो पाठक अन्य खबरों के लिए भी उतने ही अधिक दाम में अखबार खरीदते हैं, उन्हें कम खबरें ही पढ़ने को मिल पाती हैं और वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

लेखिका लीना पटना की निवासी हैं और मीडियामोरचा की संपादक हैं.

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