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लखनऊ जेल से छूटे पत्रकार शगुन त्यागी लिख रहे ‘राजद्रोह’, इसी किताब का एक अंश

26 जुलाई 2012,  उत्तर प्रदेश के इतिहास में  कभी ना भुलाया जाने वाला दिन कुछ जिसे याद करके  कुछ लोग घड़ियाली आंसू बहाएंगे तो कुछ इस दिन को याद कर दिवाली मनाएंगे… लेकिन समय का चक्र जब जब 26 जुलाई पर आकर ठहरेगा, उत्तर प्रदेश का हर बाशिंदा वो मंज़र ज़रूर याद करेगा… आप सोच रहे  होंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ था 26 जुलाई 2012 को ? आखिर क्या वजह है जो उत्तर प्रदेश का जनमानस 26 जुलाई 2012 को याद करेगा ? 26 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शहर की भीड़ भाड़ को चीरते हुए सायरनों के शोर के साथ तमाम नीली और लाल बत्ती लगी गाड़ियां इधर से उधर दौड़ रही थी…

26 जुलाई 2012,  उत्तर प्रदेश के इतिहास में  कभी ना भुलाया जाने वाला दिन कुछ जिसे याद करके  कुछ लोग घड़ियाली आंसू बहाएंगे तो कुछ इस दिन को याद कर दिवाली मनाएंगे… लेकिन समय का चक्र जब जब 26 जुलाई पर आकर ठहरेगा, उत्तर प्रदेश का हर बाशिंदा वो मंज़र ज़रूर याद करेगा… आप सोच रहे  होंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ था 26 जुलाई 2012 को ? आखिर क्या वजह है जो उत्तर प्रदेश का जनमानस 26 जुलाई 2012 को याद करेगा ? 26 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शहर की भीड़ भाड़ को चीरते हुए सायरनों के शोर के साथ तमाम नीली और लाल बत्ती लगी गाड़ियां इधर से उधर दौड़ रही थी…

शहर के चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात थी… कुछ ही मिनटों में लखनऊ शहर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था… ये वो तस्वीरें थी जिन्हें लखनऊ में बैठे पत्रकारों की ना तों आंखे देख पाई और ना ही उनका कैमरा… ये तस्वीरें सिर्फ मेरी आंखों ने देखी थी… और आज 6 सितंबर 2012 को इन तस्वीरों को अपने कलम के ज़रिये तमाम उन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं जो अब तक हकीकत से अनभिज्ञ हैं… जिन्हें सिक्के का बस एक ही पहलू मालूम है जिनके मन में शायद दूसरे पहलू को जानने की कोई चाह तक नहीं है… आज 6 सितंबर 2012 को अभी कुछ पलों पहले ही मेरे मन में ख्याल आया कि मैं सिक्के के दूसरे पहलू को ज़ाहिर करूं…

अभी कुछ घंटे पहले ही मेरी पत्नी मेरे दुधमुंहे बच्चे को गोद में उठाये पागल सी परेशान सी चेहरे पर तमाम सवालों के भाव, भूखी प्यासी, तमाम तकलीफों को सहकर मुझसे मिलकर गई है… आधे घंटे वो मेरे सामने खड़ी थी और अपनी आंखों से मोती टपका रही थी… जितनी देर वो मेरे सामने रही, उतनी देर आंसू बहाती रही… लेकिन मुझे खुद को मजबूत रखना था… दिल पर हज़ारों पत्थर रखकर मैं उसे बस दिलासा दे रहा था… आंखों से बार बार आंसू आने की कोशिश करते… लेकिन मन में खुद को मजबूत बनाये रखने के भाव रुपी दरवाज़ें उन आंसूओं का रास्ता रोक देते… वो बस एक ही सवाल बार बार दोहरा रही थी तुम घर कब आओगे… और मैं बस यहीं दोहरा रहा था कि मैं बहुत जल्दी घर आऊंगा… हालांकि ये बात अलग है कि मुझे खुद भी नहीं मालूम था कि मैं घर कब जाऊंगा… लेकिन उसे ढांढस बंधाने के लिए बस यही कहना मेरी मजबूरी था… क्योंकि कभी कभी सच्चाई ना जानते हुए भी सच्चाई जानने का नाटक करना पड़ता है…

मेरी पत्नी की गोद में उसी की तरह लगातार आंखे लाल करके रो रहा मेरा बालक भी मेरी तरफ़ देखकर शायद यही सवाल मन में पूछ रहा होगा कि पापा तुम घर कब आओगे… मेरा बच्चा भूखा था… परेशान था… शायद रातभर सोया भी ना था… मेरी पत्नी परेशान थी… बदहवास थी… साथ में खड़े मेरे ससुर भी परेशान थे…. तमाम परेशानियों के भाव और थकान उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी… वो तमाम सवाल मुझसे पूछना चाहते थे… लेकिन जिस जगह मैं था उस जगह की नज़ाकत को समझते हुए बेचारे चुप थे और बस यही कर रहे थे कि जल्दी घर आ जाओ… अभी दोपहर के 2 बजे का वक्त है और मैं अपने बैरक Q-6 के बाहर अपने हालात पर दो घंटे लगातार आंसू बहाने के बाद एक आधा कागज़ और एक कलम लेकर बैठा हूं… अरे ये क्या !!!

मैं आपको ये तो बताना भूल ही गया कि मैं आखिर हूं कहां ? दरअसल मैं अपने घर से करीब 450 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ज़िला कारागार में बंद हूं और उसी ज़िला कारागार की बैरक संख्या Q-6 के बरामदे की सीढ़ीयों पर बैठा हूं… आंखों से लगातार आंसू बह जाने से आंखे लाल पड़ गईं है और दर्द के कारण बंद हो जाना चाहती है… लेकिन कलम है कि रुकने का नाम ही नहीं लेती… चिंता बस कागज़ की है जो यहां बड़ी मुश्किल से मिलते हैं… ये ज़िंदगी का वो कागज़ है जो कभी कोरा ना रहेगा…क्योंकि इस कागज़ का कोरापन अब सदा ना रहेगा… हां मैं कहां था … हां याद आया … मैं लखनऊ जेल में बंद हूं और अपने हालात पर आंसू बहा रहा था लेकिन मेरे हालातों का ज़िम्मेदार कौन है… क्या मैं खुद ?… क्या मेरे परिजन ? क्या मेरी मां ? क्या मेरी पत्नी ? क्या मेरा भाई ? क्या मेरे स्वर्गीय पिता ? क्या मेरा दूधमुहा बच्चा ?

दरअसल नहीं मेरे इन हालातों का ज़िम्मेदार है हमारा सिस्टम जो कुछ भी कर सकता है… जेल में आकर ही तो पता चला है कि ऊपर भगवान और नीचे सरकार अगर चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं… तो मेरे साथ नीचे सरकार ने वो कुछ किया है जिसने मुझे जेल पहुंचा दिया है… एयर कंडीशन दफ्तर…. एयर कंडीशन घर… एयर कंडीशन कार… यानी विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला मैं आज धूप में बैठा अपना शरीर जला रहा हूं… खारजों की भीड़ में (खारजा- जेल में बंद गरीब… बिना टिकट रेल यात्रा, स्मैकियों आदि को जेल की भाषा में खारजा कहा जाता है) दूर से ही अलग दिखने वाला मैं… वो कहते हैं ना- अंधों की भीड़ में कांड़ा राजा… कुछ इसी कहावत को सार्थक कर मैं आज तमाम स्मैकियों, चोरों, हत्यारों, डकैतों और बलात्कारियों के बीच बैठा अपने हालातों को कोस रहा हूं…

आज मुझे लखनऊ जेल में 9 दिन हो गये और इन 9 दिनों में मैने देखा कि बलात्कारी की ज़मानत हो जा रही है… एनडीपीएस में आये स्मैकिये की ज़मानत हो जा रही है… डकैती के मामले में आये डकैत की ज़मानत हो जा रही है, मस्ज़िद के भीतर जाकर कुरान फाड़कर संप्रदायिकता फैलाने वाले की ज़मानत हो जा रही है… लेकिन मैं ये भी नहीं जानता कि क्या मैं कभी बाहर की दुनिया देख भी पाऊंगा या नहीं…

अब आप सोचेंगे कि आखिर मेरा गुनाह क्या है जिसके चलते मुझे अपने भविष्य का ठिकाना सिर्फ जेल नज़र आता है… दरअसल मैं राजद्रोही और देशद्रोही हूं… क्योंकि मैने अपना फर्ज़, अपना कर्तव्य निभाया है, इसलिए मैं राजद्रोही हूं क्योंकि मुझे अपने बच्चे के दूध की चिंता है, इसलिए मैं राजद्रोही हूं… क्योंकि मै एक पत्रकार हूं इसलिए मैं राजद्रोही हूं… वो पत्रकार जो दाऊद अब्राहम की बेटी की शादी की तस्वीरें जनता तक पहुंचाता है तो उसकी तनख्वाह बढ़ा दी जाती है… वो पत्रकार जो चंदन तस्कर वीरप्पन का इंटरव्यूह अखबार में छापता है तो अखबार उसे पदोन्नति देता है और सरकार ईनाम के तौर पर धनराशी… वो पत्रकार जो 26/11 के मुंबई हमले के दौरान अपनी जान ज़ोखिम में डालकर उस हमले की तस्वीरें जनता तक पहुंचाता है तो समूचा भारत उसकी शान में कशीदे पढ़ता है लेकिन अब वो पत्रकार राजद्रोही है देशद्रोही है क्योकि इस बार ना दाऊद की बेटी की शादी हुई थी और ना ही मुबंई पर हमला… इस बार एक ज़िंदा देवी की मूर्ति टूटी थी और ये पत्रकार यानी मैं इस कार्य को अंजाम देने की चेतावनी देने वाले वाले शख्स की प्रेस वार्ता में मौजूद था और उसके साथ सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी दोस्ती रखता था… और ये कुसूर इस पत्रकार को राजद्रोही व देशद्रोही बना देता है…

असीम त्रिवेदी ने सत्यमेट जयते का भ्रष्टमेव जयते किया और उस पर देशद्रोह लगा तो समूचा देश, समूची मीडिया यहां तक की न्यायपालिका तक उसके साथ उठ खड़ी हुई… लेकिन एक अन्य पत्रकार पर राजद्रोह लगा तो किसी पत्रकार ने लिखना तो दूर, पूछना तक मुनासिब ना समझा… सच्चाई तो ये है कि मुझे लोगों को चीख चीखकर बताना पड़ता है कि मैं अपने ही देश का विद्रोही हूं, अपने ही राज्य का विद्रोही…मेरी बिरादरी के लोगों ने तो मेरे बारे में जानकारी जुटाने की भी ज़हमत ना उठाई… वो तो बस मेरे बारें में अफवाह झूठ मनघड़ंत कुछ भी छाप रहे थे… किसी अखबार के रिपोर्टर ने मुझे उत्तर प्रदेश नव निर्माण सेना का मुख्य सलाहाकार बताया तो किसी ने मुझे राजनीतिक महत्वाकांक्षी… किसी ने लिखा कि मूर्ति तोड़ने का कुचक्र मेरे दिल्ली स्थित आवास पर बैठकर रचा गया तो किसी ने कहा कि मैं संगठन का एक सक्रिय सदस्य हूं… किसी ने कहा कि मूर्ति तोड़े जाते वक्त मैने फोटो खीची तो किसी ने कहा कि मैने मूर्ति तोड़ते वक्त पर्चे हवा में फेंके….

मेरे जिले के एक अखबार ने तो यहां तक छापा कि मेरे पिता जीआरपी में हवलदार थे और उनकी मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर मेरी मां को उत्तर रेलवे के प्रधान कार्यालय में नौकरी मिली है… इस अखबार के अकलमंद रिपोर्टर से कोई पूछे कि जीआरपी के हवलदार की पत्नी को भला नार्दन रेलवे का प्रधान कार्यालय नौकरी पर क्यों रखेगा… दरअसल हमारी पत्रकार बिरादरी खुद अपनी बिरादरी की भी नहीं है और एक जिले पर अनपढ़ रिपोर्टर जो कल तक केबल के तार जोड़ता फिरता था, आज रिपोर्टर बनकर बैठ गया है, उससे उम्मीद भी क्या की जा सकती है….इसलिए मेरी सोच यहीं आकर मेरे विचारों से जुदा हो जाती है कि मेरा भविष्य क्या होगा…क्योंकि मेरे अपने लोग मेरे बारे में कुछ भी छापे जा रहे है तो ग़ैरों से क्या उम्मीद करूं….मैं अपने बच्चे को गोद में उठा पाऊंगा ?…. क्या मैं अपनी मां की गोद में सिर रखकर रो पाऊंगा ? क्या मैं फिर कभी अपनी पत्नी पर दिनभर का सारा गुस्सा निकाल पाऊंगा  ?… ये सवाल पिछले 9 दिनों से मेरे मन को कचोट रहे हैं और इन सवालों की कचोट आज और बढ़ गई है क्योंकि आज मेरी पत्नी मेरे बच्चे को साथ लेकर 450 किलोमीटर का लंबा सफर तय करके भूखी प्यासी बदहवास मुझसे मिलने आई थी…

मैंने इन 9 दिनों में आज पहली बार रोया ….  अब तक मैं खुद को संभाले हुआ था और आज खुद से वादा भी कर लिया है कि अब आंसू नहीं बहाऊंगा लेकिन मन को कचोटने वाले इन सवालों का मैं क्या करूं… सामने की बैरक में बंद दुसरे कैदियों को देखता हूं तो एक बार को वो तराना याद आता है कि दुनिया में कितना गम है मेरा गम कितना कम है लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया… दरअसल सामने की बैरक में छोटेलाल नाम का एक बंदी कैद है जिस वक्त मेरे से मिलने मेरी पत्नी आई उसी वक्त उसकी पत्नी भी नन्हे से बच्चे को लेकर उससे मिलने आई थी और जाते वक्त जाली खुलवाकर अपने पति को 500 रुपये… सौ सौ के 5 नोट दे रही थी और कह रही थी शादी की चांदी की अंगूठी बेच दिये थे उसी को बेचकर ये पैसे और जेल आने का टिकट जुटा पाये थे…  अब वकील से बात किये थे तो 1500 रुपये मांगे है कह रहे थे 10 दिन में छुट जायेगा तुम्हारा आदमी अब हमारे पास 1500 रुपये नहीं है वकील करने के लिए..

ये कहकर वो फूट फूट कर रोने लगी मैने देखा कि छोटेलाल भी उसके सामने आंसू बहा रहा था… मैने मामले को भांपते हुए छोटेलाल को समझाया और उससे कहा कि अपनी पत्नी को कल फिर यहां बुला लो और तुम्हारे वकील की फीस की व्यवस्था कर दी जाएगी… छोटेलाल मेरे पैरों में गिरने लगा मैने उसे उठाया और फिर मैं अपनी पत्नी को वहां से जाने के लिए कहकर वापस अपनी बैरक आने के लिए बढ़ने लगा … मेरी पत्नी मेरी आखिरी झलक तक मुझे देखती रही और आंसू बहाती रही… छोटेलाल भी मेरे साथ चल रहा था…खैर जब वो मुझे दिखनी बंद हो गई तो मैने अपना ध्यान बंटाने के लिए छोटे लाल से पूछा कि भाई किस मामले में अंदर आये हो तो छोटेलाल ने कहां कि बाबूजी बिना टिकट कानपुर से लखनऊ आ रहे थे और पकड़ लिये गये जीआरपी ने चोरी का मुक़दमा भी लगा दिया है…

मैने पूछा किस चीज़ की चोरी का उसने बताया एक सिपाही की टॉर्च ट्रेन में गुम हो गई थी उसी की चोरी का मामला लगा दिया है बाबूजी… मैने उससे पूछा कि सच बताओ तुमने चोरी की तो नहीं थी उसने कहा बाबूजी अपने बच्चे की कसम अगर चोरी ही करनी होती तो क्या मैं टॉर्च चुराता वो भी एक पुलिसवाले की… मै सोच में पड़ गया… फिर मैने उससे पूछा कि क्या सिर्फ टॉर्च चोरी और बिना टिकट का ही मामला लगाया है या कुछ और भी लगा दिया तो उसने कहा नहीं बाबूजी सिर्फ यहीं दो मामले है… मैने राहत की सांस लेते हुए उससे कहा कि चलो शुक्र है कम से कम जो भी मामले है वो गंभीर नहीं है क्योंकि दो दिन पहले प्रभू नाम का एक व्यक्ति आया है उस पर लखनऊ जीआरपी ने पिछले 4 महीनों में ट्रेन में हुई 7 वारदातें लगा दी है…

बात करते करते मैं अपनी बैरक तक पहुंच गया मैने थोड़ा पानी पिया और अपने फट्टे (बिस्तर- जेल में बिस्तर को फट्टा कहते हैं) पर लेट गया… लेकिन लेटकर मैने ज्यों ही पंखे को देखा तो मेरा ध्यान तुरंत आधा घंटा पहले फ्लैशबैक में पहुंच गया और मेरी आंखों में कैद अश्रु

शगुन त्यागी

शगुन त्यागी

प्रवाह को मैं रोके ना रोक सका…. और अब मैं अपने हालातों को इस पन्ने पर महीन महीन अक्षरों के ज़रिये बयां कर रहा हूं… खैर अब सूरज आसमान के आगोश में कहीं छिप गया है चांद बादलों से बाहर निकलने की जुगत में लगा है… अभी सात बजे हैं और मेरी बैरक संख्या Q-6 में बंद सभी लोगों ने हाथ मुंह धो लिये हैं… अब सांय कालीन पूजा का वक्त है… बाकी बातें कल करेंगे..

लेखक शगुन त्यागी ''नॉर्थ ईस्ट बिज़नेस रिपोर्टर'' मैग्ज़ीन के दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं. ये लेख उनकी आने वाली पुस्तक “राजद्रोह” का एक अंश है जिसका बाकी हिस्सा आने वाले दिनों में प्रकाशित किया जाएगा. शगुन से संपर्क उनके मोबाईल नंबर 07838246333 पर किया जा सकता है.

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