नईदुनिया को जागरण के हाथों बिके छह माह हो गए। पुराने संपादकों को इस दौरान विदा कर दिया गया और नए संपादकों के हाथों में नईदुनिया को जागरण के रंग में रंगने की जिम्मदारी सौंपी गई है। अब नए संपादक का चाबुक कैसा चल रहा है, यह जानने के लिए ग्वालियर एडीशन के उदाहरण जागरण प्रबंधन की आंखें खोलने के लिए काफी होंगे। यहां अनूप शाह ने कमान संभाली है। लेकिन वे स्टॉफ के लिए तानाशाह साबित हो रहे हैं।
उनकी नजरों में इस एडीशन में काम करने वाला हर कर्मचारी कामचोर है। खासतौर से रिपोर्टिंग टीम तो नकारा है। वे रिपोर्टरों की दिन भर की मेहनत को यह कहते हुए लाल रंग के पेन से रंग देते हैं कि यह भी कोई रिपोर्ट है। ऐसा एक दो रिपोर्टर ही नहीं हर रिपोर्टर के साथ हो रहा है। वे रात नौ बजे तक हर रिपोर्टर की रिपोर्ट को खारिज करते हैं और रात में खुद शाह के हाथ-पांव यह सोचकर फूल जाते हैं कि अब पेज कैसे भरेंगे। ऐसे में वे रद्द की गई रिपोर्ट को सही करार देते हैं और उसे ओके कर देते है।
शाह की इसी तानाशाही के चलते रिपोर्टर समीर गर्ग नौकरी छोड़ चुके हैं। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हरीश उपाध्याय ने नौकरी छोड़ऩे का नोटिस दे दिया है। बाकी लोग इस जुगाड़ में हैं कि कहीं मौका मिले तो वे भी खिसक लें। सिटी चीफ राजेंद्र तलेगांवकर की सबसे ज्यादा फजीहत है। शाह दैनिक भास्कर से तोड़कर हरिकृष्ण दुबौलिया को लाए पर वे भी संपादक की नजरों में खरे नहीं उतर पा रहे हैं और सोच रहे हैं कि भास्कर छोड़कर कहीं गलती तो नहीं कर दी। भास्कर में एक खबर में काम चल जाता था, भले ही वेतन कम हो पर यहां वेतन कुछ ज्यादा मिल रहा है पर रोज पिरना भी पड़ रहा है।





