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”डॉन, रंगदारी के हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में जमा करा दिया है… ”

बड़ा आसान होता है मीडिया प्रबंधन का चिंटू बनकर और उनसे पैसे लेकर मीडिया की पीआर वेबसाइट का संचालन करना. कुछ तो इस काम में इतने सिद्धहस्त हैं कि वे अंग्रेजी से लेकर हिंदी तक में मीडिया पीआर वेबसाइट चला रहे हैं और मीडिया मालिकों व उनके दलाल संपादकों के इंटरव्यू छाप छाप कर नंबर बढ़ाए जा रहे हैं. लेकिन भड़ास शुरू से आम मीडियाकर्मियों और आम जनता का पक्ष लेकर न सिर्फ चला बल्कि उनके प्रति प्रतिबद्ध भी रहा. ऐसा हम लोगों ने करके दिखाया भी है, एक नहीं कई बार. भड़ास पर भ्रष्ट मीडिया मालिकों, भ्रष्ट संपादकों और भ्रष्ट मीडिया प्रबंधन की पोल खोली गई, उनकी धज्जिया उड़ाई गई.

बड़ा आसान होता है मीडिया प्रबंधन का चिंटू बनकर और उनसे पैसे लेकर मीडिया की पीआर वेबसाइट का संचालन करना. कुछ तो इस काम में इतने सिद्धहस्त हैं कि वे अंग्रेजी से लेकर हिंदी तक में मीडिया पीआर वेबसाइट चला रहे हैं और मीडिया मालिकों व उनके दलाल संपादकों के इंटरव्यू छाप छाप कर नंबर बढ़ाए जा रहे हैं. लेकिन भड़ास शुरू से आम मीडियाकर्मियों और आम जनता का पक्ष लेकर न सिर्फ चला बल्कि उनके प्रति प्रतिबद्ध भी रहा. ऐसा हम लोगों ने करके दिखाया भी है, एक नहीं कई बार. भड़ास पर भ्रष्ट मीडिया मालिकों, भ्रष्ट संपादकों और भ्रष्ट मीडिया प्रबंधन की पोल खोली गई, उनकी धज्जिया उड़ाई गई.

और यह क्रम आज भी जारी है. नतीजा यह हुआ कि मीडिया के आफिसों में भड़ास देखने पर बैन लगा दिया गया लेकिन मालिक से लेकर मैनेजर तक सब चोरी छुपे भड़ास देखते रहे.  भड़ास के आने से मीडिया के रंगे सियारों का असली चेहरा सबने देखा. भड़ास के चलने से आफिसों में प्रबंधन और संपादकों की गुंडई कम हुई क्योंकि सबको डर लगने लगा कि भड़ास तक बात पहुंच गई तो क्या होगा… पत्रकारिता को मिशन और सरोकार मानने वाले लोगों में भड़ास के लिए दिल से सच्ची दुवा निकलती है. सैकड़ों मेल हैं जिनमें लोगों ने भड़ास के तेवर और इसकी सरोकारी पत्रकारिता की जिद को सराहा है.

कंटेंट इज किंग का नारा लगाने वाले मीडिया मालिक अपने आफिस में और अपने मीडिया माध्यम में कंटेंट को पैर की जूती से ज्यादा नहीं समझते. इसी कारण कंटेंट वाले दोयम हालात में रहते और मार्केटिंग वाले उनके सिर पर चढ़कर मूतते. कंटेंट वाला ईमानदार बंदा ईमानदारी से काम करके सामान्य जीवन जीने को तरस जाता लेकिन मार्केटिंग वाला कंपनी को पैसे दिलाकर देखते ही देखते खुद शहंशाह बन जाता. इस उलटबांसी को सीधा करने के वास्ते भड़ास ने वाकई कंटेंट इस किंग के नारे को साबित करते हुए मीडिया वालों की अंधेरगर्दी का खुलेआम खुलासा किया.

पेड न्यूज पर अभियान की शुरुआत, खबरों की शुरुआत भड़ास ने की और देखते ही देखते प्रभाष जोशी समेत ढेर सारे पत्रकारों ने इस पर अभियान चलाकर मीडिया वालों को मजबूर किया कि वे खबरों का सौदा न करें. कई निर्लज्ज अखबार मालिक और मैनेजर यह काम आज भी जारी रखे हुए हैं और उन्हें इसका कुपरिणाम जल्द देखने को मिलेगा लेकिन कई अखबारों ने पेड न्यूज से तौबा कर लिया है. हालांकि यह एक दिन की लड़ाई नहीं है क्योंकि जब देश की आर्थिक नीतियां ही बाजारवादी हैं तो मीडिया में बाजार घुसने से कैसे रोका जा सकता है और जब बाजार घुस गया तो वही विजेता होगा जिसके पास ज्याद नोट होगा, चाहे वो नोट खबरें बेचकर इकट्ठा किया गया हो या रंडियों की दलाली करके. सो, मीडिया में आखिरी सुधार तभी संभव है जब देश की नीतियां मानवीय मूल्यों और सरोकार को प्रोत्साहन देने वाली हों. और, इसके लिए राजनीतिक सिस्टम बदलना पड़ेगा. राजनीतिक सिस्टम बदलने की लड़ाई लड़ने के लिए अच्छे पत्रकारों को आगे आना पड़ेगा. अन्ना, केजरीवाल आदि ने एक उम्मीद तो पैदा की है लेकिन देखना है कि ये सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह जाते हैं या व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ते हैं.

बात भड़ास की हो रही थी. देश भर के आम मीडियाकर्मियों की लड़ाई लड़ने वाले और चहुंओर ख्यात-कुख्यात भड़ास की खुद की जिंदगी संघर्षों के साथ जुड़ी रही है. यह पोर्टल कई मुश्किलों से गुजरता हुआ यहां तक पहुंचा है. और दिन प्रतिदिन मुश्किल बड़ी होती जा रही है. भड़ास का सर्वर, आफिस और अन्य खर्चे को निकालने के लिए मैं निजी तौर पर कुछ नए मीडिया हाउसों से संपर्क साधता रहा. गैर-मीडिया कंपनियों से मदद मांगता रहा. अच्छे-बुरे लोगों तक पहुंचता रहा, रिक्वेस्ट करता रहा. कइयों ने मदद दी. कइयों ने नहीं दिए. कइयों ने सिर्फ भरोसा दिया. कइयों ने मदद देने की एवज में शर्तें रखी. कइयों ने मदद देने के बाद खिलाफ खबर छपने से मदद देना बंद कर दिया. मतलब ये कि भड़ास संचालन के लिए कोई ठोस माडल डेवलप नहीं हुआ. यहां वहां से मिल जाता और महीने दो चार महीने की गाड़ी चल जाती. अक्सर यह सोचना होता कि दो महीने तक के खर्चे तो आ गए, उसके बाद क्या होगा…..

निजी जिंदगी में आर्थिक दिक्कतों के चलते आपातकाल में कई पैसे वाले मित्रों, मित्र-शुभचिंतक संपादकों से मदद ली.  पर बात वही कि इस तरह कब तक चलेगा. और, क्या पता, ऐसे करने पर भड़ास की खबरों से खुन्नस खाए कौन फिर जाकर पुलिस में लिखा दे कि यशवंत ने रंगदारी मांगी. सो, इन उपर वालों को टाटा बाय बाय बोलकर अब उसी के पास चलना चाहिए जिसके प्रति प्रतिबद्धता की हम बातें करते हैं. सो, हमने भड़ास के आम पाठकों से हजार रुपये की रंगदारी मांग डाली. रंगदारी एक सिंबोलिक वर्ड है, जिसका मतलब डोनेशन या  सब्सक्रिप्शन या  मेंबरिशप… जो समझना चाहें, वो है, लेकिन यहां रंगदारी का इस्तेमाल इसलिए किया गया ताकि प्रबंधन में संदेश जाए कि उनके फर्जी एफआईआरों से इरादे कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत हुए हैं. इसी कारण तुमने जिस चीज को अपराध की तरह पेश किया, उसे हमने गले लगाकर अमर कर दिया…

और, इस रंगदारी मांगने का असर ये हुआ कि जिले जिले से फोन आने लगे, एसएमएस आने लगे, मेल आने लगे… एक स्थानीय संपादक लेवल के एक सज्जन ने एसएमएस किया- डान, रंगदारी की रकम भड़ास के खाते में जमा करा दिया… उनका यह डायलाग देखकर मैं मुस्कराया… भड़ास पढ़ने वाले ढेर सारे परिचित और कई अपरिचित साथियों ने भड़ास की आजीवन सदस्यता, कंटेंट सब्सक्रिप्शन और  भड़ास सपोर्ट कंपेन के तहत हजार रुपये देने की सहमति दी है और उनमें से कइयों ने तो जमा भी करा दिया है. अब भी लोगों के एसएमएस और मेल आना जारी है.

आज सुबह आंख खुली तो इंदौर के प्रकाश भाई का एसएमएस पड़ा मिला… '' रुपये 1111 आपके आईसीआईसीआई सेविंग एकाउंट में डिपोजिट करा दिया है. ट्रांजैक्शन नंबर 752082 है'' . मैने उन्हें जवाब भेजा- जय हो. कल एक फोन बिहार के औरंगाबाद से आया. धीरज नामक एक साथी बोल रहे थे. उन्होंने बताया कि वे और उनका पूरा परिवार भड़ास पढ़ता है. आपकी अपील पढ़कर हम लोग हजार रुपये देना चाहते हैं. मैंने उन्हें शुक्रिया कहा. नागपुर से कुमार नीलाभ का एसएमएस आया है- 100 rs yes.

दिल्ली के अभिषेक भाई ने फोन किया और बाद में एसएमएस करके बताया कि उन्होंने भड़ास लाइफ मेंबरशिप के तहत हजार रुपये मेरे आईसीआईसीआई एकाउंट में जमा करा दिए हैं. बरेली से आशीष ने एसएमएस कर मेरा एकाउंट नंबर मांगा है. ऐसे ढेरों साथी हैं जिन्होंने भड़ास को सपोर्ट देकर इस माध्यम को जिंदा रखने में अपना योगदान दिया है. हालांकि संख्या अभी पचास पार नहीं हुई है लेकिन मैं जानता हूं कि एक एक को पर्सनली एप्रोच करने पर ज्यादातर लोग भड़ास के लिए हजार रुपये देंगे.

और, यह संख्या हजार तक ले जानी है. यानि हजार रुपये हजार लोगों से लेना है.  इसलिए मेरा उन साथियों से अनुरोध है कि वे भी खुद के स्तर पर फैसला करके पहल करें जिन्होंने अभी तक अनुरोध पढ़ने के बाद भी कुछ तय नहीं किया है. नीचे मैं पटना के कल्याण कुमार का एक मेल प्रकाशित कर रहा हूं जो उन्होंने भड़ास को भेजा है, साथ है उनकी प्यारी सी एक तस्वीर…..

''Yashwantji, mujhe bhadas aur iske content behad achhe lagte hain. mai karib 2-3 saal se ise padh raha hun. aapki apeel par ichha to thi mujhe aur bhi jyada sahyog karne ki, kintu abhi filhaal mai us position me nahi hun. meri is chhoti si sahyog raashi ko sweekaar karenge.''

kalyan kumar

Patna, Bihar

small Businessman


अगर आप नए पाठक हैं या बहुत दिन बाद भड़ास पर आए हैं तो इन शीर्षकों पर क्लिक करके पूरे मामले को समझ सकते हैं…….

हर पाठक से यशवंत ने मांगी हजार रुपये की रंगदारी

रंगदारी देने के लिए सहमति देने वालों की पहली लिस्ट

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