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हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है…. आवाज जगजीत और गुलाम अली की (सुनें)

मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल देखते हुए ग़ालिब साहब के बारे में थोड़ा बहुत जानने और उनके रचे को सुनने का मौका मिला था. तब ग़ाजीपुर जिले में रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई कर रहा था. तब उर्दू जुबान की समझ नहीं थी, अब भी नहीं है, जितना जानने की कोशिश की, उतना खुद को उथला पाया. गंभीर शायरी के अर्थ को जानने-पहचानने का धैर्य न था. किशोर उम्र से जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बाद जब क्रांतिकारी सोहबत और रुमानी खयालात से दो-चार हुआ तो दिल की जुबां और देश-समाज के हाल को शब्दों में, ग़ज़लों में, नज्मों में, शायरी में तलाशने लगा. इसी दौरान कई लोगों से परिचय हुआ.

मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल देखते हुए ग़ालिब साहब के बारे में थोड़ा बहुत जानने और उनके रचे को सुनने का मौका मिला था. तब ग़ाजीपुर जिले में रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई कर रहा था. तब उर्दू जुबान की समझ नहीं थी, अब भी नहीं है, जितना जानने की कोशिश की, उतना खुद को उथला पाया. गंभीर शायरी के अर्थ को जानने-पहचानने का धैर्य न था. किशोर उम्र से जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बाद जब क्रांतिकारी सोहबत और रुमानी खयालात से दो-चार हुआ तो दिल की जुबां और देश-समाज के हाल को शब्दों में, ग़ज़लों में, नज्मों में, शायरी में तलाशने लगा. इसी दौरान कई लोगों से परिचय हुआ.

मिर्जा़ साहब उन्हीं में से एक हैं. अब भी नहीं कह सकता कि इन्हें अच्छे से पढ़ा-सुना हूं, लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि जिन कुछ लोगों को अच्छे से पढ़ने-बूझने का वादा खुद से किया हुआ है उसमें ये जनाब भी हैं. फिलहाल उनकी एक लोकप्रिय रचना को यहां दो महान गायकों की आवाज में सुनाने जा रहा हूं. हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है…  इसे गुलाम अली और जगजीत सिंह की आवाज में अलग-अलग सुनवा रहा हूं. साथ में गुलाम अली की एक अन्य ग़ज़ल भी पेश ए खिदमत है

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

[email protected]


हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है?
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है?

ना शोले में ये करिश्मा ना बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखः-ए-तुंद-ख़ू क्या है?

यह रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुमसे
वागरना ख़ौफ-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफू क्या है?

जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जूस्तजू क्या है ?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है?

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बादा-ए-गुल-फाम-ए-मुश्कबू क्या है?

पियूं शराब अगर ख़ूं भी देख लूं दो चार
यह शीशा-ओ-क़दा-ओ-कूज़ा-ओ-सूबू क्या है?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार, और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए के आरज़ू क्या है?

हुआ है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वागरना शहर में ग़ालिब' की आबरू क्या है?

(गुफ़्तार speech/discourse, मुसाहिब comrade/associate, गुफ्तगू conversation, बर्क़ lightening; तुंद sharp/angry, ख़ू behaviour, रश्क jealousy, हम-सुख़न to speak together/to agree, ख़ौफ fear; बद bad/wicked, आमोज़ी education/teaching; अदू enemy, पैराहन shirt/robe/cloth, हाजत need/necessity, रफू mendnig/darning, जूस्तजू desire, बहिश्त heaven, बादा wine, गुल-फाम delicate and fragrant like flowers; मुश्कबू like the smell of musk, खूं wine barrel, क़दा goblet, कूज़ा/सूबू wine pitcher)


 


और, ये है एक ग़ज़ल गुलाम अली की आवाज में…. महफिल में बार-बार किसी पर नज़र गई, हमने बचाई लाख मगर फिर उधर गई… यह लाइव शो की रिकार्डिंग है… इत्मीनान से सुन सकते हैं….


इसे भी सुन सकते हैं… हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना…


(सुनें)

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