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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साहित्यिक चेहरा…

Roshan Premyogi : २७ अक्टूबर को ताज होटल लखनऊ में श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ्को साहित्य सम्मान की पूर्व संध्या पर साहित्यकारों की पार्टी थी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समय से पहुँच गए. उन्होंने पहले मंच से भाषण दिया. फिर डिनर के दौरान एक एक टेबल पर जाकर साहित्यकारों से मुलाकात की. वह राजनीति से दूर यह बताना नहीं भूले कि मैं आम आदमी हूँ. 13 साल की सक्रिय पत्रकारिता और साहित्य लेखन में किसी मुख्यमंत्री को इस तरह लेखकों के बीच पहली बार देखा, जहाँ न राजनीति थी, न आपाधापी. प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव का उन्होंने हालचाल पूछा. मेरा बड़ा बेटा उनसे मिलना चाहता था.

Roshan Premyogi : २७ अक्टूबर को ताज होटल लखनऊ में श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ्को साहित्य सम्मान की पूर्व संध्या पर साहित्यकारों की पार्टी थी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समय से पहुँच गए. उन्होंने पहले मंच से भाषण दिया. फिर डिनर के दौरान एक एक टेबल पर जाकर साहित्यकारों से मुलाकात की. वह राजनीति से दूर यह बताना नहीं भूले कि मैं आम आदमी हूँ. 13 साल की सक्रिय पत्रकारिता और साहित्य लेखन में किसी मुख्यमंत्री को इस तरह लेखकों के बीच पहली बार देखा, जहाँ न राजनीति थी, न आपाधापी. प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव का उन्होंने हालचाल पूछा. मेरा बड़ा बेटा उनसे मिलना चाहता था.

मैं लेकर मुख्यमंत्री के पास गया. उन्होंने उससे क्लास और पढाई की बात की. पहली बार लगा अखिलेश पिता मुलायम जी की राह पर हैं. उनके अन्दर जज्बा है, लगन भी, मुलायम सिंह यादव साहित्यकारों, कलाकारों का न केवल सम्मान करते हैं बल्कि जब भी मुख्यमंत्री बने, भरसक मदद भी की. उनकी पिचली सरकार में मुझे उप्र हिंदी संस्थान से जब २०,००० का पुरस्कार मिला तो एक अधिकारी ने सरकारी आवास के लिए आवेदन माँगा. मैंने कहा, गारंटी ले सकते हैं कि यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो भी मेरा मकान रहेगा, वह पीछे हट गए. …हंस के संपादक राजेंद्र यादव कि ओर से समारोह में एक सवाल उठा कि साहित्यकार बिना नौकरी किये भी साहित्य लिख सके, इसके लिए सरकार को कुछ करना चाहिए. मेरा भी मानना है कि सरकार को कुछ करना चाहिए, लेकिन उससे पहले राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बनानी चाहिए.

    Sudhakar Adeeb … लेकिन उससे पहले साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बनाना चाहिए। बहुत सही कहा रोशन भाई । काश ! प्रबुद्धजन इस पर भी विचार करते।
 
    Sudhakar Adeeb इसे 1936 में घोषित किया था प्रातः स्मरणीय प्रेमचन्द जी ने । श्रीलाल शुक्ल जी जैसे विलक्षण व्यक्तित्वों ने 2011 तक इस मशाल को राजनीति से भरसक आगे रखा । आज 2012 में जो स्थितियाँ हैं वह आपसे छिपी नहीं हैं । … अधिक क्या कहें ?
 
    DrZakir Ali Rajnish जानकर अच्‍छा लगा। शुक्रिया रोशन भाई।
   
    Mahesh Chandra Deva bhai saheb abhi to ye shruwat hai .
    
    Krishna Kumar Yadav hamne bhi akhbaron men khabar padhi..sannata to tuta Roshan Premyogi ji.

रोशन प्रेमयोगी के फेसबुक वॉल से साभार.

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