पटना से प्रकाशित प्रमुख हिन्दी दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण के पाठकनामा कॉलम में बीते 29 अक्टूबर को छपा एक पत्र वर्तमान पत्रकारिता पर कई सवाल खड़ा कर गया। जिस तरह बिना संपादन के कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां छाप दी गईं वह पत्रकारिता के इतिहास को शर्मशार करने वाली तो है ही साथ ही साथ बेशर्म पत्रकारिता का चेहरा उजागर करने वाला भी। मेरा मानना है कि इसमें दोष संबंधित अखबार के संपादीय विभाग का नहीं वरन वैसे प्रबंधनों का है जिसने समाचार पत्रों का व्यवसायीकरण कर दिया।
अब जहां समाचार से ज्यादा विज्ञापनों को अहमियत दिया जाने लगा हो तो वहां ऐसी गलतियां होना लाजिमी ही है। आज सारे अखबार के दफ्तर सदन का दूसरा रुप बन गए हैं जहां राजनीति और आपसी खींचतान व एक दूसरे को नीचा दिखाने की कवायद आम है। दैनिक जागरण के पाठकनामा स्तंभ में छपा यह पत्र कहीं इसी राजनीति का हिस्सा तो नहीं। हालांकि अखबार ने बुधवार और गुरुवार को लगातार दो दिनों तक इस मामले में खेद प्रकट किया पर खेद प्रकट भर कर देने से इस तरह की गलतियों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।
पूरे मामले की जिम्मेवारी अपने उपर लेते हुए स्थानीय संपादक को अपने पद से इस्तिफा दे देना चाहिए था पर इसके बजाए गाज चार अन्य लोगों पर गिरी। सूत्रों के अनुसार इस अखबार में कार्यरत अमित आलोक, रविन्द्र पांडेय, फोरमैन शैलेन्द्र गुप्ता और कम्प्यूटर आपरेटर शैलेन्द्र पर प्रबंधन ने कार्रवाई की है। यह मामला अन्य वैसे अखबारों के लिए सीख भी है जो समाचार पत्रों के हो रहे व्यवसायीकरण के इस अंधी दौड़ में वैसे चेहरे की बहाली करते हैं जो पैरवीपुत्र होते हैं और जिन्हें पत्रकारिता का कोई ज्ञान नहीं होता।
उपरोक्त टिप्पणी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की है. इस प्रकरण से संबंधित अन्य खबरों के लिए यहां क्लिक करें- dj letter







