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अरविंद केजरीवाल, जिसने जेम्स बांड की तरह अकेले ही भ्रष्टाचार का अंडरवर्ल्ड तबाह कर दिया था!

: केजरीवाल या मीडिया का आभासी प्रतिपक्ष : सौ-डेढ़ सौ साल बाद कभी भारत के न्यूज चैनलों के आर्काइव में साल 2011 और 2012 के प्राइम टाइम डिबेट और खबरों से जुड़े फुटेज निकाले जायें और उनके आधार पर भारत का राजनीतिक इतिहास लिखा जाए तो 22वीं या 24वीं सदी के इतिहासकार को लिखना होगा कि 21वीं सदी के भारत में एक ऐसा शख्स भी पैदा हुआ जो गांधी से ज्यादा लोकप्रिय और आजादी के बाद का सबसे विराट व्यक्तित्व था। न्यूज चैनलों के आर्काइव के हवाले से इतिहास गवाही देगा कि उस शख्स का नाम अरविंद केजरीवाल था और जब वह था तब देश में भ्रष्टाचार और उसके अलावा कुछ भी नहीं था।

: केजरीवाल या मीडिया का आभासी प्रतिपक्ष : सौ-डेढ़ सौ साल बाद कभी भारत के न्यूज चैनलों के आर्काइव में साल 2011 और 2012 के प्राइम टाइम डिबेट और खबरों से जुड़े फुटेज निकाले जायें और उनके आधार पर भारत का राजनीतिक इतिहास लिखा जाए तो 22वीं या 24वीं सदी के इतिहासकार को लिखना होगा कि 21वीं सदी के भारत में एक ऐसा शख्स भी पैदा हुआ जो गांधी से ज्यादा लोकप्रिय और आजादी के बाद का सबसे विराट व्यक्तित्व था। न्यूज चैनलों के आर्काइव के हवाले से इतिहास गवाही देगा कि उस शख्स का नाम अरविंद केजरीवाल था और जब वह था तब देश में भ्रष्टाचार और उसके अलावा कुछ भी नहीं था।

न्यूज चैनलों के केजरीवाल फुटेज के ढेर पर मंत्रमुग्ध और चमत्कृत होकर बैठे भविष्य के उस इतिहासकार को बेहद मुश्किल से इस बात पर यकीन आएगा कि 21वीं सदी में भारत में हाड़-मांस का ऐसा फरिश्ता भी पैदा हुआ था जिसने जेम्स बांड की तरह अकेले ही भ्रष्टाचार का अंडरवर्ल्ड तबाह कर दिया था। न्यूज चैनलों के आर्काइवों में सुरक्षित प्राइम टाइम डिबेटों के फुटेज और एंकरों के लालटेनी वक्तव्य बतायेंगे कि 21 वीं सदी के उस स्वर्णिम दौर में सारे समाजसेवी,चिंतक और ईमानदार लोग केजरीवाल के साथ थे। उसके विरोध में बोलने वाले सारे लोग भ्रष्ट नेता, अफसर और बेईमान बुद्धिजीवी थे।

न्यूज चैनलों के न्यूज रुम्स और स्टूडियो में जो अरविंद केजरीवाल के रुप में जिस आभासी प्रतिपक्ष को प्रोड्यूस किया जा रहा है वह भारतीय मीडिया के अब तक के इतिहास का सबसे लंबा, महंगा और बड़ा समाचार धारावाहिक है। आखिर केजरीवाल का उदय क्या है? यह एक सुचिंतित और सुनियोजित मीडिया परिघटना है। यह ठीक वैसे ही है जैसे बिग बैंग को समझने के लिए एक महाप्रयोग पिछले साल किया गया था। अंतर इतना है कि भारतीय लोकतंत्र का यह महाप्रयोग न्यूज रुम्स और टीवी स्टूडियो में किया जा रहा है। अंतर यह भी है कि न्यूज चैनल ने केजरीवाल के रुप में अपना गाड पार्टिकल पहले ही खोज रखा है लेकिन उनकी कोशिश है कि उनके इस पार्टिकल को ही बाकी लोग गाड पार्टिकल मान लें।

इसके लिए हर रोज समाचार कथायें तैयार होती हैं। इन समाचार कथाओं के लिए तथ्य जुटाए जाते हैं। यदि तथ्य न मिलें तो प्राइम टाइम में अति वाचाल कथ्य से काम चलाया जाता है। पिछले साल से चल रहा यह धारावाहिक हिंदुस्तान का सबसे लंबा न्यूज धारावाहिक है। इसे चाहें तो न्यूज डाॅक्यूमेंटरी भी कह सकते हैं।इसे मनोरंजक बनाए रखने के लिए हिंदी फिल्मों के लटके-झटकों का भी प्रयोग भी किया जाता रहा है। केजरीवाल डाॅक्यूमेंटरी के चतुर पटकथा लेखक जानते हैं कि उनके दर्शक वर्ग को क्या चाहिए। रहस्य,रोमांच के साथ छुटपुट हिंसा का भी इसमें इस्तेमाल किया गया है। इसमें देशभक्ति का छौंक भी लगाया गया है। इसके स्थायी खलनायक मनमोहन सिंह हैं पर सह खलनायक बदलते रहते है। कभी सलमान खुर्शीद कभी नितिन गडकरी तो कभी शीला दीक्षित। इस धारावाहिक वृत्तचित्र के संवाद लेखक सलीम जावेद से भी बेहतर हैं।

इस मायने में इसे दीवार से ज्यादा बेहतर बुनी हुई समाचार कथा माना जाना चाहिए। ठीक उसी तरह जिस तरह से सीएनएन ने इराक पर हमले के लिए जनमत तैयार करने के लिए सद्दाम हुसैन और इराकी परमाणु बम को लेकर धारावाहिक समाचार कथायें बुनी थीं। जरा फर्रुखाबाद को याद करें। सह खलनायक नायक को चुनौती देता है,‘‘फर्रुखाबाद आ तो जाओगे लेकिन साबूत वापस नहीं जाओगे।’’ फिल्म में रोमांच पैदा हो जाता है। माहौल बनाया जाता है कि अब फर्रुखाबाद में होगी हीरो और सह खलनायक की टक्कर। रुटीन जिंदगी से उबे न्यूज चैनलों के दर्शकों को लगता है कि उन्हे मारपीट के रोमांचित करने वाले दृश्यों का लाइव प्रसारण देखने को मिलेगा। हीरो फर्रुखाबाद में जाता है। न्यूज चैनलों के कैमरे मंच की ओर रहते हैं। भीड़ की ओर एक भी कैमरा नहीं घूमता इसलिए पता नहीं चलता कि भीड़ कितनी आई। उधार की भीड़ के बूते हीरो हवा में सह खलनायक को चुनौती फेंकता है,‘‘तीन घंटे बचे हैं जो करना है कर लो! हम तो जान हथेली पर रखकर आए हैं।’’

गोया हीरो फर्रुखाबाद में न होकर टाइगर हिल पर हो और सलमान खुर्शीद के बजाय सामने जनरल मुशर्रफ हों। उधार की भीड़ बैकग्राउंड में ताली बजाती है लेकिन कैमरा हीरो से टस से मस नहीं होता। मारपीट का रोमांच देखने को टीवी पर बैठे दर्शक निराश तो होते हैं पर हीरो का डायलाग दीवार फिल्म के डायलागों की तरह उनके जहन में गूंजता रहेगा,‘‘ हम तो जान हथेली पर रखकर आए हैं।’’ कमाल के संवाद लेखक हैं। चारों ओर सुरक्षा के लिए हजारों की तादाद में सशस्त्र पुलिस तैनात है और हीरो फिर भी जान हथेली पर रखकर आया है। यह खबर है या फेंटेसी! परिकथाओं को समाचार कथाओं में बदलने का यह कौशल बताता है कि केजरीवाल की ब्राडिंग में लगे दिमाग साधारण नहीं हैं। वे असाधारण सीमा तक कल्पनाशील और क्रिएटिव हैं।

अब जब सन् 2014 के लोकसभा की आहटें पास आ रही हैं तो मीडिया के लिए यह अब तक का सबसे बेहतरीन कारोबारी परिदृश्य है जब सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही मीडिया के दबाव में हैं। अरविंद केजरीवाल के नाम से मीडिया ने राजनीति के बाजार में अपना सबसे कामयाब उत्पाद उतारे जाने से ही यह अद्भुत स्थिति बनी है। क्योंकि केजरीवाल के जरिये मीडिया सरकार और विपक्ष के खिलाफ उन आरोपों का भी इस्तेमाल करने की स्थिति में आ गया है जो मानहानि समेत दूसरे कानूनों की जद में होने के कारण मीडिया खुद नहीं लगा सकता। यानी केजरीवाल की आड़ में मीडिया किसी भी नेता का शिकार कर सकता है। यह बिल्कुल वैसी ही रणनीति है जिसे द्वापर में श्रीकृष्ण भीष्म पितामह को मारने के लिए प्रयोग कर चुके थे। केजरीवाल धारावाहिक बता रहा है कि मीडिया अब विपक्षी दल के लाभ का औजार बनने को तैयार नहीं है बल्कि वह कांग्रेस का विपक्ष भी खुद ही तैयार करने में जुट गया है। इसके लिए उसने अपने न्यूज रुम्स और स्टूडियोज को वार रुम में बदल दिया है।

लाख टके का सवाल यह है कि क्या प्रतिपक्ष का निर्माण न्यूज चैनलों के स्टूडियोज में किया जा सकता है? केजरीवाल के मीडिया महाप्रयोग को देखें तो कुछ बात समझ में आती हैं। जितनी कवरेज,एक तरफा प्रचार और सकारात्मक खबरें इस अकेले व्यक्ति पर की गई उसके बूते कोई भी साधारण नेता बहुत बड़ी ताकत बन सकता था फिर केजरीवाल क्यों नहीं? केजरीवाल के धरनों और प्रदर्शनों में भाग लेने वालों की तादाद क्यों नही बढ़ रही है?केजरीवाल की लोकप्रियता में गिरावट क्यों आ रही है? मध्यवर्ग में उसका आधार लगातार क्यों छीज रहा है? इसका एक सीधा सा जवाब यह हो सकता है कि जनता के नेता टीवी स्टूडियोज में नहीं गढ़े जा सकते।
दरअसल एक व्यक्ति का नेता के रुप में लोगों की मान्यता हासिल करना एक लंबी राजनीतिक प्रक्रिया है। इसे टीवी न्यूजों,प्राइम टाइम डिबेटों, इंटरनेट तकनीकों के जरिये स्थापित नहीं किया जा सकता। राजनीतिक संवाद कायम करना और उसके जरिये किसी व्यक्ति या समाज में नेता की मान्यता हासिल करना एक बेहद जटिल मानवीय मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिस मध्यवर्ग को न्यूज चैनल केजरीवाल के आधार के तौर पर विकसित करना चाहते हैं वह राजनीतिक आधार के नजरिये से सबसे अस्थिर वर्ग है। इसीलिए राजनीति में आने के केजरीवाल के निर्णय से इस वर्ग का एक अराजनीतिक हिस्सा केजरीवाल से अलग हो गया। हालांकि अभी भी केजरीवाल की लोकप्रियता मध्यवर्ग के जिस हिस्से में है वह भी कमोवेश अराजनीतिक ही है। यह वह वर्ग है जो सारे नेताओं और राजनीति को गंदा मानता है और उससे नफरत करता है। मीडिया और केजरीवाल भी नेताओं के प्रति इसी नफरत की सवार होकर राजनीति करना चाहते है। यह खतरनाक खेल है। क्योंकि अराजनीतिक वर्ग को आधार बनाकर गंभीर राजनीतिक कर्म नहीं किया जा सकता। मीडिया की लाख कोशिशों के बावजूद इसीलिए केजरीवाल प्रतिपक्ष नहीं बन पा रहे हैं। वह आभासी प्रतिपक्ष हैं जिनका मैग्नीफाइड प्रतिबिंब सिर्फ मीडिया रचित समाचार कथाओं में नजर आ रहा है।

सवाल यह भी है कि क्या मीडिया प्रतिपक्ष का निर्माण कर सकता है? यदि हम 1988-89 के वीपी सिंह प्रयोग को देखें तो कह सकते हैं कि यह सफल प्रयोग था। मीडिया की खबरों और बोफोर्स पर सवार होकर वीपी सिंह प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन वह वहां टिक नहीं पाए। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान विफल हो गया लेकिन मीडिया ने कभी उस अधकचरे परिवर्तन की जिम्मेदारी नहीं ली। इसके बावजूद वीपी सिंह और केजरीवाल में बहुत फर्क है। वीपी सिंह मीडिया की कृति नहीं थे और न देवीलाल,एनटी रामाराव समेत तबके सारे विपक्षी नेता मीडिया कृति थे। इन सबका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व था और इन सबके नेतृत्व को जनता के अलग-अलग हिस्सों की मान्यता हासिल थी। ये सब आभासी प्रतिपक्ष नहीं थे बल्कि वास्त्विक प्रतिपक्ष थे। वीपी सिंह प्रयोग की कामयाबी में इन सबका एक मंच पर आना ही सबसे बड़ा कारण था।

अखबारों ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इन सबको एक मंच पर लाने का ऐसा दबाव बनाया कि चंद्रशेखर जैसे वीपी सिंह विरोधी नेता को मजबूरी में इसी पांत में खड़ा होना पड़ा। लेकिन केजरीवाल वीपी सिंह नहीं है। वह विशुद्ध रुप से मीडिया की कृति हैं। उनका पावर हाउस न्यूज चैनलों के स्टूडियो में है। वह अपनी ताकत वहीं से पाते हैं। उनके साथ वीपी सिंह की तरह देवीलाल,एनटीरामाराव जैसे प्रतिपक्ष के स्थापित नाम नहीं हैं। न्यूज चैनलों की सीमा यह है कि वे देश में वास्तविक प्रतिपक्ष का निर्माण नहीं कर सकते। वे अपनी खबरों,बहसों और लाइव प्रसारणों के जरिये एक आभासी प्रतिपक्ष का ही निर्माण कर सकते हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो इस देश के लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा से जुड़ा हुआ है वह यह है कि क्या मीडिया को देश के लिए सरकार और प्रतिपक्ष तय करना चाहिए? इस बारे में प्रख्यात पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की उस उक्ति को याद किया जाना चाहिए जो उन्होंने 1991-1993 के बीच कभी कही थी। एसपी सिंह से पूछा गया था कि पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए? उनका जवाब था कि पत्रकार को सरकार नहीं बनानी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार बनाना, उसे चलाना और प्रतिपक्ष तैयार करना मीडिया का काम नहीं है। यह जनता का काम है। नेता बनाना और उन्हे कूड़ेदान में डालना उसका काम है। नेता बनने के लिए उससे जनता में वैधता हासिल करनी होगी।

सन् 1915 में अधनंगे होकर भारत यात्रा कर गांधी ने बताया कि नेता बनने के लिए लोगों की मान्यता पाना कितना मुश्किल काम है। यह वैधता टीवी न्यूज चैनलों की गल्प कथाओं से हासिल नहीं की जा सकती। मीडिया अपने आप में एक आर्थिक स्वार्थ समूह है। यह कारपारेट स्वार्थों का एक संगठित गुट है जो दरअसल खबरों का कारोबार कर रहा है। खबरें उसके कारोबार का हिस्सा हैं। कोई भी कारोबारी या कारपोरेट स्वार्थ समूह यदि देश के राजनीतिक निर्णय करने की स्थिति में आ जाएगा तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा। क्योंकि जनमत को मोड़कर देश में कभी भी ऐसी कमजोर सरकार या व्यक्ति सत्तारुढ़ हो सकता है जो कारपोरेट मीडिया की कठपुतली हो।

न्यूज चैनलों के न्यूज रुम्स और स्टूडियो में जिस प्रतिपक्ष और सरकारों का प्रोडक्शन होगा उसकी जवाबदेही किसके प्रति होगी? जाहिर है कि वह अपने स्वामियों यानी मीडिया मुगलों के प्रति जवाबदेह होगा। उसकी नीतियां भी यही कारपोरेट मीडिया तय करेंगे। लोकतंत्र आखिरकार अमेरिका की तरह कारपोरेट लोकतंत्र में बदल जाएगा। एक खतरा और भी है। अरविंद केजरीवाल के नाम से मीडिया ने जिस आभासी प्रतिपक्ष का निर्माण किया है वह भ्रष्टाचार,अकुशल शासन के खिलाफ जनता के गुस्से या असंतोष को गंभीर राजनीतिक आंदोलन में बदलने के बजाय उसे रोजाना की खबरिया सनसनी में बदल रहा है। यह अराजनीतिक ही नहीं है बल्कि अराजकता की ओर ले जाने वाली राजनीति है। लोकतंत्र के लिए इस तरह का अराजकतावाद भी खतरा है क्योंकि वह परिवर्तन करने के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था की चिकौटी काटकर प्रचार पाने तक ही सीमित है।

लेखक एस. राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक रहे हैं और आजकल ‘‘जनपक्ष टुडे’’ के मुख्य संपादक है.

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