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2जी घोटाले के मुख्य जांच अधिकारी आईपीएस पलसानिया की मौत का राज क्या है?

2जी घोटाले के मुख्य जांच अधिकारी सुरेश पलसानिया का आज दिल्ली के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में अकस्मात निधन हो गया। 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी पलसानिया को सीबीआई के ही नहीं बल्कि देश भर के बेहतरीन अधिकारियों में शामिल किया जाता था। सुप्रीम कोर्ट के निरीक्षण में चल रही 2जी घोटाले की जांच में उनकी ईमानदारी और तेज़-तर्रार जज्बे ने प्रो. स्वामी को 2जी लाइसेंस रद्द करवाने में काफी मदद दी थी। इन्हीं सब के बीच उनकी अपने सीनियर अफसरों के साथ मन-मुटाव की ख़बरें भी आई।

2जी घोटाले के मुख्य जांच अधिकारी सुरेश पलसानिया का आज दिल्ली के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में अकस्मात निधन हो गया। 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी पलसानिया को सीबीआई के ही नहीं बल्कि देश भर के बेहतरीन अधिकारियों में शामिल किया जाता था। सुप्रीम कोर्ट के निरीक्षण में चल रही 2जी घोटाले की जांच में उनकी ईमानदारी और तेज़-तर्रार जज्बे ने प्रो. स्वामी को 2जी लाइसेंस रद्द करवाने में काफी मदद दी थी। इन्हीं सब के बीच उनकी अपने सीनियर अफसरों के साथ मन-मुटाव की ख़बरें भी आई।

प्रश्न ये भी है कि श्री पलसानिया एक स्वस्थ व्यक्तित्व के मालिक थे, 16 वर्षों की सर्विस में किसी गंभीर बीमारी के शिकार रहें हों, ऐसा कभी लगा नहीं। बेहद चुस्त और दुरुस्त। फिर 2 जी घोटाले की जांच संभालने के बाद उन्हें अचानक ऐसी कौन सी बीमारी आन पड़ी की बीमारी का पता चलने के दो माह के भीतर ही निधन हो गया! अस्पताल बीमारी की पूरी रिपोर्ट भी सार्वजनिक करने में आनाकानी कर रहा है। दूसरी बात कि जब देश के इतने संवेदनशील घोटाले से जुड़े मुख्य जांच अधिकारी को किसी ऐसी प्राणघातक बीमारी के होने का पता चला तो उन्हें सारी चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए थी।

बड़े सरकारी अस्पताल में समुचित इलाज़ करवाते हुए उनके स्वास्थ्य-विवरण को पूरी पारदर्शिता के साथ घर-वालों को विश्वास में लेते हुए राष्ट्र के सम्मुख रखना चाहिए था ना कि एक बेनामी से निजी अस्पताल में अकेले मौत से जूझने-लड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए। अचानक क्या हुआ, पता नहीं। अभी हाल तक तो वो अपने पूरे जोश, जज्बे और कर्तव्य-निष्ठा के साथ जांच के ही सिलसिले में फिर से मलेशिया जाने के लिए अपने बड़े अधिकारियों से लड़ रहे थे। और जाने में कामयाब भी रहे। हालांकि इसी कारण उनकी अपने वरिष्ठों के साथ मतभेद बहुत गहरे भी हो चले थे। उनकी मौत मुझे स्वाभाविक नहीं लगती, आपको लगती है? बहरहाल ईश्वर उनकी आत्मा को अभी शांति न दे, बल्कि उसे इतना सशक्त और मुखर करें कि वो व्यापक भारतीय जन-मानस को झकझोर और बुराइयों को सिहरा सके।

लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09304401744 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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