: यूपी में इलेक्शन से पहले लांच होने वाले चैनल की कहानी, उसके ब्यूरो चीफ कुमार सौवीर की जुबानी : चाहे वह अफीम के स्वर्ग यानी बाराबंकी का टेरा-टिकरा गांव का आपराधिक माहौल रहा हो, या अयोध्या विवाद के दौरान कारसेवकों के खून से सना फैजाबाद में तब छावनी बन चुका अवध क्षेत्र रहा हो। जून की दोपहरिया में गर्म रेत के थप्पड़ मारते राजस्थान में खबरें खोदने का काम रहा हो, या चित्रकूट में घनश्याम केवट नाम के इकलौते डकैत से निपटने के लिए मौजूद हजारों पुलिसवालों की ताबड़तोड़ गोलियों के बीच दो दिन की लगातार रिपोर्टिंग रही हो। बदमिजाज नेताओं-अफसरों से निपटना रहा हो, या किसी की भी प्रेस कांफ्रेंस में सवालों के गोले दाग कर उन्हें सच बोलने पर मजबूर करना।
ऐसे सैकड़ों मौके मेरे जीवन में आये हैं, और हर बार मैंने काम को ही पहले दर्जे पर रखा। खबर की खबर मिलते ही निकल पड़ा। खबरों की दुनिया मेरे लिए किसी युद्ध के मैदान की ही तरह रही, जहां मुझे हर हाल में घुसना ही है। कहने की जरूरत नहीं कि अपने इसी जज्बे के चलते मैंने ऐसे हर मौके पर खुद पर गर्व करने लायक जीत हासिल की है। एक आराधना और तपस्या की तरह जिया है मैंने पत्रकारिता का अपना जीवन।
लेकिन अब अचानक एक नया मोड़ दिख रहा है मेरे जीवन में। कहने की जरूरत नहीं कि यह मोड़ बेहद घिनौना है। मुझसे उम्मीद की जा रही है कि मैं अब खबरों पर अपना तेवर कायम रखने और उसे ज्यादा धारदार बनाये रखने के बजाय सीधे पेड-न्यूज पर काम शुरू कर दूं। खबरों से वास्ता जूतों तले रौंद डालूं और खुद को समिधा की तरह होम कर दूं पेड-न्यूज की नयी पत्रकारीय भोजन-जीवन-शैली पर। हवि बन जाऊं उस घटिया शाखा के लिए जिसे पत्रकारिता के अलावा भी समाज का हर क्षेत्र नफरत की नजर से देखता हो। क्योंकि इसी शैली के चलते ही पत्रकारिता पर बदनुमा कलंक लगता रहा है।
ऐसा हर्गिज नहीं है कि पत्रकारिता में हम विज्ञापन को हेय नजरिये से ही देखते हैं। विज्ञापन और व्यवसाय हमारे पत्रकारीय जीवन का उतना ही बड़ा अंग है जितना संपादकीय। हां, दायित्व बंटे हैं। मकसद है कि न कोई खबरों पर धौंस जमाये और न ही कोई विज्ञापन पर। एक-दूसरे से उतनी ही दूरी बनी रहे जितनी रेल की पटरियों के बीच होती है जो एकसाथ ही मंजिल तक पहुंचाती हैं। अगर दोनों एक हो गयीं तो फिर रेल चल ही नहीं सकती।
मैं ऐसा नहीं कहता कि मैंने विज्ञापन को अछूत समझ रखा है। कई बार खुद मुझे विज्ञापन के लिए सरकारी अफसरों से बात करनी पड़ी जब देखा कि हमारे संस्थान के साथ पक्षपात और अन्याय हो रहा है और हमारे सेल्स के लोग उससे निपट पाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे जिस भी मामले पर हमारे विज्ञापन के साथियों ने मुझे सूचित किया, मैंने तत्काल उस पर हस्तक्षेप भी किया। ताजा मामला तो महुआ और महुआ न्यूज का ही रहा। शुरुआत में हर संस्थान की तरह इस ग्रुप को भी बेहद हेय नजरिये से देखा जा रहा था।
लोगों के आक्षेप और चुटीले कमेंट्स भी होते थे। मसलन, महुआ तो देसी ठर्रा होता है, महुआ और शाम को अधपौवा, वगैरह-वगैरह। जाहिर है कि कई अफसरों का रवैया उपेक्षात्मक था। मैंने कई बार हस्तक्षेप किया और महुआ व महुआ न्यूज के साथ होने वाले पक्षपात को खत्म कराया। इसके पहले भी मैं साप्ताहिक सहारा, सांध्य समाचार सेवा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और हिन्दुस्तान जैसे बड़े प्रतिष्ठानों में दशकों तक रहा, लेकिन मुझसे ऐसे छिटपुट सहयोगों के अलावा सेल्सवालों की ओर से कोई अपेक्षा कभी भी नहीं की गयी।
हाल ही, मुझे महुआ समूह को अचानक ही किन्हीं कारणों से छोड़ना पड़ा। करीब दो मास पूर्व एस-टीवी चैनल की ओर से मेरे पास ऑफर आया। दिल्ली जाकर बात की। वहां के प्रबंधन से शुरुआती बात करके लगा कि वे उत्तर प्रदेश में एक गंभीर न्यूज चैनल लाना चाहते हैं। नाम रखा है यूपीन्यूज। यह नाम आकर्षक लगा। मैंने काम करने पर सहमति दे दी। उसी बातचीत के दौरान तय हुआ कि इस नये यूपीन्यूज चैनल के प्रोमो के लिए प्रदेश के उन सभी क्षेत्रों की शूटिंग की जाए जिनका ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व हो। इसकी जिम्मेदारी मुझे दी गयी।
हालांकि तब तक कैमरा नहीं दिया गया था, लेकिन कहा गया कि यह काम मैं स्वयं अपनी निगरानी में कोई कैमरा और कैमरामैन किराये पर लेकर करवा लूं। कैमरे के किराये और कैमरामैन के पारिश्रमिक का भुगतान प्रबंधन ने करने का वायदा किया। तय हुआ कि इसके लिए मैं खुद ही कैमरा और कुशल कैमरामैन का चयन व उस पर आने वाले खर्च का फैसला कर लूं। मैं उत्साहित था। कैमरामैन को साथ लेकर पूरा प्रदेश छान मारा।
एक महीना से ज्यादा वक्त गुजर गया, मगर न तो वेतन आया और न ही अब तक हुए खर्च का भुगतान। मैंने दिल्ली मुख्यालय से सम्पर्क किया। वहां से जवाब मिला कि चूंकि नयी टीम के साथ यह चैनल शुरू हो रहा है, इसलिए यह दिक्कतें आ रही हैं। आश्वासन मिला कि जल्दी ही सब सिस्टम से हो जाएगा। मुझसे धीरज रखने की अपील की गयी। मैं अपने दायित्व पर जुटा रहा। हां, कुछ दिन बीतने के बाद दिल्ली से एक कैमरा मेरे पास भिजवा दिया गया। मेरा काम यथावत चल रहा था।
अचानक एक दिन पता चला कि कोई विवेक अवस्थी इस चैनल की जिम्मेदारी सम्भालने आ गये हैं। मैं विवेक अवस्थी से परिचित नहीं। कभी मिला भी नहीं था। लेकिन एक दिन मुख्यालय से आये एक फोन से मैं स्तब्ध रह गया। फोन पर कहा गया कि आप इस चैनल के लिए यूपी में नेताओं से बात कर लें। जो भी फण्ड करने को तैयार हो, उसी की खबरें अब चलायी जाएंगी, और आपको हर हाल में यह काम करना है और इस तरह यूपीन्यूज के प्रति अपनी निष्ठा दिखानी ही होगी।
मैं हतप्रभ। नये सम्पादक विवेक अवस्थी से बात करने के लिए मुख्यालय फोन मिलाया तो पता चला कि वे आपसे खुद ही बात कर लेंगे। इसके बाद तो मैं जब भी फोन करता, यही जवाब मिलता। एक दिन किन्हीं सज्जन ने खुद को विवेक अवस्थी बताते हुए मुझे फोन किया और कहा कि आप ब्यूरो चीफ तो तब रहेंगे जब चैनल ऑन-एयर होगा और उसे ऑन-एयर करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। उसके लिए आप नेताओं को पटाइये, भारी-भरकम फण्ड जुटाइये। इसके पहले कि मैं कुछ कहता, फोन काट दिया गया।
मैंने मुख्यालय फोन किया और फोन उठाने वाले को पूरी बात बताते हुए साफ कह दिया कि यह काम मैं नहीं कर सकता। इस पर किन्हीं नेहा और पूजा का फोन कई बार आया और मुझसे कहा गया कि मैं संस्थान का कैमरा वापस कर अपना फुल ऐंड फाइनल पेमेंट ले लीजिए।
साथियों। तो यह है पत्रकारिता का नवजात पेड-न्यूज बच्चा।
कहने की जरूरत नहीं कि यह नवजात बच्चा चैनल यूपी में होने वाले विधानसभा चुनावों में पत्रकारिता की एक नई इबारत लिखने जा रहा है। इसने अपने इस तथाकथित न्यूज चैनल पर केवल उन्हीं नेताओं और पार्टियों की खबरें दिखाने के लिए कमर कस रखी है, जो उसे फण्ड करेंगे। पूरी दबंगई के साथ दूसरे नेताओं और पार्टियों को यह चैनल घास तक नहीं डालेगा। चेहरा दिखाना हो तो पैसा खर्च करो, वरना—-। भाड़ में गयी जनप्रतिबद्धता और ठेंगे पर पत्रकारीय दायित्व। पूरी नंगई के साथ होगा यह सब। भारत का चुनाव आयोग जो उखाड़ पाये, उखाड़ ले।
खैर, अब एक बात और। न तो मुझे अब तक वेतन मिला है और न ही फोन, इंटरनेट, मोडम, कैमरा, कैमरामैन, डीबी, टैक्सी वगैरह का भुगतान मिला है।
ऐसी करतूत को मैं पत्रकारिता मानता ही नहीं हूं, सो, उनके साथ रह नहीं सकता। नई नौकरी मिलने तक आखिर मैं करूं भी तो क्या करूं। क्या कैमरा वापस कर दूं या जब तक वहां से मेरा वेतन, तीन मास का नोटिस-पे, अब तक हुए खर्च का भुगतान नहीं हो जाता, दिल्ली न जाऊं। वे लोग खुद लखनऊ आकर मेरा पूरा बकाया अदा करें और कैमरा ले जाएं। क्योंकि यह भी तो हो सकता है कि वे कैमरा लेकर मुझे खाली हाथ ही लौटा दें।
मेरी इस आशंका के वाजिब कारण भी हैं। मुझे आज ही पता चला है कि यूपी-न्यूज के नाम से सन 2007 में भी एसटीवी की ओर से एक चैनल चलाया गया था। लेकिन किसी भी संवाददाता को उसका धेले भर का भी भुगतान नहीं किया गया। कई संवादाताओं का तो डेढ़ लाख तक बकाया बताया जा रहा है।
फिलहाल, नयी नौकरी मिलने तक तो मैं उन संवादाताओं को खोजने में जुटूंगा जिनका पैसा यूपीन्यूज या एसटीवी में बकाया है। अगर उनका बकाया है, तो वह उन्हें मिलना ही चाहिए।
है कि नहीं ?
कुमार सौवीर
लखनऊ
फोन:- 09415302520





