अरविंद केजरीवाल का सबसे बड़ा योगदान क्या है? इसके आगे वे रहें या फ्लाप हो जायें, यह अलग प्रसंग है. यह कयास है. भारतीय राजनीति में जो सवाल उठ नहीं रहे थे, उन सवालों को उन्होंने, उनकी टीम ने सामने ला दिया. रोज नये-नये मामलों का खुलासा. पुरानी चीजों को छोड़ दें, तो रॉबर्ट वाड्रा प्रकरण, नितिन गडकरी के काम, सलमान खुर्शीद की संस्था के कामकाज और देश की सरकार- व्यवस्था चलाने में मुकेश अंबानी की भूमिका से जुड़े सवाल. इस देश की संसद और राजनीति में ये सवाल पहले क्यों नहीं उठे? 2जी स्पेक्ट्रम प्रकरण का मामला वर्षों से लोगों को पता था, पर जब सुप्रीम कोर्ट और कैग ने इस मामले को सख्ती से उठाया, तब ये मामला राष्ट्रीय बना.
इसी तरह यह सवाल उठ रहा है कि चाहे कोयला घोटाला हो या रॉबर्ट वाड्रा प्रसंग या नितिन गडकरी प्रसंग या अंबानी समूह से जुड़े सवाल, ये सब पब्लिक डोमेन (सार्वजनिक जनजीवन) में थे. अगर यह सही है, तो क्यों नहीं मीडिया में ये सवाल उठे? टेलीविजन चैनलों पर इन पर बहस हुई? संसद में इन सवालों पर कहां और कब बहस हुई? किन राष्ट्रीय दलों ने कब और कहां ये सवाल उठाये? दरअसल हकीकत यह है कि ये सारे सवाल शासक वर्ग को पता थे.
शासक वर्ग में अकेले सरकार या मंत्री नहीं हैं, इसमें विपक्ष भी है. सभी सांसद – विधायक हैं. राजनीतिक दल हैं. मीडिया के प्रभावी लोग और घराने हैं. इन्हें सब जरूर पता था. पर अरविंद केजरीवाल द्वारा इन मुद्दों को सार्वजनिक रूप से उठाने से पहले इनमें से किसी ने भी इन सवालों को नहीं उठाया. क्यों? क्या इस देश के शासक वर्ग में एक अघोषित समझौता है, यह सही नहीं है?
इन सवालों के उठने के आंशिक प्रभाव जरूर हुए हैं. मसलन, नितिन गडकरी की कंपनियों पर आयकर विभाग के छापे. उम्मीद है अन्य लोगों पर भी कार्रवाई होगी. वरना इसका संदेश कांग्रेस के लिए प्रतिकूल होगा. रॉबर्ट वाड्रा मामले में हरियाणा के ऑफिसर अशोक खेमका के फैसले पर तत्काल हरियाणा सरकार की रोक, फिर रॉबर्ट वाड्रा के पक्ष में फैसला, खेमका को लगातार मिलती धमकी के जनमानस पर दूरगामी असर होंगे.
इस तरह आज राजनेताओं में न कोई निजी संयम है, न मर्यादा और न वैचारिक प्रतिबद्धता. इनका वर्ग चरित्र एक है. कामकाज एक जैसा. आचरण एक जैसा. धन और गद्दी की भूख भी समान. पिछले कुछेक दशकों में इस देश के राजनीतिक दलों – नेताओं का चरित्र पलट गया है. आज के नेता चाहे जिस भी दल में हों (अपवाद हर जगह हैं) एक तरह रहते, सोचते और करते हैं. पहले के नेता या राष्ट्रीय दल कमोबेश (तब भी हर जगह अपवाद थे) एक तरह रहते, सोचते और करते थे. आज के नेताओं को समझने के लिए पहले के नेताओं को जान लीजिए.
उत्तर प्रदेश में दो बार विधायक रहे रामदत्त जोशी ने कविता लिखी है, ‘मैं पागल हूं’. यह कविता प्रभात खबर में पहले भी छप चुकी है, पर आज के नेताओं के वर्ग चरित्र समझने के लिए इसे बार-बार पढ़ना जरूरी है. रामदत्त जोशी दो बार विधायक रहे. उन्होंने नारायणदत्त तिवारी को भी पराजित किया था. इस कविता को शिल्प या सौंदर्य की दृष्टि से न पढ़ें, बल्कि भाव की दृष्टि से पढ़ें, समझें..
मैं पागल हूं
।। रामदत्त जोशी ।।
मैं एक अघोषित पागल हूं.
जो बीत गया मैं वो कल हूं.
कालान्तर ने परिभाषाएं, शब्दों के अर्थ बदल डाले,
सिद्धांतनिष्ठ तो सनकी हैं, खब्ती हैं नैतिकता वाले.
नहीं धन बटोरने का शऊर ज्यों बंद अकल के हैं ताले,
ईमानदार हैं बेवकूफ, वह तो मूरख हैं मतवाले.
आदर्शवाद है पागलपन, लेकिन मैं उसका कायल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
निर्वाचित जन सेवक होकर भी मैंने वेतन नहीं लिया,
जो फर्स्ट क्लास का नकद किराया भी मिलता था नहीं लिया,
पहले दर्जे में रेल सफर की फ्री सुविधा को नहीं लिया,
साधारण श्रेणी में जनता के साथ खुशी से सफर किया,
जो व्यर्थ मरुस्थल में बरसा मैं एक अकेला बादल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
जनता द्वारा परित्यक्त विधायक को पेनशन के क्या माने?
है एक डकैती-कानूनी, जनता बेचारी क्या जाने?
कानून बनाना जन हित में जिनका कर्त्तव्य वही जाने-
क्यों अपनी ही ऐश्वर्य वृद्धि के नियम बनाते मन-माने?
आंसू से जो धुल जाता है, दुखती आंखों का काजल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
सादा जीवन, ऊंचे विचार, यह सब ढकोसलेबाजी है?
अबके ज्यादातर नेतागण झूठे पाखंडी पाजी हैं,
कुर्सी पाने के लिए शत्रुवत सांप छछूंदर राजी हैं,
कोई वैचारिक-वाद नहीं, कोई सैद्धांतिक सोच नहीं,
सर्वोपरि कुर्सीवाद एक, जिसका निंदक मैं पागल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
है राजनीति तिकड़मबाजी, धोखे, घपले, हैं घोटाले,
गिरते हैं इसी समुन्दर में, सारे समाज के परनाले,
गंगाजल हो या गंदा जल, हैं नीचे को बहने वाले,
संपूर्ण राष्ट्र का रक्त हो गया है विषाक्त मानस काले,
इसके दोषी जन प्रतिनिधियों को अपराधी कहता पागल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
बापू के मन में पीड़ा थी, भारत में व्याप्त गरीबी की,
समृद्ध वर्ग के गांधी ने आधे वस्त्रों में रह कर ही,
ग्रामीण कुटीरों से फूंकी थी स्वतंत्रता की रणभेरी,
उनका सन्देशा था ‘‘ शासक नेताओं रहना सावधान’’
सत्ता करती है भ्रष्ट, मगर यह पागलपन है, पागल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
जन प्रतिनिधियों का जीवन स्तर जन साधारण के ही समान,
है लोकतंत्र में आवश्यक समुचित है नैतिक संविधान,
कोई कोरा-उपदेश नहीं, है गांधी जी का कीर्तिमान,
लंदन के राज-महल में भी, भारत के प्रतिनिधि ने महान,
चरितार्थ किया आदर्शों को, जिनका मैं मन से कायल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
कड़ियों, ईंटों की छत-दीवारें दरकीं, बिना पलस्तर की,
टूटे उखड़े हैं फर्श और हैं फटी चादरें बिस्तर की,
घर की न मरम्मत करा सका दो बार विधायक रह कर भी,
मैं एक खंडहरवासी हूं, खुश हूं इस बदहाली में भी
लाखों जन साधारण बेघर उनकी पीड़ा से घायल हूं.
मैं एक अघोषित पागल हूं.
लेखक हरिवंश प्रभात खबर के एडिटर इन चीफ हैं. देश के जाने-माने पत्रकार हैं. सरोकारी और जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक हैं. हरिवंश के अन्य पठनीय लेखों-विश्लेषणों-संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर हरिवंश





