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‘हीरोगिरी दिखाने का मौका मिला और आत्ममुग्ध हो चुके हृषिकेष सुलभ ने दिखा दिया’

नीचे हृषिकेश सुलभ की सफाई और दूसरों की उनकी हरकत को लेकर राय है, जिसे फेसबुक से लिया गया है. सबसे पहले सुलभ की सफाई फिर दूसरों की राय…

नीचे हृषिकेश सुलभ की सफाई और दूसरों की उनकी हरकत को लेकर राय है, जिसे फेसबुक से लिया गया है. सबसे पहले सुलभ की सफाई फिर दूसरों की राय…


Hrishikesh Sulabh : Saroj Kumar जी, मैं अभी और प्रतीक्षा करता, अगर आपने आग्रह नहीं कि‍या होता सच जानने के लि‍ए. पहले तो यह कि‍ अगर आप वहां नहीं थे तो आपको यह पोस्‍ट नहीं लि‍खना चाहि‍ए था. और यह सवाल कि‍ आपने अपने अखबार में क्‍यों नहीं लि‍खा या कि‍सी और ने … या उस सीनि‍यर पत्रकार ने, जि‍सने आयोजकों को फोन कि‍या था… सरोज जी, नाटक दर्शकों के लि‍ए होता है कि‍सी पत्रकार या वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ के लि‍ए नहीं। कि‍सी को यह हक नहीं कि‍ वह प्रदर्शन के दौरान मंच के सामने दर्शकों की ओर पीठ करके 15 मि‍नट तक खड़ा रहे. चाहे वह प्रेस फोटोग्राफर हो. वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ हो या स्‍वयं आयोजक. नाटक आरम्‍भ हुआ फि‍र वह दर्शकों का है.

पटना के अधि‍कांश प्रेस फोटोग्राफर दर्शकों की ओर प्‍ीठ करके समूचे नाटक की अवधि‍ के दौरान व्‍यवधान पैदा करने और फलैश चमका कर दृश्‍यों को नष्‍ट करने की बुरी आदत से ग्रस्‍त हैं। वे नाटक को राजनेताओं के प्रेसकान्‍फ्रेंस की तरह समझते हैं। यह नया संकट नहीं है। लगातार समझाने मना करने के बाद भी वह नहीं मानते। मना करने के बाद उनके अहं को चोट लगती है। वि‍शेषाधि‍कार का चस्‍का लग चुका है उन्‍हें। कल भी यही हुआ. मना करने, कई संकेत देने के बावजूद वे लगभग 15 मि‍नटों तक पाटक में व्‍यवधान पैदा करते रहे। एक दृश्‍य को तो बि‍ल्‍कुल नि‍कट जाकर छि‍पा ही दि‍या.

दर्शक का भी अपना वि‍शेषाधि‍कार न सही अधि‍कार तो होता ही है। इसी अधि‍कार के नाते मैंने उठकर उन्‍हें मना कि‍या। वे नहीं माने। कुल पांच थे एक साथ दीवार की तरह। मैंने उन्‍हें डपटते हुए कहा आप बाहर जाएं। वे बाहर जाते हुए धमकि‍यां दे रहे थे। मैंने उन्‍हें कहा ''आप जाकर अपने सम्‍पादक को मेरा नाम बता दें।'' मेरी आवाज ऊंची थी. बहुत ऊंची. सारे दर्शकों ने सुनी. और उनके बाहर जाते ही भरे हुए प्रेक्षगृह के दर्शकों तालि‍यों से इस घटना का स्‍वागत कि‍या, क्‍योंकि‍ अब वे नाटक देख पाने की स्‍थि‍ति‍ में थे. कोई भी व्‍यक्‍ति‍ या संस्‍थान जब असंवैधानि‍क सत्‍ता की तरह व्‍यवहार करता है तो उसे ऐसी स्‍थि‍ति‍यों का सामना करना पड़ता है. सो उन्‍हें करना पड़ा. अब आप अपने पोस्‍ट का सच स्‍वयं जानें.

    Saroj Kumar : सर पत्रकारों-फोटोग्राफरों को आयोजक बुलाते क्यों हैं, तस्वीरें खींचने और ऐसे में बेशक वे मंच के पास से फोटो खिंचते हैं…ये कहिए कि दर्शकों को व्यवधान न पड़े इसकी जिम्मेदारी आयोजकों की नहीं क्या और दर्शक और वो भी आप जैसे वरिष्ठ और सम्मानित व्यक्ति पीछे से फोटोग्राफरों का कॉलर पकड़ कर धक्का-मुक्की करे और जोर-जोर सो घोषणा करे कि जाओ संपादक को बता देना मेरा नाम…..इसे कैसे सही किया जा सकता है…किसी को भी अधिकार नहीं कि वह किसी के साथ ऐसा बर्ताव करे…आपको आयोजकों का ध्यान इस ओर आकृष्ठ करना चाहिए था, अगर आपने ऐसा किया होता तो आपकी प्रतिष्ठा में कमी आती क्या…और दर्शकों की तालियां क्या आपको सही ठहरा देती हैं या अधिकार मिल जाता है किसी के साथ ऐसा करने का…

    Chandan Dwivedi : प्रेक्षागृह में उपस्थित सुधीजन नाटक के मंचन के बाद अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे '' सुलभ सर से ऐसी उम्मीद नही थी ''. मैं सुलभ सर के नाम से परिचित था पर पहले कभी देखा नही था, मैंने बाद में पता किया कि आखिर ये कौन से सुलभ सर हैं, मैंने पूरा नाम पता करना चाहा, बाद में सर का पूरा नाम सुन के मुझे आश्चर्य हुआ साथ में दुःख भी.. यह भी सच है कि दर्शकों ने तालियाँ बजाई थी, लेकिन सुलभ सर की प्रतिक्रिया पर नही, दर्शक नाटक में हुए व्यवधान के बाद मंचन दुबारा शुरू होने पर तालियाँ बजा रहे थे..
 
    Gopala Sunya : अपने सम्‍पादक को मेरा नाम बता दो, वाह ई तो फ़िल्मी डायलॉग बोल गए, जहाँ हीरो को ये विशेषाधिकार प्राप्त होता है…. ऐसे ये सामान्य बात है… आदमी को हीरोगिरी दिखाने का मौका मिले और वो चूक जाए, ये तो बेवकूफी होगी!!! और जिनके पास बुद्धि होगी, वो इस तरह का मौका गंवाना बिलकुल पसंद नहीं करेंगे।
     
    Abhishek Srivastava : पता नहीं, लेकिन कुछ दिन पहले दिल्‍ली में सुलभ जी के कुछ पुराने साथी चर्चा कर रहे थे कि लंदन से लौटने के बाद और मूर्ख तेजिंदर शर्मा से पुरस्‍कार लेने के बाद इधर बीच उनका बौद्धिक और सांस्‍कृतिक पतन हो गया है। वे कह रहे थे कि सुलभ जी आत्‍ममुग्‍ध हो गए हैं जो अपनी बड़ी बड़ी तस्‍वीरें और दूसरे शहरों की यात्राओं के स्‍टेटस फेसबुक पर लगाते हैं। हो सकता है यह घटना इस प्रक्रिया की बाइप्रोडक्‍ट हो। सच चाहे जो हो, मैं तो पीड़ित के साथ हूं। सरोज जी ने ठीक काम किया है।

    Gopala Sunya : मैं भी रोजाना "आत्ममुग्ध" होता हूँ, लेकिन मै किसी के कॉलर पकड़ने या उसे धमकाने का साहस नहीं जुटा पाता 🙁


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