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स्टार एंकर राघवेंद्र मुद्दगल और उनकी वो आवाज– “चैन से अगर सोना है तो जागते रहें”

तारीख 15 नवंबर 2012। समय रात करीब दस बजे। मोबाइल की घंटी बजती है। कॉल एक अनजान नंबर से आती है। नंबर दिल्ली का है। ये बात दिल्ली के 011 कोड से पता लग जाती है। हलो करता हूं, तो दूसरी तरफ से आवाज आती है संजीव चौहान बोल रहे हैं। मेरे हां कहते ही, उधर से मेरे ऊपर सवाल फेंका जाता है, पहचाना। जबाब मैं नहीं में देता हूं। इसके बाद भी दूसरी तरफ से आवाज आती है, चलो भाई आप मुझे बाद में पहचान लेना। अगला सवाल उधर से दागा जाता है… आपने भड़ास पढ़ा?

तारीख 15 नवंबर 2012। समय रात करीब दस बजे। मोबाइल की घंटी बजती है। कॉल एक अनजान नंबर से आती है। नंबर दिल्ली का है। ये बात दिल्ली के 011 कोड से पता लग जाती है। हलो करता हूं, तो दूसरी तरफ से आवाज आती है संजीव चौहान बोल रहे हैं। मेरे हां कहते ही, उधर से मेरे ऊपर सवाल फेंका जाता है, पहचाना। जबाब मैं नहीं में देता हूं। इसके बाद भी दूसरी तरफ से आवाज आती है, चलो भाई आप मुझे बाद में पहचान लेना। अगला सवाल उधर से दागा जाता है… आपने भड़ास पढ़ा?

मैंने कहा- जी नहीं…बहुत दिन से नहीं पढ़ा है भड़ास को। क्यों क्या हुआ भड़ास को?

उधर से आवाज आई- फटाफट भड़ास पढ़िये… आपके स्टार एंकर राघवेंद्र मुद्दगल के बारे में खबर छपी है, कि वो वेंटिलेटर पर हैं।

इसके बाद फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

मेरे पास इंटरनेट सुविधा तुरंत उपलब्ध नहीं थी। दिल्ली में एक साथी को फोन मिलाकर भड़ास4मीडिया खुलवाया। दो-तीन सांस में भड़ास पर लिखी पूरी खबर पढ़वा कर सुन ली। ज्यों-ज्यों कानों में खबर के अक्षर उतरते जा रहे थे, त्यों-त्यों "चैन से अगर सोना है तो जागते रहें" दिमाग पर हावी होता जा रहा था। राघवेंद्र की वो आवाज अचानक कैसे अस्पताल की चीख-पुकार और वेंटीलेटर मशीन की आवाज में दबने जा पहुंची। विश्वास ही नहीं हुआ, कि भड़ास की खबर सही है। एक दो लोगों को और उठा-उठाकर भड़ास की खबर की पुष्टि करनी चाही। सब जगह वे ही शब्द… जो पहली बार खबर पढ़ने वाले ने बोलकर सुनाये। "राघवेंद्र मुद्गगल पटना के मगध हास्पिटल के आईसीयू में वेंटीलेटर पर हैं"।

खबर सच साबित हुई। फिर मन पर राघवेंद्र के साथ गुजारे हर लम्हे ने दिमाग पर काबू कर लिया। राघवेंद्र के साथ गुजरा हर लम्हा यादों की ओर धकेल कर ले जा रहा है। "दादा बस स्क्रिप्ट करके आप मुझे दे दो, वीओ (वॉयस ओवर) मैं ही करुंगा, आपकी स्क्रिप्ट का। देख लेना जान लड़ा दूंगा…"।

राघवेंद्र तुम्हारी आवाज अभी इतनी कमजोर नहीं हो सकती, जिसे अस्पताल की चीख-पुकार या फिर वेंटीलेटर मशीन की आवाज उस पर कब्जा कर ले। मैं सच कह रहा हूं। पूरे होश-ओ-हवास में। बिना भावुकता में बहे।  राघवेंद्र मुझे विश्वास है कि तुम्हारी आवाज जिंदा थी, है और जिंदा रहेगी। तुम्हारी आवाज की नकल कर सकते हैं। ये मीडिया है, अत्याधुनिक तकनीक है। कुछ भी हो सकता है। लेकिन तुम्हारी आवाज की तो नकल भी संभव नहीं है। न तुम्हारी आवाज अभी भी बुलंद ही है। बस भड़ास की यह खबर ही झूठी लगती है मुझे तो…..मेरे छोटे भाई।

लेखक संजीव चौहान वरिष्ठ क्राइम जर्नलिस्ट हैं. वे कई चैनलों में क्राइम और एसआईटी हेड रह चुके हैं.

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