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मीडिया के इस अपराध की सजा कौन तय करेगा?

: टीआरपी, हेडलाइंस और हेडिंग… मीडिया के संसार के ये अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द हैं। मीडिया इन्हीं को जीता है, इसीलिए किसी की मौत को भी सिर्फ अपने नजरिए से ही देखता है और अंतिम यात्राओं में भी तलाश कुछ ऐसी करता है, कि लोग देखते रहें, स्क्रीन से हटें नहीं। बाल ठाकरे की मौत का मातम भी मीडिया के लिए एक इवेंट ही बना रहा और श्रद्धा के सैलाब से उमड़ी अंतिम यात्रा भी रही सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक बहस का मुद्दा। संवेदनाओं में भी संभावनाओं की तलाश करते मीडिया पर -निरंजन परिहार का लेख… :

: टीआरपी, हेडलाइंस और हेडिंग… मीडिया के संसार के ये अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द हैं। मीडिया इन्हीं को जीता है, इसीलिए किसी की मौत को भी सिर्फ अपने नजरिए से ही देखता है और अंतिम यात्राओं में भी तलाश कुछ ऐसी करता है, कि लोग देखते रहें, स्क्रीन से हटें नहीं। बाल ठाकरे की मौत का मातम भी मीडिया के लिए एक इवेंट ही बना रहा और श्रद्धा के सैलाब से उमड़ी अंतिम यात्रा भी रही सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक बहस का मुद्दा। संवेदनाओं में भी संभावनाओं की तलाश करते मीडिया पर -निरंजन परिहार का लेख… :

दुर्भाग्य के दावानल में भी दर्द को दरकिनार करता मीडिया

-निरंजन परिहार-

‘मातोश्री’ से इससे पहले ट्रक पर सवार होकर बाला साहेब कभी नहीं निकले। पर 18 नवंबर को रविवार की सुबह जब निकले तो दोबारा कभी नहीं लौटने के लिए निकले थे। फूलों से लदे थे। सदा के लिए सोए थे। तिरंगे में लिपटे थे। और यह तो निर्विकार किस्म का निपट संयोग ही था कि पूरे जनम भर बाला साहेब जिस रंग से दिल से प्यार करते रहे, हमारे राष्ट्रीय ध्वज के ऊपरी हिस्से का वही भगवा रंग बाला साहेब की देह पर दिल से लगा हुआ था। पिता की पार्थिव देह के साथ उद्धव ठाकरे उनके आखरी सफर में ट्रक पर सवार थे और साहेब की इस अंतिम सवारी की अगुवाई कर रहे थे राज ठाकरे। ट्रक के आगे आगे सड़क पर पैदल चलकर। बाला साहेब की इस अंतिम यात्रा में पूरा ठाकरे कुटुंब, सारी शिवसेना, समूची मुंबई, महाराष्ट्र, देश और हमारी राजनीति के बहुत सारे रंग, इन सबको मिलाकर जो माहौल बन रहा था, वह सबके लिए सिर्फ और सिर्फ एक शोक का संगीत था। और कुछ भी नहीं।

मौत होती ही ऐसी है। वह जब आती है, तो शोक के शोरगुल के साथ दीर्घकालिक शांति के अलावा और कुछ नहीं लाती। इसीलिए जब कोई जाता है, तो वहां सन्नाटे का साया भी पसरा होता है। शोक के इस सन्नाटे में आम तौर पर सिर्फ दर्द का दरिया ही दिखता है। लाखों लोग, हजारों महिलाएं और बहुत सारे बच्चे भी भूखे और प्यासे पैदल चलकर साहेब का शोकगीत गा रहे थे। लेकिन क्योंकि हम सारे ही दुनियादार लोग हैं। मनुष्य होने की सारी कमजोरियों के साथ मीडिया में जिंदा हैं। सो, अकसर न चाहते हुए भी दूसरों के दर्द में भी अलग आयाम की तलाश पर निकल पड़ते हैं। फिर तलाश की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि जो हमारे आस पास घट रहा होता है, तलाश भी हम उसी में करते हैं।

बाला साहेब राजनेता थे। उनके देहावसान और अंतिम यात्रा में राजनीति के बहुत सारे रंग थे ही। इसीलिए अंतिम यात्रा में भी हमने अपने लिए ऐसे ही कई अलग किस्म के बहुत ही रंगीन आयाम तलाश लिए, जो भले ही अवसर की असरदार उपादेयता थे, पर माहौल से मेल खाने के साथ हमारे मन के मैल से भी मेल खाने के अलावा सार्वजनिक रूप से सहज स्वीकार्य तो थे ही। सो, हमने अंतिम यात्रा में राज ठाकरे के हाल को देखकर उनकी आगे की नीति और नियती के अलावा उद्धव के अस्तित्व से आगे के आयाम भी तलाश लिए।

साहेब का शोक गीत गा रही मुंबई के मातम में हम सबने देखा कि जो लोग जिंदगी भर उनके विरोध में खड़े रहे, वे भी बाला साहेब को फूल चढ़ाने के लिए कतार में खड़े थे। जिंदगी के किसी मोड़ पर जो लोग कभी बाला साहेब को छोड़कर चले गए थे, वे भी लौट आए थे। अंतिम दर्शन करने। विदाई देने। शायद प्रायश्चित करने भी। बहुत सारे वे लोग, जो जीवन भर बाला साहेब की बखियां उधेड़ते रहे, वे भी पुष्पांजलि लेकर पहुंचे थे। है कोई ऐसा नेता, जिसके दुनिया से विदा हो जाने पर उसकी सबसे प्रबल विरोधी पार्टी ने भी बाकायदा उन्हीं के मुखपत्र और बाकी बहुत सारे अखबारों में भी इश्तिहार देकर शोक गीत गाया हो। राष्ट्रवादी कांग्रेस ने बाला साहेब के सम्मान में अखबारों में विज्ञापन दिए, बैनर लगाए और अपने बहुत सारे नेताओं के साथ पार्टी के मुखिया शरद पवार खुद वहां पहुंचे भी। पूरी जिंदगी कट्टर हिंदुवाद का जामा पहनाकर जिन बाला साहेब को कांग्रेस हमेशा निशाने पर रखे रही, उसी कांग्रेस के नेता भी न केवल दिल्ली से खास तौर से श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचे, बल्कि बाला साहेब के सम्मान में मुंबई में कई जगहों पर बैनर और होर्डिंग लगाकर भी कांग्रेस ने उनको श्रद्धांजली दी।

अपन ने कई बड़े बड़ों को इस दुनिया से जाते देखा है, कईयों की आखरी विदाई के गवाह भी अपन रहे हैं पर बीते कुछेक सालों में देश में किसी भी और राजनेता की ऐसी विदाई नहीं देखी, जैसी बाला साहेब की रही। पर, सुना जरूर है कि हमारे हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के ज्ञात इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी अंतिम यात्रा रही अन्ना दुराई की। मद्रास के मुख्यमंत्री अन्ना दुराई की अंतिम यात्रा में डेढ़ करोड़ लोग थे। मोहनदास करमचंद गांधी की अंतिम यात्रा में 25 लाख और जवाहरलाल नेहरू के 22 लाख। एमजी रामचंद्रन और एनटी रामराव के अलावा वायएस राजशेखर रेड्डी की अंतिम यात्रा में भी दस दस लाख लोग थे। दुनिया के सबसे बड़े धर्मगुरू कहे जानेवाले पोप जॉन पॉल की अंतिम यात्रा में भी लोग सिर्फ दस लाख ही थे। पर बाला साहेब की अंतिम यात्रा में साथ चलने और अंतिम संस्कार स्थल पर पांच लाख से ज्यादा और रास्ते भर उनको श्रद्धासुमन अर्पित करनेवालों की संख्या कुल मिलाकर बीस लाख के पार थी।

हमारी संस्कृति और संस्कारों में भले ही इस बात की इजाजत बिल्कुल नहीं है कि किसी की प्राण विहीन देह के सामने ही दैत्यों की तरह उसकी विरासत और वारिस के फैसलों पर बहस की जाए। पर, हमारी दुनिया में, और खासतौर से हमारे इस देश में अक्सर यह होता है कि एक जीता जागता शख्स अचानक हेडिंग और हेडलाइंस में तब्दील हो जाता है और फिर उसके बारे में वे लोग भी कई तरह की कहानियां कहने लगते हैं, जिनसे किसी का कभी कोई वास्ता नहीं रहा होता। बाला साहेब की अंतिम यात्रा को भी हमने अपनी अलग अलग नजरों से देखा।

इस यात्रा में हमने उद्धव ठाकरे की अलग अहमियत देखने की कोशिश की और राज ठाकरे की राजनीति के रंग तलाशने का प्रयास भी। न तो हमको बाला साहेब के प्रति उमड़ती श्रद्धा का समृद्ध संसार, न श्रद्धांजली देने आए अपार जनसमुदाय की संख्या और न ही देश के इतिहास की एक और बहुत बड़ी अंतिम यात्रा दिखी। बाला साहेब के ना रहने से ठाकरे कुटुंब और समूची शिवसेना में पैदा हुए दर्द के दावानल से उपजी भावनाओं की तस्वीर देखने की फुरसत हमको नहीं मिली। हम सब दुर्भाग्य में भी दिल का सुकून तलाशने में माहिर हैं, सो बाला साहेब की अंतिम यात्रा में भी हमने तलाशी तो, सिर्फ राज की राजनीतिक ताकत, उद्धव का संभावित अस्तित्व और महाराष्ट्र की राजनीति के भविष्य की तस्वीर। बाकी कुछ नहीं।

जाना एक दिन सभी को है। आपको भी और हमको भी। ऊम्र किसी की कम तो किसी की ज्यादा है। बाला साहेब 86 साल के थे। और वे कोई अमृत खाकर नहीं जन्मे थे कि अपने कुटुंब और कबीले की राजनीति को निखारने और उसमें आनेवाली बाधाओं को सुलझाने के लिए ही हमेशा जिंदा रहते। इस पूरे परिदृश्य में मूल विषय पिता की छत्रछाया खो चुके उद्धव ठाकरे नाम के एक दुखी आदमी की ताकत तलाशने का नहीं है। रोते और आंसू पोंछते राज ठाकरे की राजनीतिक जमीन में गहरी जाती जड़ें भी कोई विषय नहीं है। और न ही दुनिया से आखरी विदाई ले चुके बाल केशव ठाकरे नाम का एक वह वयोवृद्ध शख्स कोई विषय है।

मूल विषय है हमारे अंतःकरण में छिपी हर किसी में कुछ ना कुछ तलाशते रहने की भावना और हमारी उन भावनाओं को आकार देने की हमारी कल्पनाशक्ति, जो हमें दुर्भाग्य में भी राजनीति तलाशने को मजबूर कर देती है। फिर टेलीविजन के दृश्यों का वह जागता बहता संसार तो कुल मिलाकर शुद्ध टीआरपी का खेल है। हेडिंग और हेडलाइंस की वह होड़ भी अंततः सर्कुलेशन के संसार का ही हिस्सा है। पर, टीआरपी और सर्कुलेशन आखिरकार शब्द हैं। लेकिन हर शब्द और हर कर्म की अपनी मर्यादाएं होती है। और मीडिया में होने की वजह से मर्यादाएं तोड़ने के अपराध से हम आजाद नहीं हो सकते। भले ही हम मनुष्य होने की सारी कमजोरियों के साथ जिंदा हैं। पर, भावनाएं हममें भी हैं। संवेदनाओं की समझ भी हम सबको है। फिर भी, संवेदनाओं में सनसनी खोजने और दुर्भाग्य में भी दर्द को दरकिनार करके हम सिर्फ और सिर्फ राजनीति ही तलाशेंगे, तो हमारे इस अपराध की सजा कौन तय करेगा?

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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