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मीडिया पर चला सरकारी हथौड़ा

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत का खबरिया चैनल टाइम्स नाउ के खिलाफ अभूतपूर्व 100 करोड़ रु. का मानहानि का दावा ठोकना मीडिया को खरा-खोटा कहने के इस मौसम में दंडात्मक कार्रवाई का सबसे ताजा उदाहरण है. न्यायमूर्ति सावंत के नजदीकी सूत्रों के मुताबिक, वे चाहते हैं कि पुणे की सिविल अदालत के एक न्यायाधीश वी.के. देशमुख के 26 अप्रैल को दिए गए एक फैसले से मीडिया को आचारनीति के बारे में एक कड़ा संदेश दिया जाए.

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत का खबरिया चैनल टाइम्स नाउ के खिलाफ अभूतपूर्व 100 करोड़ रु. का मानहानि का दावा ठोकना मीडिया को खरा-खोटा कहने के इस मौसम में दंडात्मक कार्रवाई का सबसे ताजा उदाहरण है. न्यायमूर्ति सावंत के नजदीकी सूत्रों के मुताबिक, वे चाहते हैं कि पुणे की सिविल अदालत के एक न्यायाधीश वी.के. देशमुख के 26 अप्रैल को दिए गए एक फैसले से मीडिया को आचारनीति के बारे में एक कड़ा संदेश दिया जाए.

सूत्र कहते हैं, ''यह मामला न्यायमूर्ति सावंत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मीडिया के लिए एक सबक है. अगर मीडिया बेकसूर लोगों की मानहानि करके कोई गलती करता है और अगर गलती उसकी जानकारी में लाई जाती है, तो उसे तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए.'' पुणे के रहने वाले 81 वर्षीय न्यायमूर्ति सावंत, जो भारतीय प्रेस परिषद के भी पूर्व अध्यक्ष हैं, इस मामले को आगे चलाने का इरादा रखते हैं, लेकिन पैसे के लिए नहीं. सूत्र कहते हैं, ''अगर उन्हें 100 करोड़ रु. मिलते हैं, तो वे इसे धर्मार्थ खर्च कर देंगे. हर कोई जानता है कि उन्होंने अण्णा हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट के खिलाफ आरोपों की 2 साल तक मुफ्त में जांच की थी.''

वे 100 करोड़ रु. की रकम को जायज ठहराते हैं, ''अगर कोई उद्योगपति अपने ही भाई के खिलाफ मानहानि का 10,000 करोड़ रु. का दावा कर सकता है, तो कोई ईमानदार न्यायाधीश एक गलती करने वाले टीवी चैनल के खिलाफ 100 करोड़ रु. का दावा क्यों नहीं कर सकता?'' दस्‍तावेजों से आभास होता है कि न्यायमूर्ति सावंत ने मानहानि का दावा इस कारण ठोका है, क्योंकि वे महसूस करते हैं कि चैनल अपनी गलती के लिए माफी मांगने में ''गंभीर नहीं था.'' चैनल ने 10 सितंबर, 2008 को शाम 6.30 बजे के बुलेटिन में असावधानी से एक सरीखे सुनाई देने वाले न्यायमूर्ति पी.के. सामंत की जगह न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत का चित्र भविष्य निधि मामले में एक अभियुक्त के तौर पर लगा दिया था. चित्र 15 सेकंड तक स्क्रीन पर रहा. न्यायमूर्ति सावंत के निजी सहायक ने बुलेटिन देखा और उन्हें फोन करके इस गलती की सूचना दी. न्यायमूर्ति सावंत ने उसे चैनल को बताने और गलती की सूचना उन्हें देने को कहा, जो उसने कर दिया.

लेकिन जब टाइम्स नाउ ने तुरंत माफी नहीं मांगी तो न्यायमूर्ति सावंत इस पर परेशान हो गए. 15 सितंबर, 2008 को उन्होंने उन्हें एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें कहा गया था कि अगर वे माफी नहीं मांगते, तो वे उनके खिलाफ 100 करोड़ रु. का मानहानि का दावा करेंगे. 25 सितंबर को चैनल ने उन्हें उनके नोटिस का उत्तर भेजा, जिसमें कहा गया था कि वह 23 सितंबर से एक स्क्रॉल दिखा रहे हैं, जिसमें माफी मांगी गई है और यह स्क्रॉल पांच दिन तक चलता रहेगा.

न्यायमूर्ति सावंत ने 27 सितंबर को चैनल को लिखा कि उन्होंने माफी तब मांगी है, जब उन्होंने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा. ''यह एक भड़काने वाली बात है और मैं आपके खिलाफ मानहानि का दावा पेश करने जा रहा हूं.'' 1 अक्तूबर, 2008 को चैनल के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी ने न्यायमूर्ति सावंत को पत्र लिखकर मिलने का समय मांगा. 4 अक्तूबर, 2008 को न्यायमूर्ति सावंत ने इसका जवाब देकर उन्हें 11 अक्तूबर को अपने पुणे स्थित निवास पर शाम चार बजे आने को कहा.

8 अक्तूबर को गोस्वामी ने फिर न्यायमूर्ति सावंत को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें शल्य चिकित्सा करवानी है और वह 11 अक्तूबर को उनसे नहीं मिल सकेंगे. लेकिन न्यायमूर्ति सावंत ने देखा कि गोस्वामी ने उस दिन अपना नियमित शो पेश किया. उन्होंने पुणे सिविल अदालत में मानहानि का मामला दर्ज कराने का अपना फैसला पक्का कर लिया. न्यायाधीश देशमुख के सामने सुनवाई में टाइम्स नाउ ने स्वीकार किया कि उन्होंने सावंत का चित्र गलती से लगा दिया था. लेकिन उन्होंने सावंत की ओर से मांगी गई हर्जाने की रकम, 100 करोड़ रु., पर देशमुख के समक्ष अपने तर्कों में या अपने लिखित बयानों में प्रतिवाद नहीं किया. दो गवाहों ने सावंत के पक्ष में गवाही दी, जबकि टाइम्स नाउ ने तीन गवाह पेश किए. 26 अप्रैल, 2011 को देशमुख ने फैसला सुनाया कि टाइम्स नाउ के बुलेटिन ने सावंत की मानहानि की है.

उन्होंने चैनल को हर्जाने के 100 करोड़ रु. का भुगतान उन्हें करने का निर्देश दिया. पुणे अदालत के फैसले के खिलाफ टाइम्स नाउ ने सितंबर 2011 को बंबई हाइकोर्ट में अपील की. न्यायमूर्ति बी.एच. मर्लापल्ले और न्यायमूर्ति निशिता म्हात्रे की खंडपीठ ने चैनल को निर्देश दिया कि अगर वह चाहता है कि उसकी अपील को स्वीकार किया जाए, तो वह 20 करोड़ रु. नकद और 80 करोड़ रु. की बैंक गारंटी जमा कराए. हाइकोर्ट के इस रवैए के खिलाफ टाइम्स नाउ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. लेकिन न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय ने बंबई हाइकोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाइकोर्ट इस मामले पर इसके गुण-दोषों के अनुसार फैसला कर सकता है. टाइम्स नाउ  ने अभी तक पैसा जमा नहीं करवाया है.

बंबई हाइकोर्ट 20 करोड़ रु., शुरुआत में एक वर्ष के लिए, एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा में जमा करवाएगा. ब्याज की मौजूदा दरों के अनुसार, इस पर 9.5 प्रतिशत की दर से, एक वर्ष में 1.9 करोड़ का ब्याज मिलेगा. जो पक्ष मुकदमा जीतेगा, उसे यह रकम ब्याज सहित मिलेगी. अगर न्यायमूर्ति सावंत यह मुकदमा जीतते हैं, और चैनल भुगतान नहीं कर पाता है, तो 80 करोड़ रु. उसकी ओर से गारंटी लेने वाले बैंक को चुकाने होंगे. राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता और वकील अरुण जेटली 100 करोड़ रु. के हर्जाने को 'असंगत' करार देते हैं. जेटली कहते हैं, ''भारतीय अदालतें जिस मात्रा में हर्जाना दिलवाती हैं, उसकी जानकारी रखने वाले की हैसियत से, यह आदेश कुछ असामान्य लगता है.'' ''भारतीय मीडिया को बंद कर देने का इससे बेहतर तरीका कोई और नहीं हो सकता है कि पत्रकारों, समाचारपत्रों और टीवी चैनलों के खिलाफ ऐसे दंडात्मक हर्जानों के फैसले सुना दिए जाएं, जो भारतीय समाज में पैसे के मूल्य से पूरी तरह असंगत हों.''

इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आइएनएस) के अध्यक्ष आशीष बग्गा कहते हैं कि टाइम्स नाउ  का मामला भारत में मीडिया के अस्तित्व का सशक्त खतरा पेश करेगा. यह स्वीकार करते हुए कि मानहानि का कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार की एक महत्वपूर्ण शर्त है, वे कहते हैं कि इसका अर्थ इस ढंग से निकाला जाना चाहिए, जो मीडिया के सहज कामकाज में बाधक न हो. यहां तक कि भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी, जो वैसे मीडिया के आलोचक रहते हैं, अदालतों से उस आदेश पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है, जिसे वे  'सही नहीं' कहते हैं. 30 अक्तूबर को, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले काटजू ने पिं्रट मीडिया और टेलीविजन न्यूज चैनलों की देखरेख करने के लिए एक मीडिया परिषद बनाने की जरूरत की चर्चा की थी. इस सुझव को देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने खारिज कर दिया था, जो न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के जरिए स्थापित की गई आत्म नियंत्रण प्रणाली के प्रमुख हैं.

एनबीए का न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंर्ड्स विवाद निपटान प्राधिकरण अक्तूबर 2008 से काम कर रहा है. 45 न्यूज चैनलों की सदस्यता वाला एनबीए पहले ही दिशा-निर्देश बना चुका है और 198 शिकायतें सुन चुका है, नौ ब्रॉडकास्टर्स के खिलाफ आदेश जारी कर चुका है और जुर्माना लगा चुका है. बाकी बचे 320 न्यूज चैनलों को भी एनबीए के दायरे के तहत लाने के प्रयास जारी हैं. न्यायमूर्ति वर्मा ने इंडिया टुडे से कहा, ''आप सारी चीजें रातोरात नहीं बदल सकते. 26/11 को मुंबई पर हुए हमलों के कवरेज के बाद से आत्मशासित नियम लगे हुए हैं. मीडिया ने उनका पालन किया है. स्टिंग ऑपरेशनों से जुड़े दिशा-निर्देशों पर अमल हो रहा है.'' लेकिन वे  मीडिया को चेतावनी देते हैं कि बाहरी नियंत्रण को बुलावा देने से बचने के लिए वह हदें पार न करे. वे कहते हैं, ''मैं एकांत में मीडिया के एंकरों और सीईओ की खिंचाई करता रहता हूं.'' वे  मानते हैं कि टाइम्स नाउ के मामले में न्यायपालिका अतिवादी हो गई है.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के अध्यक्ष एन.के. सिंह फैसले को बेतुका करार देते हैं. वे कहते हैं, ''100 करोड़ रु. भारी भरकम रकम है. दुनिया में कहीं भी मानहानि से इतनी मोटी रकम नहीं मिलती. कोई इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचता है कि किसी व्यक्ति का सम्मान 100 करोड़ रु. का है? चैनल का इरादा किसी की मानहानि करने का नहीं था. दुनिया भर के कानून इरादे के पहलू को ध्यान में रखते हैं.'' मीडिया एक भ्रष्टाचार के मामलों में फं सी-घिरी हुई यूपीए सरकार और भारतीय प्रेस परिषद के एक आक्रामक अध्यक्ष न्यायमूर्ति काटजू की ओर से हमलों का सामना कर रहा है, जो सोचते हैं कि पत्रकारों का ''घटिया बौद्धिक स्तर'' होता है. टेलीविजन के शीर्ष संपादक बीईए के तहत न्यायमूर्ति सावंत से मिलने और उन्हें मामला वापस लेने के लिए सहमत करने की कोशिश करने की योजना बना रहे हैं.

गोस्वामी कहते हैं कि वे और उनका संगठन सावंत का बहुत सम्मान करते हैं. वे कहते हैं, ''हम उनसे माफी मांग चुके हैं. यह एक कंप्यूटर से पैदा हुई त्रुटि थी, जिसमें कोई मानवीय हस्तक्षेप और कोई दुर्भावना शामिल नहीं थी.'' लेकिन अदालतें ऐसा नहीं मानतीं. साभार : इंडिया टुडे

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