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काम के लिए रवि भारती के मुंह से ‘न’ कभी नहीं निकला

पहले दुनिया जहान को चैन से रहने के लिए हर रात जगाते रहने वाले राघवेंद्र मुद्दगल चले गये। अब खबर के लिए जान की परवाह न करने वाले रवि भारती भी साथ छोड़ गये। 21-11-2012 को दिल्ली से मोबाइल पर एक छोटे भाई का संदेश आया। "SIR, RAVI BHARTI IS NO MORE"….मोबाइल पर बातचीत में पता चला कि वाकई रवि भारती इस मायावी और झंझावती दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। बिना किसी से कोई शिकवा शिकायत किये।

पहले दुनिया जहान को चैन से रहने के लिए हर रात जगाते रहने वाले राघवेंद्र मुद्दगल चले गये। अब खबर के लिए जान की परवाह न करने वाले रवि भारती भी साथ छोड़ गये। 21-11-2012 को दिल्ली से मोबाइल पर एक छोटे भाई का संदेश आया। "SIR, RAVI BHARTI IS NO MORE"….मोबाइल पर बातचीत में पता चला कि वाकई रवि भारती इस मायावी और झंझावती दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। बिना किसी से कोई शिकवा शिकायत किये।

रवि की मृत्यु दिल्ली के गीता कालोनी इलाके में खुरेजी चौक पर हुए एक सड़क हादसे में हुई। ये हादसा दिन के करीब 12 बजे हुआ। हादसा उस समय हुआ, जब रवि किसी काम से गीता कालोनी इलाके में ही मोटर साइकिल से जा रहे थे।

खुरेजी चौक पर पहुंचते ही रवि की मोटर साइकिल को पीछे से आ रहे एक ट्रक ने टक्कर मार दी। चालक ट्रक सहित मौके से फरार हो गया। रवि को डॉ. हेडगेवार अस्पताल में दाखिल कराया गया। अस्पताल में डाक्टरों ने रवि को मृत घोषित कर दिया गया। रवि की मौत की खबर सुनकर सन्न रह गया। यूं तो भारत के मीडिया में हर कोई खुद को खुद की ही जुबान से "धुरंधर" कहने से बाज नहीं आता है। मगर रवि भारती इस भीड़ से अलग थे। अलग इसलिए कि वो मीडिया की भेड़चाल में कभी खुद को शामिल नहीं कर पाये। एकदम अलग-थलग रखा उन्होंने खुद को।

इस धंधे के प्रपंचों से खुद को बचाकर। मेरी रवि से मुलाकात हुई सन् 2005-2006 में। आजतक में। उस वक्त आजतक दिल्ली के वीडियोकॉन टॉवर में था। दोपहर के वक्त रवि आये। अपना परिचय दिया। और बोले सर आज से मैं आपको रिपोर्ट करुंगा।

पता नहीं नज़र उठाकर मैंने रवि की ओर देखा, तो कुछ अलग सा नज़र आया। अलग ही चमक थी। बात आई गई हो गयी। रवि ने मेरे साथ काम करना शुरु कर दिया। रवि के साथ कई और भी नये साथी आजतक/ दिल्ली आजतक में मेरे साथ जुड़े। रवि की जिम्मेदारी थी दिल्ली के यमुनापार (पू्र्वी दिल्ली) की खबरों का संकलन करना। कई बार मैंने रवि को देखा कि उनसे जो कहा, उसके लिए उनके मुख से "न" नहीं निकला। "ठीक है सर आप फोन काटें। मैं कोशिश करता हूं।"

और सच बताऊं रवि की कोशिश कभी भी नाकाम नहीं रही। मुझे जहां तक याद आ रहा है। कुछ स्ट्रिंगर साथी बरसात का बहाना, ठंड का बहाना, स्पॉट घर से काफी दूर होने का तर्क देकर या फिर दूसरे का इलाका होने का तर्क देकर खुद को पीछे खींच लेते थे। लेकिन रवि हमेशा तैयार रहते थे। उन्हें काम से मतलब था। काम से और काम भी वक्त पर। न्यूज चैनल में वक्त की क्या वकत होती है, ये रवि भारती को पता था।

मुझे वो कोई रात, वो कोई तेज सर्दी वाला दिन, वो कोई तेज बरसात वाला दिन, वो कोई मई जून की तपती दोपहरी वाला दिन याद नहीं आ रहा है, जिस दिन मैंने रवि से किसी फुटेज को मांगा हो, और उन्होंने इन सब बातों, तर्कों का सहारा लेकर कभी फुटेज मुहैया कराने से मना किया हो।

रवि आज मेरे दोस्त तुम पर अगर मैं ये चंद अल्फाज लिखने की हिम्मत तुम्हारी अनुपस्थिति में कर पा रहा हूं, तो इसके पीछे भी मेरी असली ताकत तुम और काम के प्रति तुम्हारी ईमानदारी ही है। लिखने को तो तुम्हारे जैसे साथी पर मेरे दोस्त पूरी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन शायद उसे लिखने में मैं ही कहीं लीक से न हट जाऊं। इसलिए आज तुम पर जो भी ये अल्फाज लिख रहा हूं, ये तुम्हारे लिए नहीं, मैं अपने दिल को समझाने के लिए तुम्हारी मौत का बहाना लेकर लिख रहा हूं। मुझे माफ करना मेरे दोस्त।

अलविदा रवि…अलविदा…सादर सिर झुकाकर…

लेखक संजीव चौहान वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. संजीव से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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