मेरे एक परिचित की नौकरी पुणे में एक निजी बैंक में लगी थी. काले धन को देश में ही गोरा बना देने में वह बैंक काफी प्रसिद्ध है. तो उस बैंक ने मेरे उस मित्र सहित अपने कुछ अधिकारियों को महाराष्ट्र के कुछ धनिकों की सूची देते हुए आंतरिक रूप से एक आकलन पेश किया था. उस आकलन के अनुसार शरद पवार की संपत्ति भारत के कुछ राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादे आंकी गयी थी. उपरोक्त आकलन के पक्ष में इस लेखक के पास कोई सबूत नहीं है और न ही वह बैंक कोई सबूत देने की बात करता था. ज़ाहिर है बैंक की तो बस अपने कर्मचारियों से यही उम्मीद रही होगी कि वे इनलोगों पर ध्यान रखें और कोशिश करें कि ऐसे लक्ष्मी पुत्रों को अपना ग्राहक बनाया जाय. खैर.
शरद पवार को एक सरफिरे का तमाचा और ऊपर के वर्णन में कोई साम्य हो ऐसी बात नहीं है. उस युवक के तमाचे को नागरिकों के आक्रोश का प्रतीक मान लिया जाय, ऐसे सरलीकरण की भी ज़रूरत नहीं है. हमले के बाद के प्राइम टाइम में सभी टीवी चैनलों पर सरकारी पक्ष भी या तो यह साबित करने में तुला था कि ये घटना कहीं से भी लोगों के क्रोध का प्रतीक नही है या फिर ये कि यह भाजपा नेता यशवंत सिन्हा द्वारा दिए गए उकसाऊ बयान का परिणाम है. वहीं शेष लोग निंदा की औपचारिकता के बाद इस आक्रमण को महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन आदि पर आम जन के गुस्सा से या फिर अपने-अपने एजेंडे अनुसार इसे खुद के उठाये गए सवालों से को-रिलेट कर रहे थे. मसलन टीम अन्ना की मानें तो यह थप्पड़ तो केवल लोकपाल के लिए था. आदि-आदि.
तो अंधे की हाथी की तरह लोग भले ही अपने-अपने हिसाब से इस घटना को व्याख्यायित करें, इसे जनाक्रोश की अभिव्यक्ति भले न माना जाय, लेकिन घटना के बाद आमजनों द्वारा व्यक्त की गयी प्रतिक्रया सही अर्थों में जनाक्रोश को तो व्यक्त करता प्रतीत हो रहा है, इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा.
आप फेसबुक या ट्विटर जैसी साइटों या ब्लॉग आदि पर जा जाकर देखें. शायद दस प्रतिशत भी ऐसे स्टेटस या पोस्ट आपको ऐसा नहीं मिलेगा जहां किसी भी तरह से इस घटना की निंदा की गयी हो. हां अगले कुछ दिनों तक लगातार आप अखबारों में या टीवी चैनलों पर ज़रूर चीज़ों को छन कर देखेंगे या पढेंगे. चुकि अखबारों या अन्य प्रसार माध्यमों को कई अनदेखे-अप्रत्यक्ष सेंसर से गुजरना पड़ता है (गुजरना भी चाहिए) तो वहां का कोई लेख आपको वास्तविक तस्वीर नहीं दिखा सकता है. उदाहरण के रूप में अगर आप इस थप्पड़ को जनता के आक्रोश की परिणति मानते भी हों तब भी अखबार में छपने के लिए घटना की निंदा करना ही होगा या टीवी पर भी जाने के लिए पल भर को लोकतंत्र और अहिंसा से प्यार का स्वांग भरना ही होगा, झूठा ही सही. लेकिन नया मीडिया आपको यह सुविधा देता है कि वहां जा कर आप जनता की नब्ज़ थाम्ह सकते हैं. वहां कोई एडिटर नहीं बैठा है. कोई बाजारू दबाव नहीं है, ‘हो रहे भारत निर्माण’ के विज्ञापन का लोभ भी नहीं, खुद को धर्म निरपेक्ष, शर्म निरपेक्ष या निष्पक्ष दिखाने के बेजा दबाव से मुक्त होने के कारण भी आप जन भावनाओं उसके आंतरिक इच्छाओं के प्रकटीकरण का माध्यम नए मीडिया के रूप में स्थान बनाते वेब मीडिया को मान सकते हैं, इस माध्यम से कर सकते हैं.
और यह मीडिया आपको सीना तान कर यह कहने की आज़ादी देता है कि हां हमें नफरत है नेताओं से. हम घृणा करते हैं कलमाडियों से. खुशी होती है राजा और कनिमोझी को दीवाली पर भी ज़मानत नहीं मिलने पर. गुस्सा आता है हमें पवारों और मोरानियों के संबंध पर. लवासा और आदर्श पर. 2G और K G पर. रोज़मर्रा के चीज़ों की कमरतोड कीमतों और बावजूद उसके उसे पैदा करने वाले किसानों की आत्महत्या पर. बिचौलियों-जमाखोरों का नेताओं के गठजोड़ से किये जा रहे लाखों-करोड के महंगाई घोटाले पर. कृषि मंत्री के क्रिकेट मंत्री हो जाने पर. जनता के प्रति ज़िम्मेदार होने के बदले किसी मंत्री के चीनी मिल मालिक के रूप में ही अपनी भूमिका निभाने पर भी. कपास उत्पादक किसान के दुःख-दर्द में शामिल होने के बजाय शूटिंग-शर्टिंग वाली कंपनियों के फैशन परेड में शामिल होने पर भी. सुदखोरों से क़र्ज़ लेकर जिंदगी भर शोषण के चक्रव्यूह में फंस जाने वाले मिहनतकशों के देश में दानवों द्वारा काले धन की सारी पूंजी नकारात्मक व्याज पर विदेशों में ज़मा कर लेने पर भी. कहोऊ कहाँ लगि ‘दाम’ बडाई…! बहरहाल.
राजनेता इस विसंगतियों का किसी भी तरह का समाधान खोज कर ले आयेंगे उसकी तो उम्मीद ही व्यर्थ है. लेकिन लोगों का आक्रोश थप्पड़ के रूप में न निकले इस हेतु मीडिया से भी कुछ विधि-निषेध की अपेक्षा है. आप गौर करें. भारत के किसी जिले में अगर दस हज़ार किसान इकट्ठे होकर एक आंदोलन करते तो क्या उनकी बात इस तरह से सुनी जाती जैसे उस युवक की सुनी गयी? किसी सुदूर जिले की ही क्यूं? अभी पिछले दिनों ही देश के कोने-कोने से आकर, विश्व के सबसे बड़े मजदूर संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक ढंग से प्रदर्शन कर अपनी मांगे रखी. आपने किसी चैनल में उनकी मांगों पर आधारित कोई भी कार्यक्रम शायद ही देखा होगा. तो अगर एक थप्पड़ को ही हर तरह के धरना प्रदर्शनों पर भारी बना दिया जाय तो आखिर क्यूं कर लोग ऐसा शोर्ट कट अपनाना नहीं चाहेंगे. इसके अलावा बार-बार प्रचार पाने के हथकंडा के तौर पर भी ऐसे घटना को निरूपित किया जाता है. तो मीडिया से सवाल यह है कि ऐसे प्रचार आखिर देते क्यूं हो? मत दिखाओ ऐसे किसी युवक का चेहरा, मत लीजिए उसका बार-बार हज़ार बार नाम. अगर आप घटना का कवरेज करते हुए, हमलावर को प्रसिद्धि नहीं देंकर केवल घटना को दिखाएँगे तो ज़ाहिर है अगली बार से कोई सस्ते प्रसिद्धि को भूखा कोई व्यक्ति तो ऐसे हरकतों को अंजाम नहीं ही देगा.
खैर. ‘रस्ते को भी दोष दे, आँखे भी कर लाल, जूते में जो कील है पहले उसे निकाल.’ आप निश्चय ही ऐसे घटनाओं की जम कर निंदा करें. क़ानून भी अपने अनुसार काम करे. लेकिन ऐसे घटनाओं के बाद लोगों की प्रतिक्रया जानने के लिए नेताओं को चाहिए कि वो फेसबुक या ट्विटर पर थोड़ी देर बैठ जाए. उन्हें पता चल जाएगा कि वह कहाँ खड़े हैं. आत्म-निरीक्षण को मजबूर होंगे वे सभी कि जिस राजनीति को आज़ादी के समय और उसके बाद भी दशकों तक सम्मान की नज़र से देखा जाता था, काँटों का ताज रहने पर भी आजादी से पूर्व जहां देश के सबसे कुलीन, सबसे पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आना चाहते थे वहीं मात्र कुछ दशक में ही क्या हो गया कि कोई भी भलामानुष राजनीति की गली का रुख करने से पहले हज़ार बार सोचेगा.
टीवी की बहस में एक एंकर ने हालांकि जनता को भी ठीक ही सन्देश दिया है. उसने कहा कि –जैसा उसका फेसबुक और ट्विटर एकाउंट बटा रहा है- यह सही है कि उसके द्वारा की गयी चर्चा से देश की नब्बे प्रतिशत जनता सहमत नहीं है, फिर भी अपनी भावना समय आने पर ‘ईवीएम’ से ज़ाहिर करें न कि थप्पड़ को प्रोत्साहित कर.’ तो नेताओं से भी यही कहा जा सकता है ‘इक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है.’ किसी एक के हाथ छोड़ देने से आपके और जनता के बीच रिश्ते टूट नहीं जायेंगे लेकिन उसे मजबूत बनाने की जिम्मेदारी आप की है. शर्त यह कि आपका हाथ जनता की जेब साफ़ करना बंद करे, उसके गर्दन को नहीं नापे. अगर आम आदमी का हाथ ईएवीएम के बदले आपके गाल तक पहुच गए हैं तो इसीलिए कि आप उसके जान और माल की हिफाज़त में न केवल असफल रहे हैं अपितु आपकी भूमिका ‘बाड के रूप में खेत खाने’ की हो गयी है. खैर…बीती ताहि बिसारि कि आगे की सुधि लेहि.
लेखक पंकज झा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं. इन दिनों रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीप कमल के रूप में कार्यरत हैं.





