: गिरफ्तारी से समाधि तक…! : आजकल कई लोग पत्रकारिता और उसके स्तर पर गरमा गरम बयानबाज़ी करते नज़र आ रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो अगर आइने के सामने खड़े होकर बोलें तो सच मानो शरमा ही जाए, नैतिकता और बड़बोलेपन का भाषण ही भूल जाएं। ज़ी न्यूज़ के संपादकों सुधीर चौधरी और समीर आहलुवालिया से पहले इसी माह एबीपी न्यूज़ और इंडिया टीवी के कई लोग उगाही के आरोप में पुलिस के हत्थे क्या लगे, बड़े-बड़ों की घिग्गी बंधी पड़ी हुई है।
लगे हैं लगातार एक दूसरे को क्लीनचिट देने में। मानो 'मैं तेरी तारीफ करूं, तू मेरी कर' वाला समझौता…! लेकिन सच बताऊं ये सब बिलकुल ऐसा ही है जैसे किसी अपने को शमशानघाट छोड़ने गये लोगों की हालत…! यानि सब कुछ याद आता चला जाता है। दिल्ली आने से पहले साइकिल तक को तरसने वाले आज अपनी लग्ज़री गाड़ियों और आलीशान बंगलों में भी ना जाने क्यों बेचैन हैं….?
आज़ाद खालिद
टीवी जर्नलिस्ट





