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अजीत अंजुम उर्फ दो नावों में एक साथ सवारी करने वाला राय बहादुर!

इन दिनों अजीत अंजुम का फेसबुक पर दिया गया एक वक्तव्य काफी चर्चा में है. उन्होंने टीवी पत्रकारिता के राम के नाम का खुलासा कर दिया है और ये राम कई हैं. अजीत अंजुम ताल ठोंक कर कह रहे हैं कि ये जो नाम हैं, इन्हें कोई खरीद बेच नहीं सकता. पर अजीत अंजुम की बचकानी बातों को पढ़कर कई लोग हंस रहे हैं और कह रहे हैं कि अजीत अंजुम को कैसे समझाया जाए कि सीधे सीधे पैसे मांग लेना ही घूसखोरी नहीं, जो सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने किया.

इन दिनों अजीत अंजुम का फेसबुक पर दिया गया एक वक्तव्य काफी चर्चा में है. उन्होंने टीवी पत्रकारिता के राम के नाम का खुलासा कर दिया है और ये राम कई हैं. अजीत अंजुम ताल ठोंक कर कह रहे हैं कि ये जो नाम हैं, इन्हें कोई खरीद बेच नहीं सकता. पर अजीत अंजुम की बचकानी बातों को पढ़कर कई लोग हंस रहे हैं और कह रहे हैं कि अजीत अंजुम को कैसे समझाया जाए कि सीधे सीधे पैसे मांग लेना ही घूसखोरी नहीं, जो सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने किया.

जिनुइन खबर न दिखाकर भूत प्रेत और कहानियां दिखाना बताना भी उसी श्रेणी का अपराध है, बस अपराध के तरीके में फर्क है. नाक सामने से पकड़ लें या फिर सिर के पीछे से हाथ घुमाकर पकड़ें, दोनों बात बराबर ही है.

असल में अजीत अंजुम जानते हैं कि पतन के दलदल में गड़ते जा रहे उन जैसों के कपड़े फाड़ने का जो महादौर शुरू हो चुका है, वह रुकने वाला नहीं, ऐसे में यही आखिरी मौका है चिल्ला चिल्ला कर कहने सुनाने का कि अरे देखो, सुनो भाइयों, हम लोग, और खासकर ये ये लोग बिलकुल भ्रष्ट नहीं है, मां कसम खाकर कहते हैं कि बिलकुले भ्रष्ट नहीं है… चलिए, जनता ठहरकर दो चार मिनट सुन लेती है आपका भभकना… पर आप जल्द ही खुद देखेंगे कि आप लोगों का हश्र क्या होने वाला है…

इतिहास के कूड़ेदान में भी जगह नहीं मिलेगी और मिलेगी भी तो सिर्फ इसलिए कि लोगों को थूकने के लिए और थूकने के बाद नैपकीन्स की जरूरत होती है और आप लोगों का इस्तेमाल इसी रूप में किया जाएगा और इसी रूप में आप लोग याद आते रहेंगे. नीचे फेसबुक पर अजीत अंजुम का कमेंट और उस कमेंट के नीचे मेरी टिप्पणी. यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Ajit Anjum : जो लोग कह रहे हैं कि जिंदल मामले में फलां- फलां भले ही खबर दिखाने के बाद 100 करोड़ की डील करते पकड़े गए हैं, हर संपादक ऐसा ही है, जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सिपाही …जो लोग कह रहे हैं कि मालिकों के कहने पर कौन ऐसा संपादक है जो डील करने नहीं चला जाएगा ….उनके लिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आशुतोष (आईबीएन -7) शाजी जमां और मिलिंद खांडेकर (एबीपी न्यूज) सतीश के सिंह (लाइव इंडिया), विनोद कापड़ी (इंडिया टीवी), कमर वहीद नकवी (आजतक के पूर्व संपादक) और सुप्रिय प्रसाद (आजतक के मौजूदा संपादक) जैसे संपादक हैं, जिनकी कीमत कोई जिंदल नहीं लगा सकता….जिन्हें कोई जिंदल सौदेबाजी के लिए तैयार नहीं कर सकता …चैनल मालिक भी इन्हें किसी ऐसी डील के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

इनमें से कोई ऐसा नहीं है जो नेताओं के आता-जाता (रिश्ते तराशने के लिए) हो …इनमें से कोई ऐसा नहीं है जिनकी नेताओं और मंत्रियों से नेटवर्किंग में दिलचस्पी हो ….इनमें से कोई ऐसा नहीं है, जो नेताओं-मंत्रियों के गुड बुक में बने रहने के लिए खबरों की सौदेबाजी करता हो …दुर्भाग्य से इनमें से कोई ऐसा भी नहीं है, जिन्हें दो-चार मंत्री अपना दोस्त भी मानते हों ….ये न्यूज रूम के लोग हैं, जो सत्ताधीशों के ड्राइंग रुम और अंत:पुर में कभी नहीं देखे जाते …..फिर आप फलां-फलां से सबकी तुलना कैसे कर सकते हैं ….आशुतोष जैसे लोगों को तो कोई हजार करोड़ देकर भी Oblige नहीं कर सकता ….दो पकड़े गए तो ये कहकर छाती मत पीटिए कि सभी संपादक डीलर हैं ….इस लिस्ट में बहुत से नाम छूट भी गए हैं ….मैंने सिर्फ हिन्दी चैनलों के संपादकों की बात की है …

Yashwant Singh : डकैत गिरोहों में कार्यरत खजांची लोग खुद को इमानदार बताएं तो गिरोह में शामिल अन्य सदस्यों को उनकी इमानदारी पर शक नहीं करना चाहिए, बिलकुल भी नहीं क्योंकि ये इमानदार खजांची लूट के माल का बंटवारा पूरी इमानदारी से कर देते हैं, इसलिए इन्हें बेइमान भला कैसे कहा जा सकता है… 

विनोद कापड़ी जो भूत प्रेत प्रलय मौत आदि बेसिर पैर की झूठी खबरें दिखाकर दर्शकों को भ्रमित करता है, न्यूज चैनल्स के चरित्र को बदल देता है… टीआरपी के लिए न्यूज के पिछवाड़े लात मारकर अजीबोगरीब मनोहर कहानियां का प्रसारण करता है… क्यों ऐसा करता है? वह ऐसा इसलिए करता है ताकि उसके चैनल की टीआरपी बढ़े और बढ़ी हुई टीआरपी से उसके मालिक खूब पैसा कमाएं.. इस तरह असली न्यूज न दिखाकर, फर्जी भ्रामक और अंधविश्वास फैलाने वाली खबर दिखाना भी भ्रष्टाचार है करप्शन है घूसखोरी है रिश्वतखोरी है…

सीएनएन आईबीएन वालों ने 'नोट वोट' मामले में स्टिंग की सीडी नहीं दिखाई और अगले साल कंपनी के टर्नओवर में सैकड़ों करोड़ का मुनाफा अचानक बढ़ गया… क्यों? समझ लीजिए, इशारा काफी है… राजदीप सरदेसाई से लेकर आशुतोष महाराज तक सब चुप हो गए. इनसे पूछिए कि सीडी कहां है, क्यों नहीं दिखाई, और सीडी न दिखाने पर इनके चैनलों पर अचानक से सरकारी विज्ञापनों, पीएसयूज के विज्ञापनों की बाढ़ कैसे आ गई, कंपनी के टर्नओवर में भयंकर वृद्धि कहां से हो गई…

तो, ये जो अजीत अंजुम महाराज हैं, जिन्हें संपादकों का नेता बनने का बहुत शौक है, इनसे पूछिए कि आखिर क्यों आप राजीव शुक्ला जैसे महादलाल के यहां संपादक बने हुए हैं, कोई और चैनल नहीं मिला… और, क्यों नहीं वह एक पत्रकार राजीव शुक्ला के एक केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला बनने तक की पचास कहानियां अपने चैनल पर दिखा देते हैं…

जरूरी नहीं कि मालिक आप से धंधा कराए, आपको वह माइक थमाकर भीड़ जुटाने का काम करने को कह रहा है और धंधा वह खुद या किसी और से करा लेगा.. पर आप ये तो देखिए कि आप भीड़ किस नीचता पर उतर कर जुटा रहे हैं… क्या क्या बोल कर क्या क्या कह कर भीड़ जुटा रहे हैं… और, आप द्वारा जुटाई गई भीड़ को दांव पर लगाकर आपके मार्केटियर और आपके मालिक क्या क्या गुल खिला रहे हैं… आप खुद को लाखों रुपये लेंगे लेकिन अपने स्ट्रिंगर्स को भूखे मरने के लिए छोड़ देंगे, ये करप्शन नहीं है तो क्या है… आप खा खा कर मर जाएं, और आपके लोग बिना खाए मरते रहें… यह विशुद्ध करप्श है सरकार..  

असल में अजीत अंजुम को खुद को महामानव दिखाने और बाकियों संपादकों का नेता बनने की बीमारी हैं.. सो ये बेचारे ऐसा कुछ न लिखेंगे बोलेंगे लिखेंगे तो इनकी दुकान कैसे चलेगी.. कई बार मौन हो जाना आत्मशुद्धि का अच्छा मौका होता है, अपने अंदर झांकने का अच्छा तरीका होता है, पर अजीत अंजुम भला कैसे मौन हो सकते हैं.. वह अच्छा और बुरा… दोनों मामले में लीड लिए रहना चाहते हैं… खूब टीआरपी देने वाले संपादक भी कहलाएं और खूब सरोकारी संपादक के रूप में भी जाने जाएं… इन दोनों छोरों को जबरदस्त तरीके से साधने की अकुलाहट लिए हकलाते रहते हैं अजीत अंजुम जी. देखते रहिए… दो अलग अलग दिशाओं में जा रही नावों पर एक साथ सवारी करने वाले राय बहादुर का अंजाम क्या होता है… गुड लक अजीत जी.

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