: पत्रकारिता की नयी परिभाषा गढ रहे बिहार के ब्रांडेड पत्रकार : बिहार में मीडिया का दोगलापन अब आम जनता के बीच जगजाहिर हो चुका है। आम आदमी खुलेआम यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि बिहार में मीडिया बिकता है। बस खरीददार चाहिए। व्यक्तिगत तौर पर आम जनता के मुख से निकले ये शब्द कम से कम मेरे लिए पीड़ादायक जरुर होता है। लेकिन आर्थिक नव उदारवाद के दौर में अब यह सब रोजाना की जिंदगी में शुमार हो चुका है। हालत यह हो गयी है कि जब तक कोई मीडिया को गाली न दे, लगता ही नहीं कि मैं बिहार में हूं।
कल एक संवाददाता सम्मेलन हुआ। आयोजन अनेक जन संगठनों के लोग थे। जो लोग थे, वे राज्य सरकार पर मनरेगा मामले में झूठ बोलने का आरोप लगा रहे थे। वे बता रहे थे कि किस प्रकार राज्य सरकार 6000 करोड़ रुपये से अधिक राशि के गबन के मामले को दबाने और अपनी नाक बचाने की कोशिश कर रही है, जो सीईएफ़एस की रिपोर्ट के बाद शायद कट सी गयी है। संवाददाता सम्मेलन चल रहा था।
सबकुछ सामान्य सा था। जो असामान्य था, वह कुछ पत्रकारों का असामान्य रवैया था। एक दैनिक हिंदी समाचार पत्र के संवाददाता तो आयोजकों से लगभग लड़ पड़े कि वे आरोप कैसे लगा रहे हैं। पत्रकार महोदय बिहार सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाहियों के बारे में ऐसे जानकारी दे रहे थे, जैसे वे सरकारी प्रवक्ता हों। एक टेलीविजन चैनल के पत्रकार तो उनसे भी बीस निकले। वे मजदूरों और जनसंगठनों को ही पूरे मामले में मुख्य अभियुक्त बनाने को लेकर आमदा थे। इनके धैर्य की सीमा समाप्त हो चुकी थी। वे समानांतर तरीके से प्रेस कांफ़्रेंस करने लगे।
बहरहाल, पत्रकारों का यह रवैया उस समय नजर नहीं आता जब मुख्यमंत्री या फ़िर कोई और सत्ताधारी दल के नेता प्रेस कांफ़्रेंस का आयोजन करते हैं। तब यही पत्रकार अपनी जिह्वा पर लगाम रख सबसे अनुशासित पत्रकार होने का प्रमाण देते हैं। यह कैसी पत्रकारिता है। अगर आम जनता ऐसे पत्रकारों को दलाल कहती है तो इसमें गलत क्या है?
लेखक नवल किशोर बिहार के युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे प्रिंट और वेब माध्यम पर समान अधिकार रखते हैं. अपना बिहार डाट ओआरजी के संपादक हैं.





