अगर समाजवादी पार्टी की चली तो एक और नामी-गिरामी गुंडा संसद के दरवाजे पर पहुंचने को तैयार है। उन्नाव से अरूण शंकर शुक्ल उर्फ अन्ना को लोकसभा का प्रत्याशी बनाकर समाजवादी पार्टी ने सिद्घ कर दिया कि बातें भले ही कितनी ही कर ली जाये मगर सपा अभी भी गुंडों को अपने दामन से दूर करने को तैयार नहीं है।
यह उस जनादेश का भी अपमान है जिसने अखिलेश यादव को इस आधार पर वोट दिया था कि वह राजनीति में अपराधियों को बढ़ावा नहीं देंगे। मुलायम सिंह हो या मायावती, पता नही क्यों इन लोगों को यह बात समझ में नहीं आती कि आम जनमानस अब इन गुंडों को राजनीति में नहीं देखना चाहता।
जब समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव को आगे करके विधानसभा चुनाव का प्रचार शुरू किया और अखिलेश यादव ने साफ शब्दों में कहा कि वह अपराधियों को पार्टी में किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नही करेंगे। डीपी यादव को उन्होंने इसी आधार पर पार्टी में लेने से मना कर दिया क्योंकि उनके ऊपर कुछ आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। अखिलेश के इस कदम से लगा कि यह नौजवान अब समाजवादी पार्टी का नया चेहरा है जो पार्टी को इस आरोप से दूर रखना चाहता है कि सपा गुंडों और माफियाओं की पार्टी है।
दरअसल पिछली मुलायम सिंह की सरकार ने विकास कार्यों में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। मगर यह सारे विकास कार्य खराब होती कानून व्यवस्था के सामने नही टिक सके और पूरे बहुमत के साथ मायावती सत्ता में आ गयी। मगर जब अखिलेश ने कहा कि वह इस बार अपराधियों को कोई मौका नहीं देंगे तो लोगों ने उन पर भरोसा किया और प्रचंड बहुमत से इस नौजवान की सरकार बनवाई क्योंकि एक नौजवान ने प्रदेश को बदलने का वादा किया था। मगर अन्ना का नाम लोकसभा प्रत्याशियों की सूची में देखकर समझ आ गया कि राजनीति में वादों का कोई अर्थ नहीं होता।
याद कीजिए प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आशियाना क्षेत्र में एक लड़की को कुछ गुंडों ने अपनी कार में खींच लिया था। इस लड़की के साथ न सिर्फ बलात्कार किया गया बल्कि उसका पूरा शरीर सिगरेट से दागा गया। यह कृत्य करने वाले इसी गुंडे अरूण शंकर शुक्ल उर्फ अन्ना के भतीजे थे। अपने भतीजों को बचाने के लिए इस अपराधी ने दिन-रात एक कर दिये। मगर सामाजिक स्तर पर इस घटना का इतना विरोध हुआ कि मजबूरी में इन गुंडों को गिरफ्तार करना ही पड़ा। सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी के पास जुझारू और योग्य नेताओं की कमी पड़ गयी है जो इस तरह के गुंडों को पार्टी में लेना पड़ रहा है। अरूण शंकर शुक्ल शुरू से ही समाजवादी रहे हों ऐसा भी नही है। पिछला लोकसभा चुनाव उन्होंने मायावती के चरण छूकर बसपा से लड़ा था।
उन्नाव की जनता का नमन करना चाहिए कि उन्होंने इस गुंडे को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब जब सूबे में सपा की सरकार है तो भले ही लोकसभा का चुनाव हार जायें मगर पार्टी के टिकट से चुनाव लड़कर बाकी बचे समय में सपा नेता का बिल्ला लगाकर करोड़ों रुपये के गैर कानूनी काम किये जा सकते है। अरूण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना का लंबा राजनीतिक (आपराधिक) इतिहास रहा है। दर्जनों मारपीट, हत्या, अपहरण, बलबा जैसे गंभीर आरोप उनकी राजनीतिक जन्मपत्री में दर्ज है। मगर इन आरोपों से इन गुंडों पर कोई असर नहीं पड़ता। अन्ना ने करोंडो रूपये की जमीनों पर कब्जा किया है। यह सिलसिला वह आगे भी जारी रखना चाहते हैं। मगर इसके लिए सत्ता का आर्शीवाद चाहिए लिहाजा उन्हें सपा का दामन थामने के अलावा कोई और विकल्प दिखा भी नही। अकेले मुलायम सिंह ही गुंडों का राग अलाप रहे हों ऐसा भी नहीं है।
जिन मायावती ने नारा दिया था कि चढ़ गुंडों की छाती पर, मोहर लगाओं हाथी पर। सत्ता में आते ही यह गुंडे मायावती को बहुत अच्छे लगने लगे। वाराणसी की एक जनसभा में मायावती ने मुख्तार अंसारी की प्रशंसा करते हुए उन्हें गरीबों का मसीहा बताया था। अब मायावती को कौन समझाता कि मुख्तार अंसारी सिर्फ एक गुंडा है इसके अलावा कुछ नहीं। मगर इन गुंडों को सत्ता बहुत लुभाती है और सत्ता को भी यह गुंडे बहुत पसंद आते है क्योंकि सत्ता के लिए मनचाही वसूली यही गुंडे करते हैं। अपराधियों का पूरा इतिहास रहा है कि वह जिस किसी की सरकार होती है उसका गुणगान करने में कभी पीछे नही रहते। लिहाजा राजनीतिक दल यह मानते हैं यह गुंडे चुनाव में भरपूर पैसा खर्च करके और लोगों को धमकाकर चुनाव जीत ही जायेंगे। मगर अब यह मिथक टूट रहे हैं। लोग इन गुंडों से ऊब रहे हैं और साफ सुथरे चेहरे चाहते हैं।
अखिलेश यादव की राजनीति की सही मायनों में अभी शुरुआत है। उनके पिता अगर अभी से इन गुंडों और अपराधियों को उनके चारो तरफ इकट्ठा कर देंगे तो इसका बड़ा नुकसान अखिलेश यादव को उठाना पड़ेगा। बेहतर होगा कि इस तरह के अपराधियों को सत्ता से दूर रखा जाये। पिछले आठ महीनों में यूं भी कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मानते हैं कि कानून व्यवस्था के मोर्चे पर कोई कमी रह ही गयी है। ऐसे में अगर गुंडों की जमात को फिर अखिलेश के चारों तरफ इकट्ठा कर दिया जायेगा तो जनमानस में उनके प्रति नाराजगी ही बढेंगी।
पिछले काफी समय से देश की जनता जागरूक हो रही है वह किसी भी स्थिति में अब गुंडों और माफियाओं को बहुत ज्यादा झेलने की स्थिति में नहीं हैं। अगर राजनेता अभी भी नहीं सुधरे तो प्रदेश की जनता को वह मंत्र आ गया है जिससे सत्ता को सुधारा जा सकता है। आम आदमी की सबसे पहली जरूरत बेहतर कानून व्यवस्था की होती है किसी भी कीमत पर वह अपराधियों को बढ़ावा देने को राजी नही हो सकता। इसलिए बेहतर है कि नेताजी मौके की नजाकत समझें और
अन्ना जैसे गुंडों को बाहर का रास्ता दिखायें वरना इसके गंभीर नतीजे सपा को भुगतने पडेंगे।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वीकएंड टाइम्स अखबार के संपादक हैं. संजय के लिखे अन्य बेबाक विश्लेषणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर संजय





