Subhash Chandra Kushwaha : प्रसिद्ध ग्रामीण पत्रकार पी.साईं नाथ का एक आलेख 3 दिसम्बर के ‘द हिन्दू’ में छपा है जिसे उन्होंने न्यूयार्क शहर से 60 मील दूर बसे एक किसान क्रीस पावेलस्की की कथा-व्यथा के सहारे वालमार्ट के किसान विरोधी चरित्र को उजागर करने का प्रयास किया है। पावेलस्की आज तबाही के कगार पर हैं और उनके खेत के बाहर सड़ रहे प्याज का ढेर इसलिए लगा है कि वालमार्ट और उस जैसी दूसरी रिटेल कंपनियों ने 2 से 2.25 ईंच आकार से छोटे प्याज, खरीदने से मना कर दिया है।
रिटेल कंपनियों के एकाधिकार के कारण पावेलस्की कहीं और माल बेचने की स्थिति में नहीं हैं, लिहाजा उन्होंने प्याज को सड़ने के लिए छोड़ दिया है। बड़े आकार के प्याज बेचने का अर्थशास्त्र अनोखा है। इतने बड़े आकार के प्याज का आधा हिस्सा ही औसतन अमेरिकी परिवारों में प्रयुक्त होता है और आधा फेंकना पड़ता है। इस प्रकार उपभोक्ता को ज्यादा से ज्यादा प्याज खरीदना मजबूरी है पर इससे वालमार्ट की बिक्री ज्यादा होती है।
एकाधिकार के चलते वालमार्ट ने पावेलस्की से इस वर्ष मात्र 17 सेंट प्रति पौंड की दर से प्याज खरीदा है और उसे 1.49 से 1.89 प्रति पौंड की दर से बेच रहा है । पावेलस्की की खेती लागत, खाद, कीटनाशक, बीज और मजदूरी सहित 1,60,000 डालर आई है जबकि बिक्री से मात्र 2,00,000 डालर प्राप्त हुए हैं। शेष बचे 40,000 डालर उन्हें कर में देना पड़ा है। जाहिर है उनके हाथ में कुछ नहीं आया है। जी हां, उसी वालमार्ट को हमारे अर्थशास्त्री किसानों की खुशहाली के लिए ला रहे हैं ।
Manaash Grewal फिर भी हम कहाँ चूक रहे हैं… शायद शहरी मध्यम वर्ग को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं है और गाँवों के किसानों तक हमारी जागरूकता भरी बातें पहुंचती ही नहीं… परिणाम यह होता है कि ऐसे फैसले लेने वाली सरकारें फिर से सत्ता में आ जाती है और हम भौंकते रहते हैं… अब लगता है कि सीधी अंगुली से घी नहीं निकलेगा…
Jai Narain Budhwar thanks for this eye opener post…
Digamber Ashu हमारे यहाँ के किसानों की हालत तो इससे भी खस्ता है. और "उसी वालमार्ट को हमारे अर्थशास्त्री किसानों की खुशहाली के लिए ला रहे हैं …" रही-सही कसर भी पूरी कर देगा…
सुभाष चंद्र कुशवाहा के फेसबुक वॉल से साभार.






