इस लेख की शुरुआत में मैं मेरे सभी पाठकों, खासतौर से महिलाओं से अग्रिम क्षमा चाहता हूं, क्योंकि हो सकता है कि यहां लिखी गई कुछ बातें आपको उचित न लगें, लेकिन यह मेरे जीवन का एक कड़वा सत्य है। यह एक लड़का और पांच लड़कियों की कहानी है, लेकिन किसी सूरत में यह कोई रंगीली, रसीली या भड़कीली कहानी नहीं है। मैं कौन हूं? – इस सवाल का जवाब कुछ वजहों से नहीं दे रहा हूं। इसका जवाब आपको आखिर में समझ में आ जाएगा।
आपकी जानकारी के लिए इतना काफी है कि मैंने पत्रकारिता में कुछ साल बिताए हैं। मैं मेहनत, ईमानदारी और वफादारी के मोर्चे पर हमेशा अव्वल रहा, परंतु गुटबंदी, धोखाधड़ी और सियासी अखाड़ेबाजी में मात खा गया, क्योंकि इसके संस्कार मेरे खून में नहीं थे। आज भी इन ‘सदगुणों’ को अपनाने में मैं नाकाम हूं। भारत के अलावा विदेशी अखबारों में मेरे कई लेख छप चुके हैं और मैंने कई बड़ी हस्तियों की लिखी किताबों का संपादन किया है।
आज उम्र के एक पड़ाव पर पहुंचकर मुझे लगता है कि पत्रकारिता में कर्मठता, वफादारी और ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं। हम अत्याचार से पीड़ित, शोषित और दलितों पर हुए जुल्म के खिलाफ कलम चलाते हैं, जबकि हम खुद कैसी स्थिति में रहते हैं, यह किसी को बता नहीं सकते। संपादकों और कुछ अत्याचारी वरिष्ठ लोगों के कारण हर पल काल-कोठरी का अनुभव भोगते हैं, फिर भी अपनी पीड़ा किसी को बता नहीं सकते। हो सकता है आप इस बात से सहमत न हों और आप सच भी हों, परंतु मेरा अनुभव यही है जो मैं कहने जा रहा हूं।
कई साल पहले एक छोटे-से गांव से मैं राजधानी आया। पहली बार ढेर सारी गाड़ियां और लोग देखे। अपने गांव में तो रात को लालटेन जलाते थे और यहां रात को भी रात नहीं होती। उन्हीं दिनों एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय विभाग में कर्मचारी की जरूरत थी तो मैंने आवेदन कर दिया। मुझे पता था – अपना काम यहां नहीं होने वाला, पर न जाने कैसे मुझे चुन लिया गया। मुझे मैग्जीन डिपार्टमेंट में लगाया गया। ऑफिस में पहली बार कम्प्यूटर देखा और एसी में बैठने का मौका मिला। मैं सुबह जल्दी ऑफिस जाता और देर शाम तक काम करता। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि मैंने सिर्फ दो दिन में हिंदी की टाइपिंग सीखी। मैं मेहनत को ही तरक्की का मूलमंत्र मानता और यही मेरी पूंजी थी।
मुझे मेरे वरिष्ठजन शाबासियां देते। हमेशा यही सनक सवार रहती कि कब सुबह हो और मैं मेरे उस परिवार में जाऊं। काम को लेकर मेरे सर पर जुनून सवार था। एक आर्टिकल में कॉमा की भी गलती न रह जाए, यह हमेशा मेरी कोशिश रहती। दो महीनों में मैं इतना कुशल हो गया था कि मैग्जीन की डमी और फाइनल प्रिंट मुझे ही पढ़ने के लिए दिए जाने लगे। उस ऑफिस में पांच लड़कियां थीं और मैं एक लड़का। वे सब मुझसे बड़ी थीं। मैं शपथपूर्वक यह बात कहता हूं कि मैंने उनमें हमेशा मेरी बड़ी बहन की ही छवि देखी।
खैर, वक्त गुजरता गया और मैं रोज अपने हासिल किए अनुभवों की बुनियाद पर तरक्की के नए सपने लेता। इस दौरान एक बात पर मैंने गौर किया कि मेरी सहकर्मी आए दिन शॉपिंग, पार्लर और मौज-मस्ती में व्यस्त रहतीं लेकिन मुझ पर काम का दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा था। मुझे आए दिन उनके हिस्से के काम करने पड़ते। बाद में मुझे पता चला कि गांव का होने की वजह से उन्होंने मेरा एक नाम भी रखा था। उस स्थिति में मैंने सिर्फ एक चीज पर ध्यान दिया – मेरा काम, क्योंकि इससे मेरे कौशल में वृद्धि हो रही थी। अब मैग्जीन के प्रूफ और अनुवाद मुझे घर के लिए दिए जाने लगे। एक बार संयोग ऐसा बना कि तीन दिन लगातार मुझे सुबह 10 बजे से रात तीन बजे तक काम करना पड़ा। मुझ पर धीरे-धीरे काम का दबाव बढ़ाया जा रहा था। मेरे सहकर्मी चैटिंग करते या किसी फैशन मैग्जीन के पन्ने उलटते।
चौथे दिन मैं ऑफिस गया। मैग्जीन छूटने की तारीख नजदीक थी। काम जोरों पर था। मेरी सहकर्मी लंच रूम में अंत्याक्षरी कर रही थीं और मैं एक अमेरिकन लेखक के आर्टिकल का अनुवाद कर रहा था। उस दिन मैंने खाना भी नहीं खाया। शाम को मैडम ने मुझे बुलाया और कुछ प्रिंट देते हुए कहा कि इन्हें रात को पढ़कर लाना और कल सुबह करेक्शन लगवाकर फाइनल डमी मुझे देना। मैंने कहा कि मैं अगले दिन जल्दी आकर ये प्रिंट पढ़ दूंगा, क्योंकि आज बहुत थक चुका हूं, तो वे आग-बबूला हो गईं और तुरंत मेरी औकात बताने लगीं।
खैर, मुझे डमी नहीं दी गई, लेकिन दूसरे दिन सब लड़कियों का गुट मुझसे इस तरह व्यवहार करने लगा जैसे मैं चिड़ियाघर से आया हूं। उनमें से तीन जो सबसे वरिष्ठ थीं, वे मुझे अजीब तरीके से घूरती रहतीं। मैं यहां पुनः महिलाओं से क्षमा चाहूंगा, क्योंकि मेरा इरादा आपका अपमान करना नहीं है। मैं नारी जाति का तहेदिल से सम्मान करता हूं क्योंकि मैंने मेरे परिवार से यही सीखा है। प्रायः हम पुरुषों पर ये आरोप लगते हैं कि ये दुष्ट, अत्याचारी, क्रूर और शोषक होते हैं, इन आरोपों में कुछ सच्चाई भी है, क्योंकि कई पुरुषों ने इस कथन को सच साबित किया है। मगर यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। अत्याचार, क्रूरता और षड्यंत्रों पर पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं है। यह बात मैं तीर-तुक्के से नहीं अनुभव से कह रहा हूं।
वे तीनों लड़कियां मुझे कई बार अपमानित करतीं। उनका सबसे बड़ा हथियार था – घूरना। मैंने एक मित्र से इसकी चर्चा की तो वह बोला – अरे यार! तेरे तो मजे हो गए। ऐसा कर आज तो आंख मार दे। जो होगा देख लेंगे। अगर पट जाए तो वारे-न्यारे और बिगड़ जाए तो कह देना मैडम आंख में कुछ गिर गया था।
लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। सच पूछो तो ऐसा करना मुझे मेरी बड़ी दीदी के सामने ऐसी गंदी हरकत करने जैसा लगा। मैं इसके बारे में किसी को कह भी नहीं सकता था। कोई मेरा विश्वास नहीं करता। सब लोग यही कहते – भाई, तू इत्ता सोणा तो ना है कि छोरियां तुझे ही देखें!!!
वह मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक दौर था। कुछ औरतें ताना मारने, व्यंग्य करने, अपमान करने, गुट बनाने और षड्यंत्र रचने में कितनी कुशल होती हैं, यह मैंने तब जाना। माहौल इतना गंदा हो गया था कि वहां हर मिनट मेरे लिए नरक जैसा अनुभव था। आखिर एक दिन ऐसी स्थिति बनी कि मुझे उस जगह को अलविदा कहना पड़ा। उस दिन मैं बहुत खुश था।
इस घटना को कई वर्ष बीत गए। एक सवाल जो मेरे दिमाग में आता है कि हमारा समाज कपट, पाखंड और फरेब का तमगा पुरुषों को ही क्यों देता है? जबकि इसका एक और पहलू भी है। शायद इसका कारण ये है कि हमने सदियों से औरत को जुल्म और जोर से दबाकर रखा, तब उनकी छवि एक अबला, असहाय नारी की बन गई। अगर पुरुष किसी औरत को पीटता है तो हम मान लेते हैं कि यह पापी उस अबला को सता रहा है लेकिन अगर कोई महिला किसी पुरुष को पीटती है तो हम यही मानते हैं कि जरूर इसने कोई छेड़-छाड़ या गंदी हरकत करने की कोशिश की होगी, तभी बेचारी इसे पीट रही है। आखिर यह दोहरी मानसिकता क्यों?
मैं मानता हूं कि आज जब महिलाएं पुरुषों के साथ बराबरी के मैदान में हैं तो कुछ मामलों में उन्होंने पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया है। मेरे विचार से यह बात उन महिलाओं पर शत-प्रतिशत लागू होती हैं जिन्होंने मेरा शोषण किया।
उस घटना के बाद मैंने मीडिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। आज मैं हर महिला में उन लड़कियों की छवि देखता हूं। मैं जानता हूं कि मैं गलत हूं किंतु मेरा मन मुझे मजबूर करता है कि मैं किसी भी लड़की पर विश्वास नहीं करूं। आज मैं एक छोटी-सी फर्म का मालिक हूं। पिछले दिनों मेरे पास मार्केटिंग के लिए कुछ लोगों के आवेदन आए। उनमें कई लड़कियां थीं जो बहुत प्रतिभावान थीं, फिर भी मैंने उनके एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दिए और मेरा विचार है कि भविष्य में भी किसी लड़की को नौकरी न दूं। मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं, इसका बिल्कुल सही जवाब मैं नहीं जानता।
हां, एक और बात! जिस पत्रिका में मैंने काम किया था, मेरे जाने के बाद उसके हालात बेहद खराब हो गए। वहां कई दिनों तक अंदरूनी राजनीति चली और वह पत्रिका बंद हो गई। अब उसका कहीं कोई नामो-निशान नहीं है।
एक गुमनाम
उपरोक्त बातें जिस शख्स ने भड़ास के पास प्रकाशन हेतु प्रेषित किया, उसने एक लेटर भी भेजा है, जो इस प्रकार है—
Adarniy Yashwant Bhai,
Saprem Namaskar!
Apki website to mai kai dino se roj hi padh raha hu, bahut achhi lagi. Mai is attached file me mere jivan ki sachi ghatana likhkar bhej raha hu. Agar thik lage to kripaya prakashit kijiye.
Mai isase jyada mera parichay nahi de sakata, kyoki lekh me jo bate likhi hai, Wo mere vyaktigat jivan aur samman se judi hai. Maine lekh me kisi vyakti ka nam, sanket aur sanstha ka nam nahi likha hai.
Prakshit karne ke bad please uska link mujhe jarur bhej dejiye.
Abhar sahit
Apaka
Ek Gumnam pathak





