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इंटरव्यू

अखबार बांटने से करियर शुरू किया और आज वरिष्ठ प्रसार प्रबंधक हैं राजेंद्र गुप्ता

अखबारों के साथ लंबी पारी खेल रहे राजेंद्र गुप्ता यूं ही टकरा गए. उनसे बातचीत हुई. पता चला कि वे एक जमाने में अखबार बांटते थे. और, अब वरिष्ठ प्रसार प्रबंधक के पद पर हैं. उनके करियर की यात्रा और उनकी सोच से प्रभावित हुआ. सोचा, उनके बारे में सबको बताया जाना चाहिए. तो उनसे कुछ सवाल पूछे. उन्होंने जो जवाब दिया. वो यहां पेश है. 

अखबारों के साथ लंबी पारी खेल रहे राजेंद्र गुप्ता यूं ही टकरा गए. उनसे बातचीत हुई. पता चला कि वे एक जमाने में अखबार बांटते थे. और, अब वरिष्ठ प्रसार प्रबंधक के पद पर हैं. उनके करियर की यात्रा और उनकी सोच से प्रभावित हुआ. सोचा, उनके बारे में सबको बताया जाना चाहिए. तो उनसे कुछ सवाल पूछे. उन्होंने जो जवाब दिया. वो यहां पेश है. 

सवाल-

-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.

-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.

-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…

-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…

-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..

जवाब-

राजेंद्र गुप्तामैं मूलतः उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिला अंतर्गत कोड़ा जहानाबाद का निवासी हूँ जहाँ मैंने 12 वीं तक शिक्षा प्राप्त की. उसके बाद 1981 में कानपुर के क्राइस्ट चर्च कालेज से ग्रेजुएशन किया. 1 नवम्बर 1981 को दैनिक विश्वामित्र कानपुर में बतौर प्रूफ रीडर अखबारी जीवन की शुरुआत की और वहां पर जनवरी 1986 तक रहा. इस दौरान वहां विज्ञापन का काम भी देखता रहा. अपरिहार्य कारणों से जनवरी 1986 में मुझे नौकरी छोड़ कर कोड़ा जहानाबाद वापस लौटना पड़ा.

जीवकोपार्जन हेतु कानपुर से प्रकाशित दैनिक आज अख़बार की एजेंसी लेकर  8 जून 1986 से  कोड़ा जहानाबाद व आसपास के इलाकों में अखबार बेचने का कार्य शुरू किया. कुछ महीने बाद दैनिक जागरण की भी एजेंसी ले ली. तब तक मेरा यह हाकर का धंधा अच्छी तरह चल निकला. इसी दौरान दैनिक जागरण के तत्कालीन समाचार संपादक आदरणीय प्रताप नारायण श्रीवास्तव के आदेश पर मैं अपने इलाके की ख़बरें भी भेजने लगा. मेरे द्वारा भेजी गयी ख़बरों की विश्वसनीयता एवं लेखन शैली को देखते हुए मुझे अवैतनिक संवाददाता बनाया गया. यह कार्य जनवरी 1991 तक चला. इस सबके चलते मैं रोजाना 74 किलोमीटर साईकिल चला कर हाकर का काम भी करता रहा.

किन्ही कारणों से मुझे गाँव छोड़कर एक बार फिर से कानपुर में बसना पड़ा. फरवरी 1991 में कानपुर में ही मेरी शादी हुई. उसी दौरान कानपुर में 1 मार्च 1992 से अमर उजाला का प्रकाशन शुरू हुआ. विज्ञान स्नातक की डिग्री लेने के बाद लगभग पांच वर्षों तक दैनिक विश्वामित्र की नौकरी करने व लगभग पांच वर्षों तक ही हाकर का कार्य करने से मुझे प्रसार विभाग के कामों की काफी जानकारी हो चुकी थी. इसी अनुभव के चलते अमर उजाला के तत्कालीन महाप्रबंधक श्री कमलेश दीक्षित ने मुझे 12 मई 1992 को अमर उजाला में प्रसार सहायक के रूप में भर्ती किया. अप्रैल 2005 तक मैं अमर उजाला में रहा. इस दौरान मुझे बनारस व मेरठ में भी रखा गया.

1993 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह द्वारा अमर उजाला के खिलाफ हल्ला बोल अभियान में  कई बार सरकारी प्रताड़ना का शिकार भी हुआ. 3 जुलाई 1994 को झाँसी में अमर उजाला के सम्मान को बचाने के लिए एक प्रतिद्वंदी अख़बार के गुंडों से हुए झगड़े में फायरिंग भी करनी पड़ी जिसमें उस प्रतिद्वंदी अख़बार के मालिक सहित 4 लोग घायल हुए थे. लगभग पांच वर्षों तक चले इस मुकदमे में गवाहों के अभाव में अदालत द्वारा बाइज्जत बरी भी हो गया था.

इसके बाद जुलाई 2005 में  दैनिक जागरण (रीवा), नई दुनिया (ग्वालियर), डीएलए (लखनऊ), जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ) होते हुए अब जम्मू के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक STATE TIMES में बतौर सीनियर सर्कुलेशन मैनेजर कार्यरत हूँ .मेरे परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे हैं.बड़ा बेटा महर्षि (21) सी.बी.आई. में कार्यरत है जबकि छोटा बेटा देवर्षि (16) अभी 12वीं में कानपुर में ही पढ़ रहा है.

पता नहीं क्यों मुझे बचपन से ही बैंक की नौकरी बहुत आकर्षित करती थी इसलिए मैंने 1978 से 1986 के बीच दस -बारह बार बैंक क्लर्क व प्रोबेशन आफिसर की परीक्षा दी, कुल छह बार लिखित परीक्षा पास भी की परन्तु मेरी यह ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो पाई. आखिर में निराश होकर मैं लक्ष्य विहीन भविष्य की ओर बढ़ने लगा. जीवकोपार्जन हेतु हाकर बनकर शुरू किया गया अख़बार बेचने का काम मुझे आज इस मुकाम तक लायेगा , यह मैंने कभी नहीं सोचा था.

अब मैंने अपने कैरियर का लक्ष्य भगवान के भरोसे छोड़ रखा है परन्तु  मैंने होश सँभालते ही अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया था कि बगैर किसी  को नुकसान पहुंचाए, ईमानदारी व नेकनीयती के साथ और यथासंभव दूसरों क़ी मदद करते हुए जिंदगी गुजारुंगा.और अभी तक उस पर अमल करता आ रहा हूँ .इसी लिए अब तक  इस धरती पर मेरे पास अपनी एक इंच भी जमीन नहीं है और न ही मेरे तीनों बैंक खातों में कुल मिलाकर पचास हजार रूपया है .

आज के समय में  अच्छाइयों व बुराइयों का पैमाना हर आदमी क़ी नज़रों में अलग-अलग है. इसलिए इन्हें गिनाना थोड़ा कठिन है. अपने जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बस जिंदगी गुजारे जा रहा हूँ. चूँकि कफ़न में कोई जेब नहीं होती इसलिए संपत्ति संचय क़ी कोई ख्वाहिस नहीं, किसी भी व्यसन की न ही लत और न ही परहेज है. कभी-कभी शराब पीने से लेकर जुआ खेलने तक के शौक भी पाल रखे हैं. रोजाना पूजा-पाठ भी करता हूँ और अनजाने में होने वाली गलतियों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना भी कर लेता हूँ.

यह सच है कि आज पत्रकारिता के स्तर में काफी गिरावट आ चुकी है. पहले पत्रकारिता को मिशन का दर्जा मिला हुआ था परन्तु कुछ लोगों ने इसको वेश्यालय से भी बदतर बना दिया है जिनमें पत्रकार कम उनको रोजगार देने वाले मालिक ज्यादा हैं. अनेक अख़बार मालिक अपने यहाँ काम करने वाले पत्रकारों के माध्यम से ही अच्छे बुरे कामों को अंजाम देकर करोणों क़ी संपत्ति बना रहे हैं और इन "बेचारे" पत्रकारों को भी छीछड़े खाने  को मिल जाते हैं. कलम के इन  "बेचारे" सिपाहियों क़ी संख्या में अब लगातार इजाफा होता जा रहा है. फलस्वरूप राजनीतिकों क़ी तरह पत्रकारों क़ी छवि भी समाज में गिरती जा रही है. 

आज जब देश में लोकतंत्र के चारों स्तंभों में से विधायिका और कार्यपालिका के लोगों ने खुले-आम लूट मचा रखी है, ऐसे समय में आम जनता शेष दोनों खम्भों क़ी ओर टकटकी लगाकर निहार रही है कि शायद लोकतंत्र  क़ी रक्षा के लिए ये कुछ करें. तब हमारे ही कुछ लोग विधायिका और कार्यपालिका के लुटेरों के गिरोह में शामिल हो कर आम जनता के अरमानों पर पानी फेर रहे  हैं. अब आम लोगों क़ी धारणा यह बनती जा रही है कि न्यायपालिका (केवल उच्च स्तर की) ही लोकतंत्र  क़ी रक्षा कर सकती है. पत्रकारिता के स्तर को सुधारने के लिए किसी कानून की नहीं, स्वयं को ही सुधारने की जरुरत है. जो फ़िलहाल काफी मुश्किल है क्योंकि आज के समय में नैतिकता का कोई मूल्य नहीं रह गया है.

अपने कैरियर व जिन्दगी से मैं पूर्णतया संतुष्ट हूँ. बहुत ज्यादा पाने की इच्छा ही मानसिक तनाव का कारण है जो आदमी को भ्रष्टता की ओर ले जाता है. क्योंकि इच्छाएं तो लगातार बढ़तीं ही रहती हैं. कर्म पर विश्वास करो, फल अवश्य मिलेगा.

मीडिया के लोगों से मेरा कहना केवल यह है कि अभी भी सुधरने का समय है अन्यथा समाज तुमको भी उसी नजर से देखेगा जैसे आजकल राजनीतिज्ञों को देखता है. बुद्धिजीवी होने का तमगा तो दूर, इतनी अधिक दुर्दशा होगी जिसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं. जिसकी शुरुआत भी हो चुकी है. आज जगह -जगह मीडिया के लोगों के साथ दुर्व्यवहार व मार-पीट की घटनाएँ आम होती जा रही हैं.

राजेंद्र गुप्ता से संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.


आपमें से भी कोई अगर यह मानता है कि उसे अपनी बात, अपना करियर, अपनी सोच, अपना इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहिए तो आपका स्वागत है.  भड़ास ने स्थापित व नामचीन लोगों का इंटरव्यू प्रकाशित करने की जगह देश के कोने-कोने में सक्रिय मीडियाकर्मियों की बातों, अनुभवों, करियर, सोच को प्रकाशित करने को तरजीह दिया है. आपको करना बस इतना है कि आप नीचे दिए गए सवालों के जवाब भेज दें. अगर लगता है कोई बात इन सवालों से कवर नहीं हो पा रहा तो सवाल अपनी तरफ से क्रिएट कर सकते हैं. साथ में एक तस्वीर भी भेजें. जवाब और तस्वीर मेरी निजी मेल आईडी पर भेजें जो यूं है:  [email protected]

सवाल यूं हैं-

-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.

-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.

– मीडिया में काम के दौरान कोई ऐसा अनुभव जिससे आप काफी दुखी हुए हों और कोई ऐसा अनुभव जिससे आपको काफी तसल्ली-खुशी मिली हो?

-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…

-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…

– आपकी अपनी लाइफस्टाइल कैसी है? खान-पान, सुनने-पढ़ने में क्या पसंद है? शौक क्या है?

-आप जीवन में किससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे और क्यों? आपके रोल माडल कौन हैं?

-आपने जीवन या करियर में कुछ ऐसा किया है जिसका आपको प्रायश्चित करने का दिल करता है?

-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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