: महान लेखक बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं : 'आजकल’ (फरवरी 2012) में स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल की एक रचना प्रकाशित हुई है-‘मैं महान लेखक क्यों नहीं बन सका?’ वस्तुतः यह रचना आकाशवाणी के किसी केंद्र के लिए प्रसारणार्थ लिखी गई थी.इस रचना की अंतिम पंक्ति है-‘महान लेखक हमेशा बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं.’ मेरे जानते हिन्दी साहित्य में किसी साहित्यकार को महान बनाने के कार्य की शुरुआत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही हो गई थी.
इस काम को न तो कलकत्ता ने शुरू किया और न पटना ने. इस पाप का भागी बनारस भी नहीं हुआ. इलाहाबाद या लखनऊ ने भी ऐसा कोई कार्य नहीं किया. लेकिन अब हिन्दी साहित्य का केंद्र कलकत्ता, पटना, बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ से उजड़ कर दिल्ली बन गया है. दिल्ली में हिन्दी साहित्यकारों का जमावड़ा है और दिल्ली हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी मंडी भी है. और इस वजह ही यहां साहित्य में किसी को महान बनाने का उद्योग भी चालू है. अब तो यह एक सर्वविदित बात है कि हिन्दी के कुछ चौधरियों के पास ही वह कंट्रोल है, जिससे वे महान लेखकों का अपनी मर्जी के अनुसार उत्पादन करते हैं. यहां जब वे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो उसकी खटिया खड़ी करके ही दम लेते हैं, चाहे सामने वाला साहित्यकार कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो!
2006 में महुआ माजी का पहला उपन्यास राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया-‘मैं बोरिशाइल्ला’. देखते ही देखते लेखिका महुआ माजी हिन्दी जगत में छा गईं. इन्हें लंदन में ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ से 20 जुलाई 2007 को सम्मानित किया गया. रूपा एंड कंपनी, नई दिल्ली ने इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद ‘मी बोरिशाइल्ला’ भी प्रकाशित कर दिया. जाहिर है कि अचानक महुआ माजी को जो लोकप्रियता मिली, वह आकर्षण और आश्चर्य का विषय बनती चली गई. इस वर्ष उनका दूसरा उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ भी प्रकाशित हो गया है. इस उपन्यास का लोकार्पण दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया गया. राजकमल प्रकाशन ने इस उपन्यास की पांडुलिपि को तीसरे ‘फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान’ से सम्मानित किया है. इसके अंतर्गत महुआ माजी को एक लाख रुपए की राशि भी प्रदान की गई. लोकार्पण के अवसर पर नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर उपस्थित थे. इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद महुआ माजी को एक बार और लोकप्रियता के पुष्पक पर सवार होने का अवसर प्राप्त हो गया है. इसके लिए मेरी ओर से उन्हें डबल बधाई.
अब कुछ आत्मगत
डॉ. महुआ माजी बीच-बीच में मेरे घर आया करती थीं. मेरी पत्नी से उनकी खूब पटती थी. महुआ बराबर इस बात की प्रशंसा किया करती थीं कि भाभी जी ने अपने घर में किस्म-किस्म के फूलों के पौधे लगा रखे हैं. हमारे घर के गेट पर जो बोगनवेलिया है, वह उसकी खूब तारीफ करती थीं, क्योंकि उसकी पत्तियां एक साथ सफेद और गुलाबी दो रंगों की होती हैं. वह बराबर कहा करती थीं कि मैं भी इसे अपने घर में लगाऊंगी. ऐसी दो रंगों वाली पत्तियां आसानी से देखने को नहीं मिल पाती हैं.
2004 का वर्ष चल रहा था. एक दिन महुआ माजी का आगमन हुआ. उन्होंने कहा कि मैं एक उपन्यास लिख रही हूं. आपसे अनुरोध है कि इसे आप पढ़ने की कृपा करें और इसकी भाषा भी सुधार दें, क्योंकि मेरी मातृभाषा तो बांग्ला ही है. यों मैं हिन्दी में भी लिखने लगी हूं. अब यहां मैं अपनी डायरी का उपयोग करना चाहता हूं, जो कुछ यूं है-
शुक्रवार, 16 जुलाई 2004
महुआ माजी मिठाई का डिब्बा लेकर आई.मैंने अपनी नाराजगी जताई.वह कहने लगी कि खुशी की बात है, इसीलिए मैं मिठाई लेकर आई हूं. वह अपने उपन्यास की पांडुलिपि का आधा भाग पढ़ने के लिए दे गई है. इस उपन्यास का नाम है-‘मैं बोरिशाइल्ला पोला’ (मैं बोरिशाइल्ला का बेटा). यह बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है.
शनिवार, 17 जुलाई 2004
महुआ माजी के उपन्यास की पांडुलिपि के मैंने सौ पृष्ठ पढ़ लिए. यह लिखा तो अच्छा गया है, पर क्यों तो कभी-कभी यह संदेह होने लगता है… इसमें सौ पृष्ठों में ही तीन स्थानों पर जो चित्रण किया गया है उससे यह लगता है कि लेखिका चर्चित महिला लेखिका बनने के चक्कर में कोई संकोच नहीं करती.
शनिवार, 31 जुलाई 2004
महुआ माजी के उपन्यास की आंशिक पांडुलिपि मैंने पढ़ ली. इस उपन्यास के बारे में अब तक मेरी कोई निश्चित राय नहीं बन सकी है. लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि चूंकि यह उपन्यास एक रूपसी का है, इसलिए लोग इसे फुलाएंगे जरूर. महुआ को अभी ही ऐसा सत्कार मिल चुका है कि वह गलतफहमी में जीने लगी है. कभी-कभी मुझे ऐसी प्रतीति भी होती है कि यह कुछ पाने के लालच में अपना कुछ गंवा भी सकती है.
बुधवार, 11 अगस्त 2004
महुआ माजी को मैंने पठित पांडुलिपि लौटा दी. कुछ पृष्ठ पढ़ने को और मिल गए. बांग्लादेश महुआ ने देखा भी नहीं है. उसने वहां के बारे में अध्ययन तथा व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर यह लिखा है. उसने कई तरह की जिज्ञासाएं प्रकट कीं. मैंने उन जिज्ञासाओं के उत्तर दे दिए. उसने स्वीकार किया कि मैत्रेयी पुष्पा और जया जादवानी के प्रभाव के कारण उसने सेक्स को स्थान दिया.
बुधवार, 6 अक्टूबर 2004
महुआ माजी पेस्ट्री लेकर आई. मैंने नाराजगी प्रकट की. मैंने पहले ही उसे कुछ लाने से रोक दिया था. पेस्ट्री में अंडा होता है. इसी आधार पर मैंने उसे लौटा दिया. पुराने परिच्छेद ले गई और नए परिच्छेद दे गई है.
शनिवार, 13 नवंबर 2004
महुआ माजी शाम को आई. वह लगभग दो सौ पृष्ठ और दे गई है. उसने बताया कि आधार प्रकाशन उसके उपन्यास के लिए अग्रिम के रूप में पचास हजार देने को तैयार है. वह बहुत सारी बातें बोल गई. जो स्थितियां बन रही हैं, वे महुआ का दिमाग चढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं. मैं उसे समझाने की स्थिति में नहीं हूं, क्योंकि वह इतनी प्रबुद्ध नहीं है कि मेरी सीख पर ध्यान दे सके. उसे परिपक्व होने में समय लगेगा. वह यह नहीं समझ पा रही है कि लोग उसके उपन्यास की नहीं अपितु उसके रूप की कीमत लगा रहे हैं. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह किसी दुर्घटना का शिकार न बने.
रविवार, 5 दिसंबर 2004
महुआ की पांडुलिपि का संशोधन-कार्य पूरा हो गया.
महुआ माजी ने मुझसे पूछा कि मेरा उपन्यास आपको कैसा लगा? मैंने कहा-अभी मैं इस उपन्यास के बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं. पर मैं आपसे कुछ बातें अवश्य कहना चाहता हूं-आपका उपन्यास बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम पर आधारित है. लेकिन आपने अब तक बांग्लादेश को देखा भी नहीं है. आपको यह भी पता नहीं है कि पद्मा नदी किस ओर से किस दिशा की ओर बहती है. केवल सुनी-सुनाई बातों के सहारे या किताबें पढ़कर आपने इस उपन्यास को लिखा है. इसलिए आपको इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि इस उपन्यास के बारे में आपसे अनेक असुविधाजनक प्रश्न पूछे जा सकते हैं. यह सच है कि साहित्यकार परकाया प्रवेश कर अपने पात्रों को भी स्वाभाविक रूप प्रदान कर देता है. लेकिन, किसी अजाने और अपरिचित देश के भूगोल को स्वयं देखे और उसके प्रत्यक्ष अध्ययन के बगैर वहां का प्राकृतिक चित्रण वह नहीं कर सकता. आपके लेखन के समक्ष यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न कोई भी खड़ा कर सकता है.
रविवार, 5 दिसंबर 2004 को डॉ. महुआ माजी मेरे घर पर अंतिम बार आईं. इसके बाद उनका आगमन ‘आश्रय’ में आज तक नहीं हो सका है. इस दौरान मैं 2005 में भयंकर रूप से अस्वस्थ हुआ. रीढ़ के रेशन की स्थिति पैदा हो गई. लेकिन मैं आपरेशन से बच गया. डॉ. शामसुंदर राणा ने मुझे अपनी चुंबक चिकित्सा से ठीक कर दिया. 13 सितंबर 2009 को डाल्टनगंज में एक किताब के लोकार्पण में बोलते हुए मुझे ब्रेन स्ट्रोक हो गया. इसके कारण मेरा जीवन और मेरा परिवार पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया. मगर डॉ. महुआ माजी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं रांची में जिंदा हूं कि मर गया.
यहां मैं अपनी डायरी का पुनः उपयोग करना चाहता हूं-
बुधवार, 1 फरवरी 2006
महुआ माजी ने फोन किया. उसने शुभ सूचना दी कि उसका उपन्यास प्रकाशित हो गया है, पर अभी कुछ ही प्रतियां तैयार हो सकी हैं. दिल्ली पुस्तक मेले में उसका उपन्यास प्रदर्शित किया गया. वह अपने साथ केवल एक प्रति लेकर आई थी, जिसे खगेन्द्र ठाकुर ले गए हैं. जब और प्रतियां आएंगी तो वह मुझे एक प्रति दे जाएगी.
उसने यह 'शुभ संदेश' भी दिया कि आभार प्रदर्शन वाला भाग प्रकाशक ने हटा दिया. प्रकाशक ने हटा दिया तो महुआ ने विरोध क्यों नहीं किया? मैंने पांडुलिपि की भाषा ठीक की थी, यह मैं कैसे भूलूं? इसमें महुआ का क्या दोष है? उसने यदि ऐसा नहीं किया होता तब आश्चर्य की बात होती. ऐसा करके उसने प्रमाणित कर दिखाया है कि वह आधुनिक और व्यवहारकुशल है.
सोमवार, 13 मार्च 2006
शाम को डॉ. प्रियदर्शी से भेंट हो गई. उनसे पता चला कि महुआ ने अपना उपन्यास रणेंद्र आदि के अतिरिक्त उन्हें भी पहुंचा दिया है. यह काम पंद्रह दिन पहले संपन्न हो चुका है. डॉ. सिद्धनाथ कुमार को 27 फरवरी को उपन्यास मिल गया था.इन घटनाओं के आलोक में मैंने यह तय कर लिया है कि यदि यह औरत अब अपना उपन्यास मुझे देने के लिए आई तो मैं उपन्यास नहीं लूंगा. मैं स्पष्ट कह दूंगा कि मेरे जीवन में पहले से दुःखों का बहुत बड़ा खजाना जमा है. मैं नहीं चाहता कि मेरे पास अब कोई भी ऐसी चीज रहे, जो मुझे बराबर डंक मारने का काम कर सके.
रविवार 10 अप्रैल 2011 को रांची में रविभूषण ने मानविक, रानीगंज (पश्चिम बंगाल) के सहयोग से राधाकृष्ण जन्मशती राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था.इसे सफल बनाने के लिए संजय भालोटिया ने रविभूषण के साथ मिलकर अथक श्रम किया था.
शाम को संगोष्ठी समाप्त हो गई. अपनी अस्वस्थता के कारण मैं धीरे-धीरे अपनी पत्नी राज गोस्वामी के साथ गेट के बाहर निकला. मैं कोई रिक्शा देख रहा था. उसी समय महुआ माजी भीतर से गेट के बाहर निकलीं और हमें नमस्कार बोलकर वह रास्ते के उस पार खड़ी अपनी ओमनी में बैठकर चली गईं. उन्होंने रुककर हमसे इतना भी पूछना उचित नहीं समझा- कि आप लोग कहां जाना चाह रहे हैं? इस घटना ने मेरे हृदय पर एक मोटी लकीर बना दी.
‘मैं बोरिशाइल्ला’ का मूल लेखक कौन था
राजकमल प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित ‘प्रकाशन समाचार’ (जनवरी, 2011) में ‘प्रख्यात युवा उपन्यासकार महुआ माजी से वार्ता’ का प्रकाशन हुआ.इसमें एक स्थल पर महुआ माजी ने कहा है कि-‘ऐसी ही किसी पत्रिका के संपादक की मांग पर किसी विशेषांक के लिए कहानी लिखने के दौरान एक व्यक्ति से साक्षात्कार लिया था.वह साक्षात्कार ही लगभग पचास पृष्ठों का हो गया था.मैंने सोचा, इसे थोड़ा विस्तार देकर उपन्यासिका का रूप दे दूं.पर जब इस पर काम करना आरंभ किया तो इस विषय की गंभीरता का अहसास हुआ और एक-एक कर न जाने कितने ही लोगों का साक्षात्कार लेती चली गई.उनके द्वारा बताई गई बातों के सत्यापन के लिए विभिन्न पुस्तकालयों तथा अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त दस्तावेजों को खंगाल डाला.पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण विषय से संबंधित जानकारियां भी काम आईं.'
महुआ माजी को यह भी बताना चाहिए था कि उन्होंने किसका साक्षात्कार लिया था, जो साक्षात्कार ही लगभग पचास पृष्ठों का हो गया और इसके बाद उन्होंने जिन व्यक्तियों के साक्षात्कार लिए, जिनके साक्षात्कार से उन्हें सहायता और सहयोग मिला वे कौन थे? महुआ माजी का कथन कुछ अबूझ किस्म का है.केवल एक जगह वह सच्चाई उगलती हैं, वह भी अनायास ही, जब वह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करती हैं.मगर, वे यह बताने का कष्ट कभी नहीं करतीं कि ‘मैं बोरिशाइल्ला’ का मूल लेखक कौन था और उसका नाम क्या था?
महुआ माजी जी, आप एक बात बताना भूल गईं (?).आपने यह क्यों छिपाया कि आपके परिवार के एक व्यक्ति ने आपको बांग्ला भाषा में लिखित एक अधूरी रचना दी थी और आपसे कहा था-‘अब मुझसे लिखना नहीं हो पाता है, हो सके तो इस अधूरे उपन्यास को पूरा कर देना.’ आप जिसे साक्षात्कार बता रही हैं, बात ऐसी नहीं है.‘मैं बोरिशाइल्ला’ के वह मूल लेखक थे और वह बांग्लादेश के निवासी थे.वह आपके परिवार के, कुटुंब के थे.आपने स्वयं इस तथ्य को डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के समक्ष प्रकट किया था. दुर्भाग्य से शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012 को उनका रांची में निधन हो गया और सच उनके साथ ही सदा के लिए विदा हो गया.
‘मैं बोरिशाइल्ला’ उपन्यास के पाठकों को यह अच्छी तरह पता है कि इस उपन्यास में कहां-कहां पर फांक है.इसके पूर्वार्द्ध में बांग्लादेश की मुक्ति की कथा आती है और उत्तरार्द्ध में बंबई (बेकरी कांड) तथा कलकत्ता की घटनाएं आती हैं.पूर्वार्द्ध में बांग्लादेश का जो चित्रण है, उसमें एक सधी हुई लेखनी के दर्शन होते हैं और उत्तरार्द्ध में कथानक को तोड़-जोड़ के सहारे आगे बढ़ाने की चेष्टा देखने को मिलती है.इस हिस्से में लेखक का वह लेखन-कौशल नहीं दिखाई देता है, पूर्वार्द्ध में जो दर्शनीय है.
‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’: शोधग्रंथ उपन्यास या उपन्यास शोधग्रंथ हुआ
महुआ माजी, मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं, जो आपने अपने दूसरे उपन्यास की एक प्रति मुझे 15 अप्रैल 2012 को देने की कृपा की, दो किताबों के लोकार्पण समारोह के समापन पर.मेरे जी में आया कि मैं आपके उपन्यास को लेने से इनकार कर दूं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया.मैं इस आयोजन में कोई अप्रिय दृश्य उपस्थित नहीं करना चाहता था.मैंने अपने मन को मारकर आपका उपन्यास ले लिया.मगर, मैं यह कैसे भूल सकता हूं कि जिस उपन्यास (मैं बोरिशाइल्ला) की पांडुलिपि के प्रत्येक पृष्ठ पर मेरी उंगलियों के स्पर्श के चिह्न हैं, आपने मेरे उस परिश्रम के बदले में आभार का एक शब्द भी अपने उपन्यास में नहीं व्यक्त किया.ऊपर से आपने यह झूठ भी गढ़ दिया कि प्रकाशक ने इस अंश को हटा दिया.अगर यह सच भी है तो भी यह तो बताइए कि आपके जीवन में ऐसी कौन सी विपत्ति पैदा हो गई थी कि आप 5 दिसंबर 2004 के बाद ‘आश्रय’ का पता भी सदा-सदा के लिए भूल गईं? अब तो आठ वर्ष होने को हैं.यह क्या है? ऐसे व्यक्तियों के बारे में मेरे पिताजी एक कहावत बराबर सुना दिया करते थे-मतलब के यार, सड़किया के पार.
महुआ माजी जी, आप समाज विज्ञान से एमए, पीएचडी तथा नेट उत्तीर्ण हैं.अब आप दो बड़े-बड़े उपन्यासों की लेखिका हैं.आपको उपन्यास लिखने का भी अनुभव है और शोधग्रंथ लिखने का भी.पर क्या उपन्यास तथा शोधग्रंथ लिखने की पद्धति एकसमान होती है? क्या किसी रचनाकार को इतनी छूट भी मिल जाती है कि वह शोधग्रंथ और उपन्यास को मिलाकर एक नए प्रकार की खिचड़ी पका दे?
‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ को आपने भी उपन्यास (?) ही माना है और राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने भी इसे उपन्यास के रूप में ही प्रकाशित और बहुप्रचारित किया है.
उपन्यास में आपने एक ‘डिसक्लेमर’ भी दिया है, जो इस प्रकार है-‘इस उपन्यास में मरंग गोड़ा और वहां से जुड़े तमाम पात्र, स्थान, कंपनी, खदान, मिल, टेलिंग डैम, नदी, सभी प्रकार की घटनाएं, विचार, आंदोलन आदि काल्पनिक हैं.संगेन, चारिबा, आदित्यश्री, प्रज्ञा, मोमोका, मासायुकि, अरिना, जाम्बीरा, मेन्जारी, सुकुरमुनी, रेकोण्डा, लुड़थु, परगना, सचिव, सगेन की ताई, अभिषेक जैसे ढेर सारे पात्र बिल्कुल काल्पनिक हैं.उनका किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति कोई संबंध नहीं है.’
प्रश्न यह है कि ‘मरंग गोड़ा’ यानी ‘जादूगोड़ा’ नामक स्थान इस दुनिया में है कि नहीं, कि यह भी एक काल्पनिक जगह है, जिसका भूगोल में कोई अस्तित्व है ही नहीं? आपके डिसक्लेमर के अनुसार इस उपन्यास (?) के सारे पात्र, घटनाएं, आंदोलन, विचार, आदि सब कुछ काल्पनिक ही है तो इस उपन्यास के अंत में जिन पुस्तकों, पत्रिकाओं, लेखों आदि से विशेष मदद मिली उनमें से कुछ नाम देने की क्या उपयोगिता है? क्या इनकी सहायता से आप कोई मिथ्या जाल फैलाना चाहती हैं?
इस सूची के अंत में आप फिर लिखती हैं-‘ऊपर उल्लिखित तथा अनुल्लिखित ऐसी सभी कृतियों तथा उनके लेखकों के प्रति हार्दिक आभार, जिनसे यह उपन्यास समृद्ध हुआ और लेखन के दौरान विभिन्न परिस्थितियों को इतिहास, भूगोल, अतीत और वर्तमान के साथ गहराई से समझने में मुझे मदद मिली.’
यह आपने क्या कह दिया? एक ओर आप अपने उपन्यास (?) को पूरी तरह से काल्पनिक घोषित करती हैं और दूसरी तरफ आप यह भी कहती हैं कि ऊपर उल्लिखित तथा अनुल्लिखित ऐसी सभी कृतियों और लेखकों से आपको इतिहास, भूगोल, अतीत और वर्तमान को गहराई से समझने में मदद मिली?
आपके इस कथन के विरोधाभास का क्या अर्थ निकाला जाए? यहां मुझे एक घटना याद आ रही है.अपने शोध के क्रम में मुझे नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता जाना पड़ा.वहां रांची की एक युवती से भेंट हुई.उत्सुकतावश मैंने उससे पूछा-‘आपको यहां कैसे आना पड़ा?’ उसने बताया-‘मेरी पीएचडी की थीसिस तैयार हो गई है.मेरे गाइड ने पचास-साठ ग्रंथों के नाम बिब्लियोग्राफी में शामिल करने के लिए यहां भेजा है.’ उसका उत्तर सुनते ही मैं हंस पड़ा.मैंने हंसते हुए कहा-‘जब आपकी थीमिस तैयार हो ही गई है तो पचास-साठ ग्रंथों के नाम बिब्लियोग्राफी में शामिल करने की क्या जरूरत है? आपने अपनी थीसिस में जिन-जिन ग्रंथों का उपयोग किया है, उनकी पूरी जानकारी देना ही पर्याप्त है.इससे अधिक और ग्रंथों के नाम देने की कोई आवश्यकता नहीं है.’
सामान्यतः लोग इसी रीति से शोधग्रंथ तैयार कर लिया करते हैं.जिन ग्रंथों के नामों के उल्लेख की जरूरत नहीं होती, उनके नाम भी डाल दिए जाते हैं ताकि परीक्षकों को भी लगे कि शोधार्थी असली पढ़ाकू है.
महुआ माजी जी आपने भी इसी पद्धति से अपने कथित उपन्यास उर्फ शोधग्रंथ को तैयार कर दिखाया है!
1. आपने अब तक बांग्ला, अंग्रेजी, हिन्दी आदि भाषाओं के हजारों उपन्यास पढ़े होंगे.इनमें से अब तक ऐसे कितने उपन्यास आपको मिले हैं जिन पर यह लिखा गया है कि यह उपन्यास पूर्णतः काल्पनिक हैं?
2. आपने अपने और दूसरों के कई शोधग्रंथ भी देखे होंगे.आपको ऐसे कितने शोधग्रंथ मिले हैं जिनके ऊपर ही यह लिखा हो कि ये पूर्णतः काल्पनिक हैं?
आपका ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ हिन्दी का एक अद्भुत ग्रंथ है, जिसकी जाति या प्रजाति के बारे में पता लगाना भी एक अनुसंधान का और कठिन काम है.मेरे जानते यह हिन्दी का पहला ग्रंथ माना जाना चाहिए, जिसके प्रारंभ में ही एक डिसक्लेमर है कि इसमें जो कुछ भी है वह पूर्णतः काल्पनिक है.ग्रंथ के अंत में अनेक सुप्रसिद्ध लेखकों के नाम और उनके ग्रंथों के नाम भी शामिल किए गए हैं ताकि लेखिका के बारे में लोगों को लगे कि उसने कितना गहन अध्ययन करने का कष्ट उठाया है.
आपका ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ वास्तव में क्या है, इस पर बाद में विचार होगा.पहले आपकी इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए कि आप जब भी कोई काम करती हैं, तो आप बहुतों का सहयोग लेती हैं और कभी-कभी उनके नामों का उल्लेख भी करती हैं.कुछ लोगों को आप अपनी किताबें भी उपहार में देती हैं.मगर, यह आपकी पुरानी लत है कि जिनके प्रति सबसे पहले आपको कृतज्ञ होना चाहिए, आप उनके नाम ही भूल जाया करती हैं.आपकी सुविधा के लिए मैं ऐसे अभागे लोगों की एक तालिका दे रहा हूं जिसे आप अकृज्ञता-सूची का नाम भी दे सकती हैं-
1. ‘मैं बोरिशाइल्ला’ के मूल लेखक के नाम के प्रति सबसे पहले आपको आभार व्यक्त करना चाहिए था और उनके नाम का श्रद्धा के साथ स्मरण करना चाहिए था, लेकिन आपने उनके नाम को छिपाने का अक्षम्य अपराध किया है.
2. ‘मैं बोरिशाइल्ला’ की पांडुलिपि को सुधारने का काम जिस नाचीज श्रवणकुमार गोस्वामी ने किया, उसके प्रति आभार प्रकट करना तो बहुत दूर की बात है, आपने बेशर्मी से यह तक कह दिया कि मेरा नाम प्रकाशक ने ही हटा दिया.सच क्या है, इसकी जानकारी या तो आपको है या अशोक महेश्वरी को.इस उपन्यास का प्रत्येक पाठक यह अनुमान लगा सकता है कि इस मोटे उपन्यास की पांडुलिपि को सुधारने में मुझे कितना समय और श्रम लगाना पड़ा होगा.यहां तक कि आपने ‘मैं बोरिशाइल्ला’ की प्रति कहकर भी आज तक मुझे नहीं दी है.
3. ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ को तैयार करने में आपने इंटरनेट का भरपूर उपयोग किया है, लेकिन आपने इंटरनेट के प्रति कोई कृतज्ञता प्रकट नहीं की. इसकी जरूरत भी क्या है? इंटरनेट कोई व्यक्ति तो है नहीं कि जिसके प्रति आभार प्रकट करना आवश्यक हो? यदि आप इंटरनेट को गाली भी देंगी तो उस बेचारे पर कोई प्रभाव तो पड़ने वाला है नहीं!
4. ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ के सहारे आपने यह प्रमाणित करने का भरपूर प्रयास किया है कि आप ‘हो’ भाषा और संस्कृति की भी विशेषज्ञ हैं.मगर, आपने जिस डॉ. आदित्य प्रसाद सिन्हा से यह विशिष्टता प्राप्त की है, क्या आपने उन्हें अपने उपन्यास की प्रति दी है? उल्टे आपने उनके नाम को भी उलट-पुलट कर जारज बना दिया है.इस उपन्यास के दो पात्र हैं, परंतु आपकी दृष्टि में ये दोनों काल्पनिक हैं, लेकिन ये दोनों पात्र रांची के जीवित पात्र हैं-श्रीप्रकाश और आदित्य प्रसाद सिन्हा.इन दोनों प्रतिभाओं का आपने भरपूर उपयोग किया है.पता नहीं आपने किस अधिकार से आदित्य प्रसाद सिन्हा से ‘आदित्य’ को लिया और श्रीप्रकाश से ‘श्री’ को लेकर एक नए पात्र ‘आदित्यश्री’ को जन्म दे दिया.इसके बावजूद आप यह दावा करती हैं कि आपका उपन्यास पूर्णतः काल्पनिक है? क्या किसी साहित्यकार को जीवित पात्रों के नाम बदलने का भी ऐसा कोई अधिकार प्राप्त होता है?
दो उपन्यासों की विचलित नियति
आपके दोनों उपन्यास विचलन के गंभीर रूप से शिकार हैं.आपकी यात्रा शुरू से पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ती नजर आती है, मगर वह यात्रा अपने निर्धारित पथ से विचलित हो जाती है.यह बात आपके पहले उपन्यास में भी देखी जा सकती है और दूसरे उपन्यास में भी.आपने मुद्दा उठाया विकिरण, प्रदूषण एवं विस्थापन से जूझते हुए आदिवासियों का और आगे बढ़कर आप प्रज्ञा, आदित्यश्री और मोमोका की प्रेमकथा लिखने लगती हैं.लगता है कि अपने से लक्ष्य से च्युत हो जाना ही आपके लेखन की नियति है.
आपके दूसरे उपन्यास का जिस शान-ओ-शौकत से लोकार्पण हुआ और उसमें जैसी बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल हुईं, उनके नाम के आतंक से काफी लोग आतंकित माने जा सकते हैं.जब कोई ऐसे आतंक से आतंकित हो जाता है, तो सबसे पहले वह अपने विवेक को त्यागकर आतंक के क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाता है.तब किसी के लिए यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि ‘वास्तव’ क्या है?
इस बात की पूरी-पूरी आशंका है कि इस उपन्यास (?) की पांडुलिपि को नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर ने शायद ही पढ़ने का कष्ट उठाया हो.इनमें से किसी के भी पास इतनी फुर्सत कहां होती है! पफर भी कृष्णा सोबती जी ने उपन्यास के आवरण यह अनुशंसा छपने दी ‘हर सचेत नागरिक के लिए मानवीय चिंताओं की शैल्फ पर एक जरूरी टाईटल.’ -कृष्णा सोबती ने गनीमत है कि यह नहीं कहा कि ‘हर सचेत नागरिक के लिए मानवीय चिंताओं की शैल्फ पर एक पठनीय तथा संग्रहणीय टाईटल.’ उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी अनुशंसा भी दे दी और अपने को बचा भी लिया.
महुआ माजी ने ‘डिसक्लेमर’ लिखकर इस रचना को न तो उपन्यास रहने दिया और न ही शोधग्रंथ (थीसिस).इस चालाकी का उपयोग करते हुए वे स्वयं भूल गईं कि आप दोधार वाली तलवार का प्रयोग कर रही हैं, जिसकी वजह से न तो आप उपन्यासकार कही जा सकेंगी और न ही शोधकर्ता.
आश्चर्य इस बात का है कि हिन्दी के प्रखर आलोचक नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और हिन्दी फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक एवं गीतकार तीनों व्यक्तियों ने मिलकर महुआ माजी के उपन्यास (?) ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ की पांडुलिपि को तीसरे राजकमल कृति सम्मान के लिए चुना और महुआ माजी को फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार प्रदान किया.
राजकमल प्रकाशन एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था है.इसने प्रकाशन व्यवसाय के अंतर्गत ही इस कथित उपन्यास को छापा है.इसने अपना काम पूरा कर दिया.कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर भी अब एक किनारे नजर आ रहे हैं.लेकिन एकमात्र ओनस (onus) डॉ. नामवर सिंह पर आ जाता है कि अब वह बताएं कि-‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ यह कृति उपन्यास है तो कैसे या यह शोधग्रंथ है तो वह भी कैसे? उम्मीद है, मुमकिन है, शीघ्र ही हमारे सामने एक नए आलोचनाशास्त्र की कोई नई अवधारणा अवतीर्ण हो सके!
एक नए विवाद का सूत्रपात
वैश्वीकरण तथा बाजारवाद के इस युग में ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ के प्रकाशन से एक नए विवाद का सूत्रपात हो गया है.इस विवाद को जन्म देने वाली कुमाता का नाम है-मार्केटिंग.इस मार्केटिंग ने अशोक महेश्वरी, नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, जावेद अख्तर और महुआ माजी सबको एक ही कतार में ला खड़ा किया है.
बाजार में बिजनेस मैनेजमेंट वालों की मांग बढ़ती जा रही है.बीबीए तथा एमबीए की उपाधि प्राप्त करते ही लोगों को अच्छी नौकरी मिल जाती है.मार्केटिंग विषय लेने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.मार्केटिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि अपनी विज्ञापन शैली की सहायता से मार्केटिंग का विशेषज्ञ किसी भी उत्पाद को बेच सकता है और उसकी मांग को बढ़ा सकता है.मार्केटिंग विशेषज्ञ में यह गुण होता है कि वह चाहे तो गधे को भी घोड़ा बताकर बेच सकता है.ऐसा करने में ही उसकी सफलता और तरक्की निहित होती है.
मैं ऐसे रचनाकारों से यह निवेदन अवश्य करना चाहूंगा जो रातों-रात ख्याति के शिखर पर आरूढ़ होना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि केवल बुद्धि से ही सब कुछ प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता है.बुद्धि से ऊपर एक और चीज भी होती है-विवेक.यदि आपने विवेक को पहचाना नहीं और उसका समुचित उपयोग करना नहीं जाना, तो आपकी कीर्ति बहुत देर तक कहीं टिक नहीं सकती.जो लोग जल्दी-से-जल्दी अपनी कीर्ति-पताका को सबसे ऊपर फहराने की कामना करते हैं, उन्हें जरा सब्र से काम करना चाहिए और साधना पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए.
सबको पता होता है कि बांस के ऊपरी सिरे पर ही कोई पताका फहराई जाती है.बांस जितना ऊंचा होता है, उस पर फहराने वाली पताका हवा के झोंकों के कारण फर्र-फर्र उड़ती रहती है, फलतः देखते-ही-देखते हवा के तेज झोंकों के कारण शीघ्र ही पताका चिंदी-चिंदी होकर हवा में गायब हो जाती है और आकाश में केवल एक लंबा बांस ही खड़ा दिखाई देने लगता है.जब कोई अपनी कीर्ति-पताका को फहराने के लिए ऐसे ही किसी बांस की सहायता लेता है तो उसका ऐसा ही अंत अवश्यंभावी हो जाता है और अंततः वह बांस भी सड़-गल कर हवा हो जाता है.
वास्तव में अपनी कीर्ति-पताका को फहराने के लिए किसी बांस की कोई जरूरत नहीं होती बशर्ते कि वह वास्तविक कीर्ति-पताका हो.ऐसी कीर्ति-पताका भूत, वर्तमान और भविष्य एवं सभी दिशाओं में सर्वदा फहरती रहती है.
मैंने इस लेख का प्रारंभ श्रीलाल शुक्ल के एक कथन से किया था और अब मैं उनके इसी कथन से इस लेख का समापन भी करना चाहता हूं-‘महान लेखक हमेशा बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं.’
पुनश्च…
यदि कोई पाठक मेरी डायरी के संबद्ध अंशों की प्रामाणिकता को जांचना चाहे तो उसे यह सुविधा लेखक के द्वारा उपलब्ध करा दी जाएगी.
लेखक श्रवण कुमार गोस्वामी रांची में रहते हैं और वरिष्ठ उपन्यासकार हैं.
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एकाध मामले कोर्ट में जाएं तो दिमाग ठिकाने आ जाएंगे





