जिस तरह जी न्यूज और जी बिजनेस के संपादकों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है, उन तौर-तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। इन संपादकों पर कोयला खदान आवंटन से जुड़ी खबरों के प्रसारण रोकने की एवज में जिंदल ग्रुप से सौ करोड़ रुपये की फिरौती मांगने का गंभीर आरोप लगाया गया है।
एक स्टिंग आपरेशन के जरिए जिंदल ग्रुप ने यह सिद्ध करने का प्रयास भी किया है कि ये दोनों संपादक जिंदल के दफ्तर पहुंचे थे और वहीं उन्होंने खबर रोकने के लिए सौ करोड़ रुपये देने की मांग उनके सामने रखी। यह मसला उस समय सुर्खियों में आया था, जब नवीन जिंदल की ओर से जी ग्रुप के संपादकों के खिलाफ दिल्ली पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। दिल्ली पुलिस इस पूरे मामले की तहकीकात में लगी थी।
इस सिलसिले में दोनों संपादकों सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया से कई दौर की पूछताछ भी की गई। एक रोज फिर उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया और गिरफ्तार कर लिया गया। जी ग्रुप के वकील ने उनकी गिरफ्तारी पर सवाल खड़ा करते हुए जानना चाहा है कि जब दोनों संपादक और जी ग्रुप लगाए गए आरोपों की जांच में बिना किसी हील हुज्जत के सहयोग करते आ रहे हैं तो अचानक उन्हें गिरफ्तार क्यों किया गया है? यह सरकार को बताना होगा।
आमतौर पर ऐसे मामलों में प्रक्रिया यही है कि अपनी जांच के आधार पर पुलिस कोर्ट में आरोप-पत्र दाखिल करती है और अदालत यदि जरूरी समझती है तो अभियुक्तों को हिरासत में लेने अथवा जमानत पर छोड़ने का निर्णय लेती है। पुलिस और सरकार ने चूकि वह तरीका नहीं अपनाकर सीधे संपादकों को गिरफ्तार किया है, इसलिए उसकी नीयत पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। ऐसा वह उस हालत में कर सकती थी, जब वे सहयोग नहीं कर रहे हों। सहयोग के बावजूद अगर यह कदम उठाया गया है तो इसके पीछे की मंशा समझी जा सकती है। किसी भी मीडिया ग्रुप के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की गिरफ्तारी के फैसले को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
उनकी गिरफ्तारी के तरीके और समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि उन्होंने गैर कानूनी तरीके से जिंदल ग्रुप से मोटी रिवत की मांग की है तो पुलिस का दायित्व है कि वह जांच, तथ्यों और सबूतों के आधार पर आरोप-पत्र तैयार कर अदालत में पेश करे और उन्हें सजा दिलाने का प्रयास करे परन्तु आरोप पत्र पेश करने से पहले ही जिस अंदाज में उन्हें गिरफ्तार करने की जल्दबाजी दिखाई गई है, उससे लगता है कि सरकार पूरे कोलगेट मसले को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही है। कोलगेट में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के कारण सरकार की भारी फजीहत हुई है। यह बातें खुलकर सारे देश के समक्ष आ गई है कि सरकार और कांग्रेस ने अपने कुछ चहेतों को कोयला खदानों की बंदरबांट की है।
कैग की रिपोर्ट आने के बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले सत्र में संसद नहीं चलने दी। इस सत्र में भी यह मसला उठना तय है। गड़बड़ियां पाए जाने के बाद जिंदल ग्रुप सहित कई कंपनियों को आवंटित की गई कई कोयला खदाने रद्द की जा चुकी हैं। कई पर मुकदमें कायम किए जा चुके हैं। इनमें कांग्रेस के एक सांसद और उनके मंत्री भाई भी शामिल हैं। मीडिया के किसी अंग ने यदि कोई गलती की है तो इसका फैसला अदालत से होना चाहिए। इन गिरफ्तारियों के तौर तरीकों से सरकार ने बाकी मीडिया को भी एक संदेश देने की कोशिश की है, जिसे स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता।
लेखक ओमकार चौधरी हरिभूमि अखबार के संपादक हैं.





