पत्रकारिता की खराब हालत पर चिन्तित नहीं हैं शशिशेखर। वो तो कह रहे हैं कि कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है। आप उनका लिखा फिर पढ़िए। दुनिया भर की बात करने से शुरू हुआ लेख दरअसल यही कहता है कि मीडिया पैसे क्यों न कमाए? वे यह भी पूछते हैं कि इसमें हर्ज क्या है? हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले पर मौन अपने इस आलेख में उन्होंने कहा है…
“.. हम क्यों न उन सिद्धांतों पर चर्चा करें, जिनके बल पर पूरे संसार के पत्रकार आज तक अपना सीना चौड़ा करके चलते रहे हैं? हम सभी को पत्रकारिता की किताबों में पढ़ाया गया है कि हमारा काम संविधान सम्मत, सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल और जन साधारण के हित में होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है? अक्सर लोग आरोप लगाते हैं कि व्यवसायीकरण ने मीडिया को गलत रास्ते पर ला पटका है। क्या वाकई ऐसा है? ”
नीरा राडिया टेप और नवीन जिन्दल के आरोपों पर दो संपादकों की गिरफ्तारी के बाद भी वे पूछ रहे हैं कि मीडिया गलत रास्ते पर है कि नहीं। चिन्तित वे बिल्कुल नहीं लग रहे हैं। वे तो संपादक होने का धर्म निभा रहे हैं।
आगे पढ़िए। उन्होंने लिखा है, “यह ठीक है कि मीडिया व्यावसायिक हो गया है। यह भी सही है कि उसे लाभ-हानि के तराजू में तोला जाता है। ठीक यह भी है कि तमाम मीडिया कंपनियां शेयर बाजारों में लिस्टेड हैं और हर तीन महीने में अपने नफे-नुकसान का ब्योरा पेश करती हैं। मैं पूछता हूं कि इसमें हर्ज क्या है? एक अखबार, न्यूज चैनल या खबरिया वेबसाइट अपने उपयोगकर्ता से वायदा क्या करती है? यही कि हम आप तक खबर और विचार पहुंचाएंगे। पता नहीं क्यों, हम भूल जाते हैं कि समाचार का अकेला, और सिर्फ अकेला तत्व ‘सत्य’ है।” यहां भी वे यही पूछ रहे हैं कि मीडिया कंपनियां पैसे कमाएं इसमें हर्ज क्या है?
वे कहते हैं, “अगर सच के साथ छेड़छाड़ की गई है, तो वह कहानी हो सकती है, खबर नहीं। अब पत्रकारों को तय करना है कि उनकी पेशेवर नैतिकता क्या है? वे खबर लिखना और दिखाना चाहते हैं या कहानी? भूलिए मत, इस देश को मसालेदार कहानियों के मुकाबले खबरों की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए आज भी वही अखबार या चैनल प्रतिष्ठा पाते हैं, जो सच पर अडिग रहते हैं।” अब शशिशेखर जी के इस ज्ञान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है और परेशानी तो यही है कि ऐसे अखबार बहुत कम रह गए हैं। और सच दिखाने-बताने की तो छोड़िए सिर्फ चुने हुए सच को खबर बनाना भी बेईमानी है लेकिन इसकी भी चर्चा वे नहीं करते।
उन्होंने लिखा है, “एक बात और। अगर समाज को पेशेवर डॉक्टर, शिक्षक या वकील की जरूरत है, तो प्रोफेशनल पत्रकार की क्यों नहीं? ” पर वे प्रोफेशनल पत्रकारों की दशा-दिशा की चर्चा नहीं करते। यह नहीं बताते कि पत्रकारों को पेशेगत ईमानदारी दिखाने में क्या बाधा आती है और इस बात की भी चर्चा नहीं करते कि कैसे एक पत्रकार फर्जी स्टिंग दिखाने के बावजूद संपादक बन गया और ऐसा गैर पेशेगत काम करने के लिए पकड़ा गया है जो शायद पहले हुआ ही न हो। वे यह नहीं कहते कि संपादक बनाने में व्यावसायिकता का ख्याल रखा गया होता तो यह पत्रकार शायद वह सब करने के लिए तैयार ही नहीं होता जिसका आरोप उसपर है।
शशिशखेर जी ने आखिर में लिखा है, “फिर यह कहने में संकोच क्यों कि हम पेशेवर तौर पर सच बोलने और लिखने वाले हैं।” किसे है? सवाल तो यह है कि सच बोलने-लिखने वालों को मीडिया में पूछ कौन रहा है। और अगर उसपर कोई परेशानी आती है तो उसके पास रास्ते क्या हैं। क्या ऊंची कुर्सी पर पहुंचने वाले सत्य बोल लिख कर पहुंचे हैं? ऐसे में कोई क्यों सत्य बोले लिखे? इसपर भी उन्होंने प्रकाश नहीं डाला है। सब जानते हैं कि संपादक बनने के लिए कैसी योग्यता की आवश्यकता रह गई है और ऐसे में आदर्शों की बात करने का कोई मतलब नहीं है। मीडिया के लिए भारी-भरकम कानून और आचार संहिता से भी सत्य बोलने लिखने वाले नहीं डरते हैं। फिर भी … शशिशेखर जी पूछते हैं, “… तो मीडिया पर चाबुक चलाने से क्या हो जाएगा? ” और यह भी कि, “…. कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।”
ऐसे में मेरा साफ मानना है कि शशिशेखर संपादक होने का अपना धर्म निभा रहे हैं। पत्रकारिता के गिरते स्तर की चिन्ता उन्हें नहीं है। अगर थोड़ी-बहुत है भी, तो इसलिए कि वे संपादक हैं और मोटी तनख्वाह मिल रही है। और इसीलिए वे कह रहे हैं कि मीडिया पैसे क्यों न कमाए। जब मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना है तो गिरते स्तर की चर्चा का मतलब भी बदल जाता है। खबर वही छपेगी जिसमें खर्च नहीं होगा, कम होगा। खबर ढूंढ़ने और उसकी पुष्टि करने के लिए क्यों पैसे खर्च किए जाएं। संपादन और गुणवत्ता पर क्यों खर्च किया जाए। मानहानि के मुकदमों का जोखिम क्यों उठाया जाए। वेज बोर्ड की सिफारिशें क्यों मानी जाएं, ठेके पर काम क्यों नहीं कराया जाए, स्ट्रिंगर को न्यूनतम मजदूरी कियों दी जाए, कर्मचारियों को समय पर तरक्की क्यों दी जाए, अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत क्यों किया जाए। काम का अच्छा माहौल क्यों बनाया जाए।
संपादकों का उद्देश्य, मकसद और काम ही बदल गया है…. जो हो रहा है उसे सही ठहराना…. लगे रहिए…
संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्व-उद्यमी हैं. वे लंबे समय तक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता में वरिष्ठ पद पर रहे. उसके बाद उन्होंने अनुवाद की अपनी कंपनी प्रारंभ किया और लंबे समय से स्व-रोजगार के जरिए दिल्ली-एनसीआर में शान से रह रहे हैं. वे समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर बेबाक लेखन अखबारों, वेब, ब्लाग आदि पर करते रहते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. संजयजी www.prachaarak.com नामक वेबसाइट का संचालन भी करते हैं.
मूल आलेख- पत्रकारिता की खराब हालत पर बहुत चिंतित हैं शशि शेखर






