मजीठिया वेतन बोर्ड की संस्तुतियों की अधिसूचना के बाद प्रेसकर्मियों को दबाने कुचलने का खेल और तेज हो गया है। दैनिक जागरण को नई संस्तुतियों से सर्वाधिक परेशानी है। पिछले चार दिनों के भीतर एक फर्जी सहमति पत्र पर आनन-फानन दस्तखत कराए गए हैं। जागरण के अधिकांश कर्मी तो जानते भी नहीं सहमति पत्र का मजमून क्या है। मजमून अंग्रेजी में लिखा हुआ था और इस पर दस्तखत संस्थान के सफाईकर्मियों , चतुर्थ श्रेणी कर्मियों और मशीन के ऐसे कर्मियों ने भी किया है जो अंग्रेजी भाषा नहीं जानते।
जिन कर्मियों ने हिमाकत करते हुए मजमून को पढ़ लिया उनके मुताबिक प्रबंधन ने उनसे संतुष्टि पत्र ले लिया है। मसलन उन्हें पिछले वेतन बोर्ड मणिसाना के मुताबिक सुविधाएं, भत्ते और वेतन मिलते हैं। कंपनी ने अंतरिम राहत दे दी है। वे कंचन चर रहे हैं सुखी है और प्रबंधन से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। प्रबंधन के इस छल प्रपंच से आहत कर्मचारियों में भारी गुस्सा है। बस अनुकूल समय का इंतजार है जिस दिन गुस्सा फूटे।
जागरण की सभी 36 यूनिटों में दस्तखत का यह खेल चला है। कहीं कही प्रतिरोध भी हुआ है। बताते हैं कि इस काम में सबसे गंदी भूमिका संपादकीय प्रभारियों ने निभाई है। जिन्होंने दस्तखत में हीलाहवाली की उन्हें नौकरी से हाथ ही नहीं धोने, फर्जी मुकदमों में फंसाने, कुछ ऐसा कर देने कि पत्रकारिता के पेशे लायक ही न रह जाएं, की धमकी दी गई। इस काम में कुछ वरिष्ठ रिपोर्टरों की भूमिका भी काफी शर्मनाक रही। वे अपने सहकर्मियों को जीवन जगत का व्यवहार समझाने में लगे रहे। प्रबंधन की नजर में सुखर्रू बनने के लिए इन्होंने अपने साथ प्रतिदिन काम करने वाले साथियों पर ही बेजा दबाव बनाया। ये अलबत्ता है कि ये रिपोर्टर बाहर भीतर थू थू का शिकार हो रहे हैं।
वेतन और भत्ते के मामले में जागरण समूह का रिकार्ड काफी गंदा है। इस कंपनी में मणिसाना की संस्तुतियां ही अब तक नहीं लागू हो पाई हैं। 15 साल पहले जब मणिसाना की संस्तुति आई तब भी इसी तरह सहमति पत्र पर दस्तखत कराए गए थे। कर्मचारियों की वेतन स्लिप पर as pur agreement लिखा रहता है। जिससे कानूनी तौर पर इस कुकृत्य को चुनौती न दी जा सके। कोई संगठन, यूनियन बनने ही नहीं दी गई जिससे संगठित आवाज उठ पाए। जिन्होनें बोलने की कोशिश की उन्हें नौकरी से बाहर होना पड़ा। कुछ लोग अभी भी मुकदमें में घिसट रहे हैं। श्रम विभाग खुद संज्ञान नहीं लेता। इंसपेक्टर्स आते हैं और प्रबंधक के कमरे में चाय पीकर उनके उपलब्ध कराए दस्तावेज और सूचनाएं लेकर चले जाते है।
हालत यह है कि राज्य सरकार के सफाईकर्मियों के वेतन से भी कम वेतन में एडीटोरियल के 80 फीसदी सब एडीटर, रिपोर्टर, सीनियर सबएडीटर और सीनियर रिपोर्टर काम कर रहे हैं। इन्हे श्रम कानूनों के मुताबिक नाइट एलाउंस नहीं मिलता। एचआरए और अन्य सुविधाओं की तो कल्पना भी बेमानी है। कम वेतन पर मशीन की तरह काम। अब मल्टीमीडिया का कांसेप्ट लाया गया है जिसके तहत जागरण के भविष्य के प्रकल्प टीवी चैनल के लिए भी रिपोर्टर को बिना कुछ अतिरिक्त लिए काम करना पड़ेगा। काम के घंटे तय होने का भी कोई मतलब नहीं है। हाजिरी के लिए गेट पर बायोमीटरिक मशीन लगी है। यह मशीन कंपनी के फ्राड का एक नमूना है। यह कर्मचारियों के 8 घंटे से ज्यादा श्रम को रिकार्ड नहीं करती। अलबत्ता जैसे ही 8 घंटा से कम काम हुआ वेतन काट लेती है। लिहाजा कंपनी में ओवरटाइम देने का सिस्टम ही बंद हो गया।
अपील लोकतांत्रिक संगठनों, प्रेस कौसिंल, प्रेसकर्मियों के संगठनों से-
1- जागरण के प्रबंधन को हजारों की संख्या में निंदा पत्र प्रेषित करें। उन्हें बताएं सच की रक्षा, सात सरोकारों और सात संस्कारों के प्रति प्रतिबद्धता का दावा करते है तो अपने कर्मचारियों को उनका वाजिब हक दें।
2-उप श्रमायुक्तों को चिटठी लिखे, ज्ञापन दे और उनपर दबाव बनाएं कि वे जागरण के कर्मचारियों को अपने कार्यालय बुलाकर उनके बयान लें। बैंक और पीएफ आपिफस से वास्तविक वेतन भुगतान का रिकार्ड हासिल करें और सत्यापन करें कि क्या दिया जा रहा है। जो दिया जा रहा है वह पिछले वेतन बोर्ड के अनुरूप है अथवा नहीं। और ऐसे में कर्मचारियों के दस्तखत वाला कथित सहमति पत्र फ्राड नहीं तो और क्या है।
3-आम पाठक जो कि दैनिक जागरण में अपनी आवाज तलाशते हैं, उन्हें इस सच्चाई को बताया जाय कि दरअसल जागरण कर्मचारियों का खून चूसकर सत्य की रक्षा का ढोंग कर रहा है। उसका लक्ष्य पाठकों की आवाज बुलंद करना नहीं अपना मुनाफा बढाना है। यह मुनाफा भी अखबार की प्रगति और बेहतरी में नहीं खर्च होना है। इससे जागरण समूह के मालिकान शराब के कारखाने, रियल स्टेट, माल समूह का नया साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं।
आपसे सहयोग की उम्मीद में
हम हैं जागरण के कर्मचारी
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





