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इरफान, कार्टून, जनसत्ता, भोपाल और मेरी भड़ास

किसी अखबार में सबसे छोटी जगह लेकर सबसे बड़ी बात कहने का मादा रखता है कार्टून और इसी कार्टून जगत की एक हस्ती हैं इरफानजी, पत्रकारिता जगत में बड़ा नाम है। लेकिन ना जाने क्यों अपने भोपाल आगमन पर ये नाम अपनी गूंज को थोड़ा कम कर गया या यूं कहिये कि उनके बारे में कुछ लाउड बातें हुईं कि उनके नाम की गूंज स्वतः ही कम सी सुनाई दी। भूमिका को ही लेख की शक्ल ना देते हुये सीधा पांइट पर आता हूँ।

किसी अखबार में सबसे छोटी जगह लेकर सबसे बड़ी बात कहने का मादा रखता है कार्टून और इसी कार्टून जगत की एक हस्ती हैं इरफानजी, पत्रकारिता जगत में बड़ा नाम है। लेकिन ना जाने क्यों अपने भोपाल आगमन पर ये नाम अपनी गूंज को थोड़ा कम कर गया या यूं कहिये कि उनके बारे में कुछ लाउड बातें हुईं कि उनके नाम की गूंज स्वतः ही कम सी सुनाई दी। भूमिका को ही लेख की शक्ल ना देते हुये सीधा पांइट पर आता हूँ।

हुआ यूं कि अभी जनसत्ता के इरफान जी का भोपाल आना हुआ। परपज था कि ‘‘बेटी है तो कल है’’ की थीम पर अपनी कलम कूंची चलायेंगे और बेटी बचाओ की बात जन जन तक पहुँचायेंगे। तो माहौल बना और कार्टून प्रदर्शनी लगाई गयी। और जनसत्ता के कार्टूनिस्ट ने सबका मन मोहा …सबका मतलब जो लोग स्वराज वीथिका, रवीन्द्र भवन पहुंचे। जी हाँ वहीं लगाई गयी थी कार्टून प्रर्दशनी जनसत्ता के कार्टूनिस्ट इरफानजी के कार्टून्स की।

शायद मेरी भड़ास पर आपको भी भड़ास आ जाये कि मैं बार-बार जनसत्ता का नाम क्यों ले रहा हूँ तो मेरे भड़ास मित्रों भड़ास तो यही है कि इरफान जी बार-बार ये मेन्शन करते पाये गये कि वे जनसत्ता से हैं और बस इसीलिये उन्हें तवज्जो से बढ़कर तवज्जो दी जाये। तो उन्हें शासन से पैसा (कुल मिलाकर लगभग 15-16 लाख रुपये) तो मिला ही और पत्रकारिता जगत के मित्रों से चाटुकारिता उन्होंने जनसत्ता के नाम पर कमाई। माना भोपाल के पत्रकारिता मित्रों ने उन्हें सम्मान दिया पर चाटुकारिता की आदत ना होने की वजह से भड़ास निकालना तो बनती है। अब इतना बड़ा व्यक्तित्व जो कार्टून बनाते बनाते सच में लोगों को कार्टून समझने लगे ये भी ठीक नहीं है ना।

और फिर भड़ास ढाई गुना तब हुई जब खर्चे की बात सुनी। मेरा अंकगणित ठीक नहीं है लेकिन अगर स्वराज वीथिका में कार्टून प्रर्दर्शनी देखने पहुँचे दर्शकों को इस पूरे आयोजन के खर्च के साथ रखें तो कुछ 50 हजार का एक दर्शक पड़ेगा। अगर ये बात उन दर्शकों को पता लग जाती तो वो अपने आपको एक दिन का आधा लखपति तो समझकर खुश हो जाते। भड़ास बस यही है कि आखिर इतना खर्च करके इरफान जी को बुलाया, वो आये, उन्होंने कार्टून बनाये, वर्कशॉप के नाम पर शायद कुछ कार्टून बनाने भी सिखाये, वैसे तो इस सबके लिये उन्होंने दाम पाये, लेकिन फिर भी हम उनके आभारी हैं…. बस जनसत्ता के नाम पर जो उन्होंने रौब दिखाया वो पत्रकारिता क्षेत्र के लिये एक बीमारी है, कहीं ये चाटुकारिता करवाने की लत सबको ना लग जाये यही सोच के दिल भारी है…… और यही भड़ास हमारी है। आप भी निकालिये अब आपकी बारी है….।

दुर्गा

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