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मैं तो बच गयी, क्योंकि चीखना मुझे आता था, लेकिन…

बात तब की है, जब मैं सिर्फ आठ साल की थी. खेलते-खेलते गेंद जब अंकल के घर में चली जाया करती थी, तो मैं भीतर से कांप जाती थी कि अब गेंद मुझे ही लेने जानी पड़ेगी. अंदर जाने का मन नहीं करता था. वो अंकल नहीं थे, बुरे अंकल थे, बहुत बुरे. जब वो मुझे छूते थे, तो उनका छूना मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं जानती नहीं थी कि वो मुझे क्यों छू रहे हैं, क्योंकि आठ साल की बच्ची अच्छा और बुरा नहीं जानती. लेकिन भीतर से शायद कुछ होता है, जो अच्छे और बुरे का भेद समझा देता है. पिता का स्पर्श बुरा नहीं होता जब वह अपनी बच्ची को प्रेम से चूमता है. लेकिन उसी उम्र का आदमी जब गलत मंशा से छूता है-चूमता है, तब एक मासूम बच्चा भी जान जाता है कि ये जो भी है अच्छा तो नहीं ही है.

बात तब की है, जब मैं सिर्फ आठ साल की थी. खेलते-खेलते गेंद जब अंकल के घर में चली जाया करती थी, तो मैं भीतर से कांप जाती थी कि अब गेंद मुझे ही लेने जानी पड़ेगी. अंदर जाने का मन नहीं करता था. वो अंकल नहीं थे, बुरे अंकल थे, बहुत बुरे. जब वो मुझे छूते थे, तो उनका छूना मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं जानती नहीं थी कि वो मुझे क्यों छू रहे हैं, क्योंकि आठ साल की बच्ची अच्छा और बुरा नहीं जानती. लेकिन भीतर से शायद कुछ होता है, जो अच्छे और बुरे का भेद समझा देता है. पिता का स्पर्श बुरा नहीं होता जब वह अपनी बच्ची को प्रेम से चूमता है. लेकिन उसी उम्र का आदमी जब गलत मंशा से छूता है-चूमता है, तब एक मासूम बच्चा भी जान जाता है कि ये जो भी है अच्छा तो नहीं ही है.

गेंद लाने जब जाती तो वो मुझे किस करते थे, मेरे हाथों को कसकर पकड़ लेते थे, मुझे रोकते थे, खेलने जाने नहीं देते थे. एक दो बार तो मैं कुछ नहीं बोली, लेकिन उसके बाद मैं तेज़ी से चीखती थी और वहां से भाग जाती थी. आज भी जब मैं बचपन के बुरे अंकल को याद करती हूं, तो अपने हाथों को, गालों को होंठो को काट कर फेंक देने का दिल करता है या फिर उस बुरे अंकल को. आज कई दशक बाद भी वो स्पर्श मुझे चुभता है. मैं सौभाग्यशाली थी, क्योंकि मुझे चीखना आता था. लेकिन कितनी ही बच्चियां चीख भी नहीं पाती और उनके साथ बहुत कुछ हो जाता है. पुरुष जानवर होता है. वह छोटे बड़े का भेद भूल जाता है.

बात यहीं पर खतम नहीं होती, मेरी चाइल्हूड फ्रेंड मीरा (काल्पनिक नाम) जब सिर्फ पांच साल की थी, उसके बुआ के लड़के ने ही उसे एब्यूज़ किया करीब तीन साल तक. गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं. बुआ का लड़का (मीरा के सोकाल्ड भैया) वहीं अपने बच्चों के साथ मीरा के घर आया हुआ था. जो कि मीरा से 25 साल बड़ा था और मीरा की उम्र का उसका बेटा था. एक दिन मीरा के मम्मी पापा मीरा को घर पर ही छोड़ कर मूवी देखने चले गये. जब वे लौटे तो उन्होंने अपनी बच्ची के साथ बुआ के लड़के को गलत अवस्था में देखा. मीरा तो पांच साल की था. वो कुछ नहीं जानती थी. लेकिन वो 25 साल का मर्द तो जानता था कि क्या सही है क्या गलत. खैर ये तो हुई मीरा और बुआ के बेटे की बात, लेकिन मां बाप ने आपत्तिजनक अवस्था में देखने के बाद भी बात को दबा दिया वहीं. ये कहकर कि परिवार की बात है. बाहर जायेगी तो अपनी ही बदनामी होगी.

मां बाप इस तरह कैसे सोच सकते हैं? उन्हें गु्स्सा नहीं आता? इस तरह के मां बाप नपुंसक ही होते होंगे, क्योंकि उनका खून नहीं खौलता.  हम ही बढ़ावा देते हैं. हम खुद न्यौता देते हैं इन भेड़ियों को अपने घर में घुसने का. हम बेटियां पैदा करते हैं इनके लिए ताकि ये आयें और उन्हें नोच-नोच कर खायें. हमारी बच्चियां इतनी नाजों से इसलिए पाली जाती हैं, ताकि ये अपने मैल भरे खूनी नाखूनों से उनकी खाल को उधेड़ उधेड़ कर उसमें मवाद भर दें.

मैं तो बच गयी, क्योंकि चीखना मुझे आता था, लेकिन मीरा जैसी कितनी ही बच्चियां कितनी ही लड़कियां हैं, जो हर दिन खतम की जाती हैं. हर दिन उनका बचपन उनके ही खिलौने की गलियों में दम तोड़ता हैं. मासूमियत को किस तरह से कोई भेड़िया एक ही पल मैं रौंद देता है, मसल देता है अपनी बदबूदार हथेलियों के नीचे उसकी कोमल किलकारी को. वो तो भेद भी नहीं जान पाती है किलकारी और रुदन का. उसे तो सिर्फ हंसना आता है खिलौने के मिलने पर और रोना आता है खिलौने के टूट जाने पर. जब कोई उसकी मासूमित को ही इस क्रूरता से तोड़ देता है, तो ऐसे भेड़ियों का क्या इलाज है.

हम इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाते हैं, परेड करते हैं, बैनर चमकाते हैं. किसकी सलामती की दुआ करते हैं, उसकी जो अब सिर्फ एक लाश है. कितनी बार मरती है वो. फिर उसके जीने का क्या फायदा. उसे मर जाने दो. शायद मरने के बाद वह जी जाये. हमें क्या लगता है कि दामिनी जिंदा रहेगी तो सब अच्छा हो जायेगा. नहीं कभी नहीं. दामिनी को मर जाना चाहिए. यदि वह जिंदा रही तो वह जीते- जी हर पल मरेगी हर दिन मरेगी. अपने शरीर को कहां लेकर जायेगी जो हर पल उसे उन जानवरों की याद दिलवायेगा. शरीर का हर हिस्सा जिसे बेरहमों ने इस तरह कुचल दिया. एक ही दामिनी नहीं हैं हमारे बीच. कितनी कितनी दामनियां हैं हमारे आसपास, जो इसी तरह खतम कर दी जाती हैं. क्या हंसती खिलखिलाती गाती गुनगुनाती प्रेम करती लड़की इन मर्दों को अच्छी नहीं लगती, जो इस तरह से उसे रौंद देते हैं.

ये कहानी सिर्फ एक मीरा एक दामिनी की नहीं है….कितनी कितनी मीरा और कितनी कितनी दामनियां? कब तक? हमें क्या लगता है सिर्फ फांसी देकर हम बलात्कार जैसे अपराध को खतम कर लेंगे. नहीं कभी नहीं. दिमक तो पूरे सिस्टम में है. इस सिस्टम को कुछ परिवर्तन की  ज़रूरत है फांसी के साथ साथ. सिंहासन पर बैठे शेरों को (जिनके हाथ में सत्ता है) कालर पकड़ कर सड़क पर पटकना होगा. हम डर्टी पिक्चर को सेंसर बोर्ड से ओके करा लेते हैं, लेकिन टीवी पर उनके सीन काटकर दिखाते हैं. वो फ्रस्टेशन कहां जायेगा? बलात्कार में परिवर्तित होकर हमारी बच्चियों पर ही तो निकलेगा. जब मैंने कामासूत्रा देखी तो मैं अंत तक यही सोचती रही कि इसमें कुछ तो काम (सेक्स) होगा. लेकिन पूरी फिल्म देखकर ऐसा लगा मानो किसी बिमार आदमी ने बनायी है. सेक्स दिखाना नहीं होता तो, कामसूत्र जैसी फिल्में जगह जगह बिमार-कुंठित-नपुंसक-मर्दों को छोड़ने के लिए बनाते हैं. जो अपनी मर्दानगी किसी का बलात्कार करके दिखाते हैं. इतने में ही वे खुद को मर्द मान बैठते हैं, लेकिन वे ये नहीं जानते कि किसी औरत को सम्मान देकर आप जितना प्यार और सम्मान पा सकते हैं उतना बलात्कार करके नहीं.

कंडोम का एड सही तरह से टीवी पर प्रसारित क्यों करते. सनी लियोन की मादक अदाओं के बिना भी कंडोम का एड दिया जा सकता है. क्या जब तक सनी लियोन की अदायें नहीं होंगी तब तक सेक्स में आंनद नहीं आयेगा. जिसे आनंद लेना होगा वो सनी लियोन के बिना भी ले लेगा. फिर क्यों हम ऐसी एक जमात तैयार कर रहे हैं, जो हर बच्ची हर लड़की में सनी लियोन को देखे और उसकी मासूमियत का अपहरण कर दे. हमारा समाज खुद ही तैयार कर रहा है बलात्कारी. क्यों सैक्स पर बात करते हुए हम आज भी झिझकते हैं. खुल कर बात क्यों नहीं करते. वैश्यावृत्ति को लीगल क्यों नहीं कर देते. बड़े-बड़े नेता हर रात लड़कियां बदलते हैं, लेकिन छोटे स्तर का आदमी जब बॉर और कोठों पर पाया जाता है, तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है. कंडोम बनाते हैं, सनी लियोन का वैलकम करते हैं, पार्न मूवीज़ के सीडी बनते और बिकते हैं. लेकिन सेक्स को क्यों छुपाते हैं. वैश्यावृत्ति को लीगल क्यों नहीं करते.

जब तक ये सेक्स का कीड़ा दीमाग में रहेगा हर दिन कई कई दामनियां बलात्कार की खूंटी पर टांग दी जायेंगी. समाज में गंदगी फैलाने की सबसे बड़ी जड़ टीवी और हिंदी सिनेमा है. जिस तरह आजकल कचरा और अधूरा सेक्स टीवी पर परोसा जा रहा है वही तो बलात्कारियों की एक फौज तैयार कर रहा है. कटरीना कैफ आधे आधे ब्लाउज़ पहन कर बाडीगार्ड के गानों पर नाच कर करोड़ों रुपये कमा लेती है. लेकिन अपने पीछे एक बिमार फौज को कुंठा से भर कर कितनी ही लड़कियों की ज़िंदगी को नरक बना जाती है. वो तो नाचकर करोंड़ों कमाती है, लेकिन उन्हें नहीं पता की उनके इस नंगें नाच गाने से किसी लड़की की अनमोल जिंदगी खतम हो जाती है.  ज़रूरत है सेक्स को सही तरीके से बताने दिखाने समझाने की. न कि एक कुंठित समाज तैयार करने की.

समाज तो तैयार हो चुका है जैसा उसे हमारे सिरहाने बैठे ठेकेदार तैयार करना चाहते थे. अब तो हम सिर्फ अफसोस कर सकते हैं और अपनी बारी का इंतज़ार कर सकते हैं. कहां सुरक्षित हैं हम? कहां सुरक्षित हैं हमारी बच्चियां? हम उन्हें कैसा भविष्य दे रहे हैं? हम उन्हें कुछ नहीं दे रहे एक डरे-सड़े-नपुंसक-बलात्कारी समाज के सिवा. क्या हमारी बच्चियां इन भेड़ियों का भोजन हैं? जो वे इन्हें इस तरह खाने का साहस कर बैठते हैं. साहस करेंगें भी क्यों नहीं.  समाज तो बदलने से रहा. क्योंकि ये मर्दों की बनायी दुनिया और धीरे धीरे औरतों की संख्या घट ही रही है. या तो इन्हें कोख में मार दिया जाता है. मां-बाप के प्रेम के चलते बच्ची यदि दुनिया में आ भी जाती है, तो दुनिया वाले उसे जीने नहीं देते. या तो उसे दहेज के लिए जलाकर मार डालेंगे या फिर उसका  बलात्कार कर देंगे, ताकि वो खुद ब खुद अपने आप को मार डाले. दुनिया अगर इतनी ही बुरी है तो ये दुनिया खतम हो जानी चाहिए. यहां अब बेटियां नहीं पैदा होनी चाहिए. जिस दुनिया में बिमार लोग बसते हों, वो दुनिया इस लायक ही नहीं कि वहां बेटियां पैदा हों.  जब बेटियां पैदा ही नहीं होंगी तो दुनिया अपने आप ही खतम हो जायेगी.

मैं हर औरत हर बच्ची हर लड़की हर बेटी से प्यार करती हूं. हर बच्ची को देखकर सिर्फ दिल यही कहता है, कि हे ईश्वर!  इसे बचाकर रखना. इसका बचपन इसका जीवन इसे जीने देना हंसते हुए, मुस्कुराते हुए. मत कुचलने देना इन मासूम फूलों को. इन्हें खिलने देना. महकने देना. इनमें से ही कोई कल्पना चावला, मेधा पाटेकर, बरखा दत्त, इंदिरा नूई, लता मंगेशकर, सानिया मिर्जां होगी. जो देश बदलनेवाली हैं उनके वजूद को क्यों खतम करते हैं ये भेड़िये. इन्हें जीने दो. ये जीना चाहती हैं. हंसते हुए मुस्कुराते हुए. बच्चियां जब हंसती हैं, तो पूरी कायनात उनके साथ हंसती हैं. इस हंसी को गूंजना है! आकाश तक पहुंचना है! उड़ना है बादलों से भी आगे किसी दूसरे आसमान में….

लेखिका ने अनाम रहना प्रीफर किया है.


इसे भी पढ़ सकते हैं- ''बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता… और यही इसकी तार्किक परिणति है''

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