: कांग्रेस को काँटा बन के चुभने लगे हैं कांडा : जूता विक्रेता से जहाज़ कंपनी के मालिक, निर्दलीय विधायक और फिर फटी में पच्चर की तरह हरियाणा की लुंज पुंज सरकार में गृह (राज्य) मंत्री हो गए गोपाल कांडा अब कांग्रेस को कांटे की तरह चुभने लगे हैं. पहले हरियाणा की राजनीति में उनका अतीत, वर्तमान और भविष्य जान लें फिर बताते हैं कि कांग्रेस को वे आज किस भाव पड़ रहे हैं.
कांडा ब्रदर्स, गोपाल और गोबिंद बनियों की बेहतरीन संतानों में से दो हैं. जूते की दूकान से छोटा मोटा कारोबार करते सिरसा के बाज़ार से उठे दोनों भाई भारत के आकाश पर एम.डी.एल.आर. बन के उड़े. नेता उन्हें हमेशा डराते रहे. वैसे ही जैसे किसी भी कारोबारी को डराते हैं. ख़ास कर उनको जो बहुत महत्वाकांक्षी हों. खुद के भीतर राजनीति में आने की ललक तभी आई होगी. और वो आई तो एक ऐसे मौके पर कि जब सिरसा पर सालों साल राज करने वाले लछमन दास अरोड़ा थक और बुढ़ा चुके थे. चौटाला का गढ़ माने जाने वाले सिरसा में कांग्रेस अरोड़ा के बुढ़ाने से पैदा हुई रिक्तता को भरने के चक्कर में हम नहीं तो कोई नहीं तर्ज़ गाते कांग्रेसियों से कलुषित हुई पड़ी थी. ऐसे में गोपाल कांडा निर्दलीय के रूप में बाज़ी मार गए. शायद इस लिए भी कि चौटाला उनके भी जीत सकने से बेफिक्र कांग्रेस की ही काट करते रह गए. या कहिये कि सिरसा से सांसद रहे उनके ही डा. सुशील इंदौरा ने उनसे टिकट न मिलने का बदला लिया. कांडा जीत गए. और ऐसे माहौल में जीते कि जब कांग्रेस की नब्बे के सदन में कुल चालीस ही सीटें आईं.
समीकरण कुछ यों बना कि कांग्रेस 40, इंडियन नेशनल लोक दल एक सहयोगी अकाली सहित 33, कुलदीप बिश्नोई की जनहित कांग्रेस छह, भाजपा चार और निर्दलीय सात. भाजपा ने इनेलो को विधानसभा चुनाव से ऐन पहले मंझधार में छोड़ा फिर भी कुलदीप का साथ नहीं दिया. अगर कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए भाजपा चार विधायकों का सहयोग दे भी दे तो कुलदीप के मिला कर भी कुल 43. अध्यक्ष के लिए एक विधायक जोड़ कर देखें तो पूरे 45 दिखने के लिए भी कम से कम तीन निर्दलीय और चाहियें. कांग्रेस ने सातों निर्दलीयों की किसी न किसी मजबूरी का फायदा उठाया. उन्हें साथ लेकर सरकार बना ली. मुंह माँगा देना पड़ा. किसी भी राज्य में गृह और उद्योग दो बड़े मंत्रालय होते हैं. कांडा ने दोनों लिए. गृह उन्हें इस लिए भी चाहिए था कि असल में तो इनेलो के गढ़ में अमन, चैन और सुरक्षा से रह सकें.
शुरू में सोचा कांग्रेस ने ये था कि जनहित कांग्रेस को छोड़ कर आये पाँचों विधायकों और दो तीन दूसरे निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार चला ले जाएगी. कांडा से एक तरह से मुक्ति पा लेना उसके दिमाग में था. लेकिन पाँचों जनहित कांग्रेसियों के खिलाफ हाई कोर्ट में दलबदल याचिका और उस पर तेज़ी से सुनवाई वाले रुख से कांडा जैसों की धौंस झेलना कांग्रेस की नियति हो गई. सिरसा से सांसद हुए कांग्रेसी अशोक तंवर कांडा को कतई नहीं सुहाते. ऐसा वो मानते, कहते ही नहीं दिखाते भी हैं. बल्कि एक दफे सी.एम. को सिरसा बुलवा कर कोई दर्जन भर शिलान्यास करा रहे थे कांडा. इस जिद के साथ कि सांसद को नहीं बुलाएंगे किसी भी फंक्शन में. संचार की आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार वाले इस दौर में ये जानकारी पहुंची दिल्ली. तंवर राहुल गाँधी की मर्ज़ी से कांग्रेसी उम्मीदवार बने थे. दिल्ली से फटकार लगी. हुड्डा को कहना ही पड़ा कि तंवर नहीं आएँगे तो शिलान्यास भी नहीं होंगे. भीड़ जुटा चुके थे कांडा. फंस गए. जाना, मनाना और बुलाना पड़ा तंवर को. मगर शिलान्यास कर मुख्यमंत्री के जाते ही कांडा ने अपनी मंत्री वाली कार सरकारी गेस्ट हाउस पे खड़ी करवा दी. अपने गनमैन भी छोड़ दिए. सरकार के हाथ पाँव फूल गए. खबरें छपीं. खूब किरकिरी हुई. कांडा कोई हफ्ता भर चक्करघिन्नी खिला कर दफ्तर आये. कांग्रेस की हालत देखने लायक थी. पार्टी के सयानों ने कहा सब्र करो. मौका आने का इंतज़ार करो. पार्टी के पास भी बड़ा दिमाग है. वो कनिमोज़ी के जेल जाने और जमानत तक न मिल पाने से पैदा हुई मानसिक स्थिति में भी करूणानिधि को हिलने नहीं देती. न पेट्रोल की कीमतों या विदेशी निवेश पे ममता बनर्जी को. कांग्रेस से बगावत करने वालों के लिए एक मिसाल जगन रेड्डी भी हैं. कांडा तो जगन रेड्डी भी नहीं हैं.
खबर ये है कि अब गोपाल कांडा के भाग निकलने के रास्ते बंद किये जा रहे हैं. खासकर उनकी सांसद अशोक तंवर से हाथापाई की हिमाकत के बाद. कांडा और तंवर के बीच की खुंदक मारपीट की हद तक पंहुच गई है और ये मुख्यमंत्री हुड्डा की मौजूदगी में हुई. आपको ये भी बता दें कि कांडा ने तंवर को मारा क्यों? कांडा को मलाल है कि रतिया विधानसभा उपचुनाव की एक सभा में उनके मौजूद होने के बावजूद न उन्हें बोलने दिया तंवर ने, न उनके भाई गोबिंद कांडा को मंच पे बैठने ही दिया. इसकी सारी रिपोर्ट हाईकमान को पंहुची है. और वो इसे गंभीरता से ले रहा है. विचारने को विचार कांग्रेस ने इस पर भी किया है कि कांडा से मंत्रालय छीन लेने के बाद वे क्या कर सकते हैं. जहां तक इस विकल्प की बात है तो कांग्रेस को कोई फ़िक्र नहीं है. वो तब हो जब कांडा इधर छोड़ के कहीं और जा सकने की हालत में हों. वैसा कुछ है नहीं. कांडा को होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों के बाद हटाया जा सकता है. कांग्रेस ये मान के चल रही है कि कांडा अगली बार जीत नहीं पाएंगे. उनको कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में पेश करना भी कांग्रेस नहीं चाह रही. उसे लगता है कि इस से उसके परंपरागत वोटर नाराज़ होंगे. पुराने कांग्रेसियों में बगावत भी हो सकती है.
सो, कांडा आज भले ही कांग्रेस को नाकों चने चबवा रहे हों. उनका राजनीतिक भविष्य कोई बहुत उज्जवल दिखाई नहीं दे रहा. उनके शहर सिरसा में लोग एक मिसाल देते हैं. कहते हैं एक कमज़ोर ने पहलवान को पटक लिया और ऊपर बैठ के जोर जोर से रोने लगा. लोगों ने पूछा इतने बड़े पहलवान को पटखा है तूने तो, खुश होने की बजाय रो क्यों रहा है? वो बोला, गिर तो गया है दरअसल ये एक तुक्के से. लेकिन अब जब उठेगा तो मारेगा बहुत. सिरसा में लोग कहने लगे हैं कि कांग्रेस कांडा को पालेगी नहीं और उसने छोड़ा तो चौटाला छोड़ेगा नहीं. जब सब ये कह रहे हैं तो लग कहीं न कहीं खुद कांडा को भी रहा है. उन्हें अब राजनीति के बाद सुरक्षा का एक आवरण चाहिए. सो वे न्यूज़ चैनल लाये हैं. उसपे हर दूसरे मिनट खुद उनकी कोई
खबर या स्ट्रिप चलती है.
लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





